Bank Credit Growth: 73% बैंकों को H2 FY27 में 14% से ज्यादा बढ़त की उम्मीद

भारत के बैंकिंग सेक्टर में आने वाले छह महीनों के लिए कर्ज की मांग को लेकर सकारात्मक उम्मीद दिखाई दे रही है। FICCI और Indian Banks’ Association (IBA) के 22वें Bankers’ Survey के अनुसार, करीब 73 प्रतिशत बैंकों को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में non-food credit growth सालाना आधार पर 14 प्रतिशत से अधिक रह सकती है। 31 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध इस रिपोर्ट में बताया गया कि 23 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने 12 से 14 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया, जबकि केवल 4 प्रतिशत ने 10 से 12 प्रतिशत वृद्धि की संभावना जताई। यह सर्वेक्षण बैंकों की अपेक्षाओं को दिखाता है, वास्तविक भविष्य के आंकड़ों की गारंटी नहीं देता।

FICCI-IBA survey में क्या कहा गया?

22वें FICCI-IBA Bankers’ Survey में जुलाई से दिसंबर 2026 की अवधि के लिए बैंकिंग सेक्टर के रुझानों का आकलन किया गया। सर्वे के अनुसार, 96 प्रतिशत उत्तरदाताओं को उम्मीद है कि non-food credit growth कम से कम 12 प्रतिशत रहेगी। इसमें private banks की उम्मीद सबसे मजबूत बताई गई। 89 प्रतिशत private bank respondents ने 14 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का अनुमान दिया।

Public sector banks में 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने 14 प्रतिशत से अधिक वृद्धि की संभावना जताई। वहीं 18 प्रतिशत ने 12 से 14 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया और 9 प्रतिशत ने 10 से 12 प्रतिशत की सीमा बताई। Foreign banks का नजरिया अपेक्षाकृत संतुलित रहा। सर्वे में शामिल सभी foreign bank respondents ने 12 से 14 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद जताई।

Non-food credit का मतलब क्या है?

Non-food credit बैंकिंग आंकड़ों में ऐसा कर्ज है जो खाद्य खरीद और उससे संबंधित सरकारी एजेंसियों की वित्तीय जरूरतों के अलावा अन्य क्षेत्रों को दिया जाता है। इसमें घर, वाहन, शिक्षा, व्यक्तिगत जरूरतों, उद्योग, सेवाओं और छोटे कारोबारों को मिलने वाला कर्ज शामिल हो सकता है। इसलिए non-food credit की वृद्धि से अर्थव्यवस्था में कई तरह की वित्तीय गतिविधियों का संकेत मिलता है।

जब परिवार घर या वाहन खरीदने के लिए loan लेते हैं, कंपनियां मशीनरी खरीदती हैं या छोटे व्यवसाय working capital जुटाते हैं, तो बैंकिंग credit की मांग बढ़ सकती है। लेकिन credit growth को आर्थिक मजबूती का अकेला पैमाना नहीं मानना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि कर्ज किस क्षेत्र में जा रहा है, उसकी repayment कैसी है और बैंक जमा के जरिए पर्याप्त धन जुटा पा रहे हैं या नहीं।

Retail और SME loan से मांग को सहारा

बैंकिंग सर्वे में retail और small and medium enterprises यानी SME lending को कर्ज वृद्धि के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा गया। घरेलू ग्राहकों को घर, वाहन और अन्य जरूरतों के लिए वित्त की मांग रहती है। दूसरी ओर छोटे और मध्यम कारोबारों को माल खरीदने, वेतन देने, मशीनरी लगाने और कारोबार बढ़ाने के लिए कर्ज की जरूरत पड़ती है।

