European Union के Carbon Border Adjustment Mechanism यानी CBAM के कारण भारत के छोटे steel exporters के सामने नई compliance चुनौती खड़ी हो रही है। 30 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, कई micro, small and medium enterprises यानी MSMEs को अपने raw-material suppliers से भरोसेमंद emissions data नहीं मिल पा रहा है। Carbon accounting, audit और third-party verification की लागत भी छोटे निर्माताओं के लिए भारी हो सकती है। यूरोप भारत के iron और steel exports का बड़ा बाजार है, इसलिए carbon-related reporting की तैयारी न होने पर कुछ exporters की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
EU CBAM क्या है?
Carbon Border Adjustment Mechanism यूरोपीय संघ की ऐसी व्यवस्था है जिसका उद्देश्य आयातित वस्तुओं से जुड़ी carbon emissions की लागत को EU के भीतर उत्पादित वस्तुओं के समान आधार पर लाना है। इसका लक्ष्य carbon-intensive उत्पादन को हतोत्साहित करना और यूरोप के उद्योगों को ऐसे आयात से प्रतिस्पर्धा में राहत देना है जिन पर कम carbon cost लगती है। यह व्यवस्था iron and steel, aluminium, cement, fertilisers, electricity और hydrogen जैसे क्षेत्रों को कवर करती है।
CBAM की definitive phase 1 जनवरी 2026 से शुरू हुई। इसके तहत EU importers को covered goods से जुड़ी emissions की जानकारी देनी और लागू नियमों के अनुसार certificates की जिम्मेदारी निभानी होती है। भारतीय exporters पर यह दायित्व सीधे उसी तरह लागू नहीं होता, लेकिन उनके यूरोपीय buyers वास्तविक emissions data मांग सकते हैं। यदि supplier data उपलब्ध नहीं है तो default values के आधार पर गणना होने की आशंका रहती है।
Indian Steel MSMEs के सामने मुख्य समस्या
Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे steel manufacturers को अपने suppliers से carbon footprint certificates या emissions data प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। किसी finished product का carbon footprint निकालने के लिए केवल factory में होने वाली emissions पर्याप्त नहीं होतीं। कच्चे steel के उत्पादन से जुड़ी emissions और आगे की processing से पैदा होने वाली emissions भी समझनी पड़ती हैं।
यदि primary या secondary steel producers आवश्यक जानकारी नहीं देते तो downstream manufacturer के लिए पूरी supply chain की emissions गणना करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में exporters को prescribed default values का सहारा लेना पड़ सकता है। यदि default value वास्तविक emissions से अधिक है तो EU buyers के लिए उस उत्पाद की carbon cost बढ़ सकती है और भारतीय supplier की कीमत प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।
Compliance की लागत कितनी हो सकती है?
रिपोर्ट में उद्योग के अनुमानों के हवाले से बताया गया कि किसी factory में emissions data इकट्ठा करने और reporting system तैयार करने की लागत कुछ मामलों में ₹20 लाख या उससे अधिक हो सकती है। कुछ MSME units के लिए recurring administrative expenses, जैसे emissions measurement, software, reporting और third-party verification, सालाना ₹15 लाख से ₹20 लाख तक पहुंच सकते हैं। ये industry estimates हैं, हर कंपनी पर लागू होने वाली तय सरकारी फीस नहीं।
लागत facility के आकार, उत्पादन प्रक्रिया, product category और verification की जरूरत पर निर्भर करेगी। छोटे exporters के पास dedicated compliance team नहीं होती, इसलिए उन्हें बाहरी consultants और auditors पर निर्भर रहना पड़ सकता है। यदि कई buyers अलग-अलग format में data मांगते हैं तो reporting का बोझ और बढ़ सकता है।
यूरोप भारत के Steel Exporters के लिए क्यों अहम?
Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, EU ने 2024 में भारत से लगभग 3.9 अरब यूरो मूल्य का iron और steel आयात किया। भारत के CBAM-exposed exports में iron और steel का हिस्सा करीब 90 प्रतिशत बताया गया। इससे स्पष्ट है कि यूरोपीय बाजार भारतीय steel exporters के लिए महत्वपूर्ण है। यदि compliance लागत बढ़ती है तो इसका असर निर्यातकों की कीमत और buyer relationships पर पड़ सकता है।
यूरोप में खरीदारों को covered imports के लिए emissions data और certificates की जरूरत होती है। इसलिए वे suppliers से अधिक पारदर्शी जानकारी मांग सकते हैं। यदि भारतीय निर्माता समय पर verified data नहीं दे पाते तो buyers ऐसे suppliers चुन सकते हैं जिनकी emissions reporting बेहतर हो। हालांकि, हर product और exporter पर असर एक जैसा नहीं होगा। यह product classification, emissions intensity और buyer requirements पर निर्भर करेगा।
भारत के Steel Sector की Carbon Intensity
रिपोर्ट में Global Energy Monitor के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत के steel production का बड़ा हिस्सा coal-based direct reduced iron और blast furnace-basic oxygen furnace जैसे तरीकों पर निर्भर है। Coal आधारित उत्पादन से carbon emissions अधिक हो सकती हैं। ICRA के अनुमान के अनुसार, भारत की औसत carbon intensity लगभग 2.55 tonnes CO₂ प्रति tonne steel बताई गई, जबकि वैश्विक औसत करीब 1.85 tonnes और EU benchmark इससे कम है।
Carbon intensity कम करने के लिए उद्योगों को energy efficiency, cleaner fuels, renewable power, scrap-based production और नई तकनीक में निवेश करना पड़ सकता है। लेकिन छोटे manufacturers के लिए ऐसी technology अपनाने में पूंजी की जरूरत होगी। इसलिए transition को सफल बनाने के लिए वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और साझा testing facilities महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
MSME Exporters को किस तरह की मदद चाहिए?
उद्योग प्रतिनिधियों ने affordable verification facilities, सरल emissions reporting systems और supplier-level data उपलब्ध कराने के लिए सरकारी समर्थन की मांग की है। यदि बड़े steel producers अपने उत्पादों के carbon footprint certificates समय पर साझा करें तो downstream MSMEs के लिए गणना आसान हो सकती है। Industry clusters में साझा measurement और verification centres भी लागत कम करने में मदद कर सकते हैं।
सरकार छोटे उद्योगों के लिए training programmes और standardised reporting tools उपलब्ध करा सकती है। इससे हर इकाई को अलग-अलग महंगे software या consultants पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वित्तीय सहायता से energy-efficient machinery और cleaner production technology अपनाने में भी मदद मिल सकती है।
CBAM का भारतीय Exporters पर अप्रत्यक्ष असर
CBAM के तहत EU importers की जिम्मेदारी होने के बावजूद भारतीय exporters पर व्यावसायिक दबाव आ सकता है। यूरोपीय ग्राहक supplier से emissions data मांगेंगे ताकि वे अपने compliance obligations पूरा कर सकें। यदि exporter जानकारी नहीं देता तो buyer default values का उपयोग कर सकता है या supplier बदलने पर विचार कर सकता है।
रिपोर्ट में कुछ उद्योग प्रतिनिधियों ने बताया कि यूरोपीय buyers compliance खर्च और paperwork को लेकर सतर्क हो रहे हैं। कुछ खरीदार finished products की sourcing पर भी विचार कर रहे हैं। लेकिन इन company-level उदाहरणों से पूरे भारतीय steel export sector में orders घटने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वास्तविक असर अलग-अलग products और buyers के अनुसार बदल सकता है।
भारत की Green Steel तैयारी
भारत अपने घरेलू carbon measurement और reporting ecosystem को मजबूत करने के लिए Carbon Credit Trading Scheme और Green Steel Taxonomy जैसी पहलों पर काम कर रहा है। इन पहलों से घरेलू स्तर पर emissions measurement और low-carbon steel की पहचान को बढ़ावा मिल सकता है। फिर भी exporters को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके records और verification EU के लागू CBAM नियमों के अनुरूप हों।
MSME-GIFT और MSE-SPICE जैसी योजनाएं छोटे उद्योगों को cleaner technology और circular economy investments के लिए समर्थन दे सकती हैं, लेकिन इन्हें सीधे CBAM compliance scheme नहीं समझना चाहिए। Exporters को अलग से यह जांचना होगा कि उपलब्ध योजनाओं में उनकी इकाई किस प्रकार पात्र है और क्या सहायता मिल सकती है।
आगे क्या समयसीमा है?
