प्रतिपूरक वनीकरण: क्या नए पेड़ पुराने जंगल की भरपाई कर सकते हैं?

पेड़ लगाना पर्यावरण की रक्षा करने का एक अच्छा तरीका माना जाता है। शहरों में सरकारी संस्थाएं और नगर निगम अक्सर बड़े स्तर पर पौधे लगाने के अभियान चलाते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस जैसे अवसरों पर हजारों पौधे लगाने की घोषणाएं की जाती हैं। इन अभियानों का उद्देश्य हरियाली बढ़ाना और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना होता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नए पौधे लगाकर पुराने जंगलों की भरपाई की जा सकती है? जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे अनेक जीवों, पक्षियों, कीड़ों और पौधों का घर भी होते हैं। इसलिए पुराने जंगल को काटकर किसी दूसरी जगह पौधे लगा देना उसके नुकसान की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।

भारत में जब सड़क, मेट्रो या दूसरी विकास परियोजनाओं के लिए जंगलों को काटा जाता है, तो उसकी भरपाई के लिए दूसरी जगह पौधे लगाने की व्यवस्था की जाती है। इसे प्रतिपूरक वनीकरण कहा जाता है। इसके तहत काटे गए पेड़ों की जगह अधिक संख्या में नए पौधे लगाने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, केवल पौधे लगाने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि वे बड़े होकर जंगल का रूप ले लेंगे। मुंबई में मेट्रो परियोजना के लिए काटे गए पेड़ों की भरपाई के तौर पर लगाए गए 20 हजार से अधिक पेड़ों के मामले में अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उनमें से लगभग आधे ही जीवित बचे थे। खराब मिट्टी, पानी की कमी और उचित देखभाल नहीं होने को इसकी प्रमुख वजहों में गिना गया।

जंगलों की भरपाई के लिए पौधे लगाना जितना आसान दिखाई देता है, वास्तव में यह उतना ही लंबा और मेहनत वाला काम है। सबसे पहले स्थानीय प्रजातियों के बीज जुटाने पड़ते हैं। कई बार इन बीजों को ढूंढना मुश्किल होता है। इसके बाद यह समझना जरूरी होता है कि बीजों को किस तरह उगाया जाए और किन स्थानों पर पौधे लगाए जाएं। हर पेड़ हर तरह की जमीन और मौसम में अच्छी तरह नहीं बढ़ सकता। पौधों को सही जगह लगाने के साथ उनकी नियमित देखभाल भी जरूरी है। कुछ प्रजातियों को तैयार करने और उन्हें सही तरीके से लगाने की पूरी प्रक्रिया में पांच से दस साल तक लग सकते हैं।

पौधे लगाने के बाद उनकी निगरानी करना भी उतना ही जरूरी है। सरकारी योजनाओं में पौधों की स्थिति पर नजर रखने, उनके स्थान का रिकॉर्ड तैयार करने और समय-समय पर निरीक्षण करने की व्यवस्था होती है। इसके बावजूद कई बार निगरानी ठीक से नहीं होती और पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसका उदाहरण मुंबई की वर्सोवा-भायंदर तटीय सड़क परियोजना से जुड़ा मामला है। इस परियोजना में प्रभावित मैंग्रोव जंगलों की भरपाई के लिए एक लाख 37 हजार से अधिक मैंग्रोव पौधे लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं के अनुसार, भायंदर में पौधारोपण के एक स्थान पर बड़ी संख्या में नए पौधे मर चुके थे। उन्होंने गलत प्रजातियों के चयन, ज्वारीय जलमार्गों में पानी की कमी और पौधों की सुरक्षा के लिए उचित इंतजाम नहीं होने जैसी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया।

इस काम में एक बड़ी चुनौती पौधे लगाने के लिए सही जमीन ढूंढना भी है। मुंबई जैसे बड़े शहरों में बड़े स्तर पर पौधारोपण के लिए खाली जगह कम होती जा रही है। इसलिए कई बार उन जंगलों की भरपाई के लिए दूर के इलाकों में पौधे लगाने की योजना बनाई जाती है, जिन्हें किसी विकास परियोजना के कारण नुकसान पहुंचा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि अगर किसी जंगल को काटकर दूर किसी दूसरी जगह पौधे लगा दिए जाएं, तो क्या उस क्षेत्र की प्राकृतिक व्यवस्था पहले जैसी हो सकती है? कई बार जिस जमीन को खराब या बेकार बताकर पौधे लगाने के लिए चुना जाता है, वह पहले से ही किसी प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा होती है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि खराब हो चुकी जमीन को सुधारने के लिए केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि उस जगह का प्राकृतिक संतुलन क्यों बिगड़ा। यदि वहां पानी का बहाव रुक गया है, बाहरी प्रजातियों के पौधे फैल गए हैं या बार-बार आग लगती है, तो इन समस्याओं को दूर करना होगा। जब तक नुकसान की असली वजह बनी रहेगी, तब तक नए पौधों को लंबे समय तक जीवित रखना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, जिस जमीन को खाली समझा जाता है, वह वास्तव में घास के मैदान, दलदल, आर्द्रभूमि या पशुओं के चरने का स्थान हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में भी कई तरह के जीव-जंतु और पौधे रहते हैं, इसलिए वहां बिना सोचे-समझे पेड़ लगाना नुकसानदायक हो सकता है।