SME सेक्टर में कर्ज की उपलब्धता रोजगार और स्थानीय उत्पादन के लिए अहम हो सकती है। हालांकि, छोटे कारोबारों की आमदनी कई बार मौसमी या अनिश्चित होती है। इसलिए बैंक को loan देने से पहले कारोबार की cash flow, ग्राहक भुगतान, बकाया कर्ज और बाजार की स्थिति देखनी पड़ती है। तेजी से कर्ज बांटना तभी उपयोगी है जब कर्ज की गुणवत्ता भी बनी रहे।

Infrastructure और services sector की भूमिका

Infrastructure परियोजनाओं में सड़क, बिजली, परिवहन, निर्माण और अन्य लंबी अवधि के निवेश शामिल होते हैं। ऐसी परियोजनाओं को बड़ी पूंजी और लंबी repayment अवधि की जरूरत हो सकती है। सर्वे में infrastructure को industrial term loan demand का प्रमुख क्षेत्र माना गया। यदि परियोजनाओं को समय पर मंजूरी, जमीन, निर्माण संसाधन और पर्याप्त मांग मिलती है, तो बैंक वित्त का उपयोग बढ़ सकता है।

Services sector में NBFCs, tourism, hospitality और commercial real estate जैसे क्षेत्रों से कर्ज की मांग आने की उम्मीद जताई गई। इन क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के जोखिम होते हैं। उदाहरण के लिए tourism में मौसमी मांग और बाहरी परिस्थितियों का असर पड़ सकता है, जबकि commercial real estate में किराया, occupancy और ब्याज दर महत्वपूर्ण हैं। बैंक को क्षेत्र के अनुसार जोखिम जांचना होता है।

बैंकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती: Deposits

कर्ज की मांग बढ़ने के साथ बैंकों को जमा राशि जुटाने की जरूरत भी बढ़ती है। सर्वे से जुड़ी रिपोर्टों में deposit growth के credit demand से पीछे रहने की चिंता सामने आई है। यदि बैंक तेजी से loan देते हैं, लेकिन उसी गति से स्थिर जमा नहीं जुटा पाते, तो उन्हें अधिक लागत पर धन जुटाना पड़ सकता है। इससे lending margin पर दबाव आ सकता है।

बैंक जमा जुटाने के लिए savings account, current account और fixed deposit जैसे विकल्पों पर निर्भर रहते हैं। ग्राहक ब्याज दर, सेवा और भरोसे के आधार पर बैंक चुनते हैं। यदि जमा के लिए बैंकों को FD दरें बढ़ानी पड़ती हैं, तो उनकी funding cost बढ़ सकती है। यह लागत आगे चलकर loan pricing और profitability को प्रभावित कर सकती है।

Private banks अधिक आशावादी क्यों?

Survey में private banks ने credit growth को लेकर सबसे अधिक आशावादी रुख दिखाया। इसके पीछे उनकी ग्राहक पहुंच, डिजिटल वितरण, retail lending क्षमता और SME कारोबार में सक्रियता जैसे कारण हो सकते हैं। हालांकि सर्वेक्षण ने किसी एक कारण को निर्णायक नहीं बताया। अलग-अलग बैंक की पूंजी स्थिति, जमा आधार, loan book और जोखिम नीति अलग होती है।

Public sector banks भी मजबूत वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं और ग्राहक आधार अलग हो सकते हैं। Foreign banks का जवाब अधिक सीमित वृद्धि सीमा में रहा। इससे पता चलता है कि सभी बैंक एक जैसी आर्थिक परिस्थितियों में काम नहीं करते और उनकी रणनीति भी अलग हो सकती है।

ग्राहकों और निवेशकों के लिए इसका क्या अर्थ है?