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के आयात से संबंधित पहली annual declaration और certificate surrender की deadline 30 सितंबर 2027 बताई गई है। EU के common platform पर certificates की खरीद फरवरी 2027 से शुरू होने की योजना है। इससे exporters और suppliers के पास emissions data, verification और reporting व्यवस्था तैयार करने के लिए सीमित समय है।
छोटे manufacturers को अभी से supplier data, energy use, production volumes और process emissions का रिकॉर्ड रखना चाहिए। यदि data collection बाद में शुरू की गई तो पुराने उत्पादन की जानकारी जुटाना कठिन हो सकता है। निर्यातकों को अपने EU buyers से यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें किस product category और reporting format में जानकारी चाहिए।
महत्वपूर्ण जानकारी
यह लेख Economic Times की 30 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट और उसमें उद्धृत उद्योग अनुमानों पर आधारित है। Compliance cost के आंकड़े industry estimates हैं, सभी MSMEs पर लागू तय लागत नहीं। CBAM की वास्तविक जिम्मेदारियां product classification और EU नियमों के अनुसार बदल सकती हैं।
यह लेख सामान्य व्यापारिक जानकारी के लिए है, कानूनी या कर सलाह नहीं। Exporters को EU की आधिकारिक CBAM guidance और योग्य compliance professional से सलाह लेनी चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. EU CBAM क्या है?
CBAM यूरोपीय संघ की carbon border व्यवस्था है। इसके तहत कुछ आयातित वस्तुओं से जुड़ी emissions की जानकारी और certificate obligations लागू होते हैं, ताकि आयातित और यूरोप में बने उत्पादों की carbon cost में अंतर कम हो।
2. भारत के कौन-से उद्योग CBAM से प्रभावित हैं?
शुरुआती दायरे में iron and steel, aluminium, cement, fertilisers, electricity और hydrogen शामिल हैं। भारत के steel exporters के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि EU भारतीय iron और steel का बड़ा खरीदार है।
3. क्या भारतीय MSME को सीधे CBAM certificate खरीदने होंगे?
EU के आयातकों पर covered goods के लिए मुख्य reporting और certificate obligations होते हैं। लेकिन भारतीय exporters से emissions data मांगा जा सकता है, इसलिए उन्हें supplier और production records तैयार रखने होंगे।
4. Emissions data न मिलने पर क्या हो सकता है?
यदि वास्तविक emissions data उपलब्ध नहीं होता तो EU rules के अनुसार default values का उपयोग हो सकता है। इससे कुछ products की अनुमानित carbon cost बढ़ सकती है और buyer के लिए sourcing महंगी हो सकती है।
5. MSME exporters CBAM की तैयारी कैसे करें?
उन्हें suppliers से carbon footprint data मांगना, energy और production records रखना, reporting system बनाना और मान्य verification की जरूरत समझनी चाहिए। Buyer की product-specific requirements पहले से जानना भी उपयोगी है।
निष्कर्ष
EU CBAM भारतीय steel MSMEs के लिए emissions data, verification और compliance cost की नई चुनौती है। समय पर supplier certificates, सरल reporting tools और सरकारी तकनीकी सहायता से छोटे exporters यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रख सकते हैं।
स्रोत: Economic Times की रिपोर्ट