मान लीजिए कि किसी स्थान पर सही प्रजातियों के पौधे लगाए गए और उनकी अच्छी देखभाल भी की गई। इसके बाद भी वहां पुराने जंगल जैसी प्राकृतिक व्यवस्था बनने में कई दशक या उससे अधिक समय लग सकता है। तमिलनाडु की अनामलाई पहाड़ियों के वालपाराई क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय सदाबहार जंगलों को दोबारा विकसित करने के लिए लंबे समय से काम किया जा रहा है। वहां स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए गए, जंगल के किनारों को सुरक्षित किया गया और अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके बावजूद लगभग 20 साल के प्रयासों के बाद भी जंगल की प्राकृतिक विविधता पूरी तरह वापस नहीं आ सकी थी।

जंगलों में पेड़ों के अलावा पक्षियों, स्तनधारी जीवों, कीड़ों और फफूंद की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। पक्षी और दूसरे जीव बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं, जबकि छोटे जीव और फफूंद मिट्टी की प्राकृतिक प्रक्रिया में योगदान देते हैं। इन सभी के बीच विकसित हुए संबंधों को दोबारा बनाना बहुत कठिन है। कुछ जीव जल्दी लौट आते हैं, जबकि दूसरी प्रजातियों को वापस आने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए नए पेड़ लगा देने से जंगल की पूरी जैव विविधता तुरंत वापस नहीं आती।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर प्राकृतिक क्षेत्र में घने जंगल होना जरूरी नहीं है। घास के मैदान, रेगिस्तान, दलदल और आर्द्रभूमि भी अपने आप में महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं। गर्मियों या सूखे मौसम में घास के मैदान पीले दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहां जीवन नहीं है। इसी तरह, दलदली जमीन को बेकार समझना भी गलत हो सकता है। ऐसे स्थानों पर भी कई प्रजातियां निर्भर रहती हैं। इसलिए हर खाली या कम हरे दिखाई देने वाले क्षेत्र में पेड़ लगाने के बजाय उसकी प्राकृतिक विशेषताओं को समझना जरूरी है।

भारत के कई शहरों में जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी की तकनीक पर आधारित घने छोटे जंगल भी विकसित किए जा रहे हैं। इस तरीके में कम जगह पर बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाते हैं, ताकि तेजी से हरियाली बढ़ाई जा सके। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे कम समय में घने पेड़ों वाले क्षेत्र तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या ऐसे छोटे जंगल हर जगह जैव विविधता बढ़ाने में समान रूप से सफल होते हैं। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां प्राकृतिक रूप से घास के मैदान हैं या पानी की कमी रहती है, वहां बिना उचित अध्ययन के इस तरीके को अपनाना समस्याएं पैदा कर सकता है।

पेड़ लगाना अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब पौधारोपण को जंगलों की कटाई का आसान विकल्प मान लिया जाता है। नए पौधों को बड़ा होने के लिए सुरक्षा, पानी, देखभाल और लंबे समय तक आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। उन्हें अतिक्रमण, कचरे और दूसरी मानवीय गतिविधियों से बचाना भी जरूरी है। यदि इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो बड़े पैमाने पर पौधे लगाने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते।

पर्यावरण की रक्षा के लिए सबसे जरूरी कदम पहले से मौजूद जंगलों को बचाना है। पुराने पेड़ों और जंगलों को विकसित होने में लंबा समय लगा होता है। उनकी प्राकृतिक व्यवस्था को दोबारा तैयार करना आसान नहीं है। विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों को नुकसान पहुंचाने के बाद दूसरी जगह पौधे लगाना इस नुकसान का पूरा समाधान नहीं हो सकता। इसलिए सरकार, स्थानीय प्रशासन और आम लोगों को पौधारोपण के साथ-साथ मौजूदा जंगलों, प्राकृतिक जल स्रोतों और जैव विविधता की सुरक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए। असली सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने पौधे लगाए गए, बल्कि इससे कि उनमें से कितने जीवित रहे और प्राकृतिक पर्यावरण को बचाने में कितने उपयोगी साबित हुए।

Gourav Kumar Singh

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