आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बेचने की मंजूरी से केंद्र सरकार के विनिवेश अभियान को नई उम्मीद मिली है। हालांकि, सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर कमाई बढ़ाने की कोशिश का रिकॉर्ड अब तक उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। आज के संपादकीय और लेखों में शेयर बाजार के नियमों, उच्च शिक्षा संस्थानों में नेतृत्व की कमी, सरकारी कंपनियों के विनिवेश, दिवालिया कंपनियों के समाधान में देरी और दिल्ली के इतिहास पर लिखी गई एक किताब जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है।
IDBI Bank Sale से विनिवेश अभियान को नई उम्मीद
ए के भट्टाचार्य ने नरेंद्र मोदी सरकार के नए विनिवेश प्रयासों का आकलन किया है। 2021 के बाद चार रणनीतिक निजीकरण सौदों से सरकार को कुल 2,818.73 करोड़ रुपये मिले। इसके मुकाबले विनिवेश से होने वाली ज्यादातर कमाई सरकारी कंपनियों में अल्पांश हिस्सेदारी बेचने से आई है। सरकारी कंपनियों से मिलने वाले लाभांश पर बढ़ती निर्भरता और उन्हीं कंपनियों में सरकार की ओर से पूंजी डालने तथा कर्ज देने से इस नीति का आकलन और जटिल हो गया है।
लेख में सुझाव दिया गया है कि सरकार को विनिवेश और संपत्ति के मौद्रीकरण से मिली रकम का पारदर्शी विवरण देना चाहिए। साथ ही, सरकारी कंपनियों में किए जा रहे निवेश की भी बारीकी से समीक्षा होनी चाहिए। मकसद सार्वजनिक संपत्तियों से बेहतर रिटर्न हासिल करना है, लेकिन इसके साथ सरकारी पूंजीगत खर्च पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ना चाहिए।
SEBI के नए Closing Auction नियम
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। अगस्त में यह व्यवस्था शुरू होने के बाद खासकर डेरिवेटिव कारोबार करने वालों के लिए बाजार बंद होने के समय कीमतों में उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता बढ़ी थी। नया ढांचा 7 दिसंबर से लागू होगा। इसके तहत एक्सपायरी वाले दिन सेटलमेंट के लिए वॉल्यूम-वेटेड औसत कीमत की पद्धति फिर लागू होगी और एक्सपायर होने वाले इंडेक्स डेरिवेटिव के ट्रेडिंग कटऑफ को कैश मार्केट के समय के साथ जोड़ा जाएगा।
संपादकीय के मुताबिक, भारत में ऑक्शन का कारोबार अभी दैनिक कैश मार्केट टर्नओवर का लगभग एक प्रतिशत है। इस वजह से क्लोजिंग कीमतों में हेरफेर का जोखिम बना रहता है। बाजार व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ऑक्शन में भागीदारी बढ़ाने, शेयर उधार देने और लेने की व्यवस्था बेहतर करने तथा शॉर्ट सेलिंग से जुड़े नियमों में सुधार की जरूरत है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में नेतृत्व की कमी
भारत के 155 राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में से लगभग एक चौथाई संस्थान स्थायी प्रमुख के बिना काम कर रहे हैं। रिक्त पदों और अंतरिम नियुक्तियों के कारण निर्णय लेने, शैक्षणिक योजना बनाने और शोध साझेदारी पर असर पड़ता है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दिसंबर 2024 तक स्वीकृत शिक्षण पदों में 29 प्रतिशत खाली थे। प्रोफेसर स्तर पर यह आंकड़ा 56 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
लेख में कहा गया है कि कई बार पद खाली होने की जानकारी पहले से होने के बावजूद नियुक्तियों में देरी होती है। सुझाव है कि संभावित रिक्ति से छह महीने पहले नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की जाए, समय-सीमा पारदर्शी रखी जाए और अंतरिम व्यवस्था को सीमित किया जाए। चयन प्रक्रिया स्वतंत्र और योग्यता पर आधारित होनी चाहिए, ताकि संस्थानों की स्वायत्तता और शैक्षणिक गुणवत्ता सुरक्षित रहे।
दिवालिया कंपनियों के समाधान में देरी की चुनौती
आरााध्या श्रीवास्तव, प्रतिभा कुमारी और जितिन पी. के लेख के अनुसार, दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) का असर सिर्फ संकट में फंसी कंपनियों के समाधान तक सीमित नहीं है। शुरुआती दौर में तेजी से समाधान और बेहतर वसूली ने कर्जदाताओं का भरोसा बढ़ाया और कर्ज की उपलब्धता तथा लागत पर सकारात्मक असर डाला। शोध में यह भी सामने आया कि कुछ संकटग्रस्त कंपनियों ने परिचालन प्रदर्शन सुधारते हुए अधिक जोखिम लिए।
लेकिन समाधान में बढ़ता समय इस व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए चुनौती बन रहा है। अप्रैल से जून 2026 के दौरान पुनर्गठन में औसतन 1,026 दिन और परिसमापन में 1,378 दिन लगे। लेखकों के मुताबिक, कर्ज की समय पर वसूली जरूरी है, क्योंकि इससे ऋण, निवेश और वित्तीय स्थिरता को सहारा मिलता है।
दिल्ली के इतिहास पर नई किताब की समीक्षा
वीणु संधू ने जॉन जुब्रज़िकी की किताब The Shortest History of Delhi की समीक्षा की है। यह किताब दिल्ली के इतिहास को इंद्रप्रस्थ से जुड़ी मान्यताओं, सल्तनत, मुगल काल और ब्रिटिश शासन के दौर से होते हुए आधुनिक शहर तक देखती है। इसमें शासकों, इतिहासकारों और आम लोगों के अनुभवों के जरिए शहर में आए सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों को समझाया गया है।
समीक्षा में विभाजन को दिल्ली की आधुनिक पहचान का अहम मोड़ बताया गया है। किताब में नक्शे, तस्वीरें और जानकारी देने वाले हिस्से भी शामिल हैं। साथ ही, दिल्ली के अनियोजित विस्तार, कमजोर होते बुनियादी ढांचे और सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास पर सवाल उठाए गए हैं। किताब के अनुसार, दिल्ली एक ऐसा शहर है जिसकी पहचान लगातार बदलती और विवादों के बीच आकार लेती रही है।
इन सभी लेखों में नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन, पारदर्शिता और समय पर फैसले लेने की जरूरत सामने आती है। IDBI Bank की बिक्री से विनिवेश को नई गति मिलने की उम्मीद है, लेकिन सरकारी संपत्तियों से बेहतर नतीजे हासिल करने के लिए स्पष्ट जवाबदेही और लगातार समीक्षा भी जरूरी होगी।