दक्षिण अफ्रीका के भारत में उच्चायुक्त अनिल सुकलाल ने कहा है कि BRICS देश अमेरिकी डॉलर को हटाकर एक साझा मुद्रा बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। उनका जोर सदस्य देशों के बीच अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और भुगतान के दूसरे विकल्प तैयार करने पर है। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य किसी एक देश की मुद्रा को चुनौती देना नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में देशों के लिए व्यापार के अधिक रास्ते खोलना है।
BRICS देशों की योजना क्या है?
सुकलाल के मुताबिक, BRICS का ध्यान स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने और अपना भुगतान ढांचा मजबूत करने पर है। इससे सदस्य देशों को हर व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि साझा मुद्रा बनाने की बात समूह की मौजूदा प्राथमिकता नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अमेरिकी टैरिफ, प्रतिबंधों और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की बड़ी भूमिका को लेकर चिंता है। उनके विचार में, व्यापार से जुड़े इन तरीकों के कारण कई देश भुगतान और व्यापार के वैकल्पिक साधनों पर विचार कर रहे हैं।
🌍 BRICS की व्यापार योजना
- मुख्य लक्ष्य: स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना
- साझा मुद्रा: फिलहाल मुख्य योजना नहीं
- भुगतान व्यवस्था: वैकल्पिक प्लेटफॉर्म और साधनों पर काम
- संभावित लाभ: डॉलर पर निर्भरता कम करने के विकल्प
- प्रमुख बयान: दक्षिण अफ्रीका के उच्चायुक्त अनिल सुकलाल
भारत की कूटनीति को मिला श्रेय
सुकलाल ने नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के संयुक्त घोषणापत्र को भारत की कई महीनों की कूटनीतिक बातचीत का नतीजा बताया। उनके अनुसार, सदस्य देशों के बीच संघर्षों, व्यापार और दूसरे वैश्विक मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद सहमति बनना महत्वपूर्ण था।
उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया सहित अफ्रीकी सदस्य देशों ने भी आम सहमति बनाने में भूमिका निभाई। उनके मुताबिक, भारत ने सम्मेलन से पहले अलग-अलग सदस्य देशों के साथ लगातार बातचीत की, जिससे संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनाने में मदद मिली।
अमेरिकी व्यापार नीति पर चिंता
सुकलाल ने अमेरिकी व्यापार नीति की आलोचना करते हुए कहा कि टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध देशों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उनका मानना है कि दुनिया की पुरानी नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर हो रही है और देश अधिक अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय माहौल में काम कर रहे हैं। ये उनके विचार हैं, न कि सभी BRICS सदस्यों की ओर से जारी कोई अलग साझा घोषणा।
उन्होंने BRICS की बढ़ती भूमिका को इसी बदलती वैश्विक स्थिति से जोड़ा। समूह के सदस्य चाहते हैं कि व्यापार और भुगतान के विकल्पों पर चर्चा आगे बढ़े। हालांकि, इन व्यवस्थाओं को विकसित करने और बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने में समय, तकनीकी तालमेल और सदस्य देशों के बीच सहमति की जरूरत होगी।
⚖️ डॉलर और वैश्विक व्यापार की बहस
- चिंता: टैरिफ और प्रतिबंधों का व्यापार पर असर
- BRICS का रुख: व्यापार के लिए अतिरिक्त भुगतान विकल्प
- भारत की भूमिका: सदस्य देशों के बीच बातचीत और सहमति
- चुनौती: अलग-अलग आर्थिक हितों के बीच तालमेल
- आगे का रास्ता: स्थानीय मुद्रा व्यापार और भुगतान साधनों पर चर्चा
मोदी के संबंधों और बातचीत की भूमिका
सुकलाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ संबंधों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, भारत के विभिन्न देशों के साथ संपर्क ने समूह के भीतर मतभेद कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद की। उन्होंने सम्मेलन को ग्लोबल साउथ के लिए भी महत्वपूर्ण बताया।
भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी BRICS व्यापार मंच पर सदस्य और साझेदार देशों से डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का लाभ उठाने, डिजिटल व्यापार बढ़ाने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार पर काम करने का आह्वान किया था। भारत की एकीकृत भुगतान प्रणाली UPI को भी इस संदर्भ में सहयोग के संभावित उदाहरण के रूप में पेश किया गया।
इस विषय पर मूल रिपोर्ट Mint की इस रिपोर्ट में पढ़ी जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या BRICS अपनी साझा मुद्रा शुरू करने जा रहा है?
अनिल सुकलाल के बयान के अनुसार, BRICS की मौजूदा प्राथमिकता साझा मुद्रा बनाना नहीं है। समूह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने पर चर्चा कर रहा है, ताकि देशों के पास अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के अधिक विकल्प हों।
2. स्थानीय मुद्रा में व्यापार का क्या मतलब है?
स्थानीय मुद्रा में व्यापार का मतलब है कि दो देश कुछ लेन-देन अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कर सकें। इससे हर भुगतान में डॉलर का इस्तेमाल जरूरी नहीं रह सकता, हालांकि यह व्यवस्था व्यापार समझौतों, मुद्रा विनिमय और बैंकिंग सुविधाओं पर निर्भर करेगी।
3. BRICS डॉलर पर निर्भरता क्यों घटाना चाहता है?
सुकलाल के अनुसार, कुछ देशों को अमेरिकी टैरिफ, प्रतिबंधों और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की प्रमुख भूमिका को लेकर चिंता है। इसलिए वे भुगतान के दूसरे रास्तों पर विचार कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि डॉलर तुरंत अंतरराष्ट्रीय व्यापार से हट जाएगा।
4. BRICS सम्मेलन में भारत की क्या भूमिका रही?
सुकलाल ने कहा कि भारत ने सम्मेलन से पहले सदस्य देशों के साथ लगातार कूटनीतिक बातचीत की। उनके अनुसार, इस प्रयास से अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनाने में मदद मिली। अन्य सदस्य देशों ने भी बातचीत में योगदान दिया।
5. क्या स्थानीय मुद्रा में व्यापार से डॉलर की जगह पूरी तरह ली जा सकती है?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कुछ लेन-देन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है, लेकिन वैश्विक व्यापार में डॉलर की भूमिका कई आर्थिक, वित्तीय और बाजार संबंधी कारणों पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष
BRICS की चर्चा साझा मुद्रा बनाने से ज्यादा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान साधनों को मजबूत करने पर केंद्रित है। भारत की कूटनीति ने सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में मदद की, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक असर उनके लागू होने और व्यापक इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध रिपोर्ट और अनिल सुकलाल के बयानों पर आधारित है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों में बदलाव संभव है।