ग्राहकों के लिए credit growth की उम्मीद का अर्थ यह हो सकता है कि बैंक retail और business loans देने में सक्रिय बने रहें। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर ग्राहक को कम ब्याज दर या तुरंत loan मंजूर होगा। बैंक की eligibility, credit score, आय, collateral और repayment क्षमता के आधार पर शर्तें तय होती हैं।

निवेशकों को केवल credit growth के अनुमान पर बैंक शेयर खरीदने का फैसला नहीं करना चाहिए। उन्हें net interest margin, deposit growth, bad loans, capital adequacy, provisioning और management guidance जैसे संकेतकों का भी अध्ययन करना चाहिए। तेज loan growth तभी टिकाऊ मानी जाएगी जब asset quality और funding दोनों संतुलित रहें।

आगे किन आंकड़ों पर नजर रखनी होगी?

आने वाले महीनों में RBI के credit और deposit data से पता चलेगा कि बैंकों की उम्मीदें वास्तविक आंकड़ों में कितनी बदलती हैं। Retail loan, SME finance, infrastructure credit और services sector lending की दिशा पर नजर रहेगी। साथ ही जमा वृद्धि, loan-to-deposit ratio और ब्याज लागत भी महत्वपूर्ण होंगे।

सर्वेक्षण को एक संकेत के रूप में देखना चाहिए, न कि पक्के नतीजे के रूप में। वैश्विक अनिश्चितता, ऊर्जा कीमतें, महंगाई, ब्याज दरें और कंपनियों के निवेश निर्णय कर्ज की मांग को प्रभावित कर सकते हैं। वित्तीय क्षेत्र की बुनियादी समझ बढ़ाने के लिए Banking and Finance किताबें Amazon पर देखें।

स्रोत: Business Standard की FICCI-IBA survey रिपोर्ट। सर्वे के अनुमान भविष्य के वास्तविक परिणामों से अलग हो सकते हैं।

FAQs

1. FICCI-IBA Bankers’ Survey क्या है?

यह बैंकिंग सेक्टर से जुड़े बैंकों की राय और उम्मीदों का सर्वेक्षण है। इसमें कर्ज की मांग, जमा, कारोबार और बैंकिंग प्राथमिकताओं जैसे विषयों पर विचार लिया जाता है। इसके नतीजे अनुमान बताते हैं, वास्तविक आंकड़े नहीं।

2. 73 प्रतिशत बैंकों ने क्या अनुमान लगाया?

सर्वे में 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उम्मीद जताई कि जुलाई से दिसंबर 2026 की अवधि में non-food credit growth सालाना आधार पर 14 प्रतिशत से अधिक रह सकती है। यह बैंकों की अपेक्षा है, सुनिश्चित वृद्धि नहीं।

3. Non-food credit में कौन से loan आते हैं?

Non-food credit में आम तौर पर व्यक्तिगत, घर, वाहन, शिक्षा, उद्योग, सेवा क्षेत्र और छोटे कारोबारों को दिए जाने वाले कर्ज शामिल होते हैं। खाद्य खरीद से जुड़े कुछ विशेष सरकारी वित्तीय कर्ज इसमें अलग माने जाते हैं।

4. Deposit growth धीमी होने से बैंकों पर क्या असर पड़ता है?

यदि जमा राशि कर्ज की मांग के मुकाबले धीमी बढ़ती है, तो बैंक को धन जुटाने के लिए अधिक ब्याज देना पड़ सकता है। इससे funding cost बढ़ती है और बैंक के मुनाफे तथा loan pricing पर असर पड़ सकता है।

5. क्या credit growth बढ़ने से बैंक शेयर खरीदने चाहिए?

केवल credit growth के अनुमान पर बैंक शेयर खरीदना उचित नहीं है। निवेशक को बैंक की asset quality, जमा वृद्धि, मुनाफा, capital adequacy और valuation भी देखनी चाहिए। शेयर बाजार में नुकसान का जोखिम हमेशा रहता है।

निष्कर्ष

FICCI-IBA survey में बैंकों ने H2 FY27 के लिए मजबूत credit growth की उम्मीद जताई है। Retail, SME और infrastructure lending अहम रह सकते हैं। लेकिन इस वृद्धि की स्थिरता जमा जुटाने, ब्याज लागत और loan quality पर निर्भर करेगी।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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