भारत सरकार देश में जहाज निर्माण उद्योग को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण कोरिया और जापान की बड़ी कंपनियों से निवेश आकर्षित करने की तैयारी कर रही है।
इसके लिए बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय अगले महीने सरकारी अधिकारियों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों का एक दल इन दोनों देशों में भेजने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य भारत में जहाज बनाने और उनकी मरम्मत करने से जुड़ी परियोजनाओं के लिए बड़े निवेशकों को जोड़ना है। सरकार चाहती है कि अब तक घोषित योजनाओं और तैयारियों को वास्तविक निवेश में बदला जा सके।
भारत में जहाज निर्माण उद्योग को बढ़ावा देने की तैयारी

इस पहल के तहत दक्षिण कोरिया की प्रमुख जहाज निर्माता कंपनी एचडी हुंडई के साथ बातचीत आगे बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। दिसंबर 2025 में कंपनी ने तमिलनाडु सरकार के साथ एक समझौता किया था। इसके तहत तूतीकोरिन में लगभग 4 अरब डॉलर की लागत से नया जहाज निर्माण केंद्र स्थापित करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। अप्रैल में इस परियोजना को लेकर तीन पक्षों के बीच एक और समझौता हुआ था। सितंबर में इसकी विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने का काम शुरू हुआ। हालांकि, अभी इस परियोजना के लिए अंतिम निवेश प्रतिबद्धता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
दूसरी ओर, एचडी कोरिया शिपबिल्डिंग एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग ने अगस्त में कोचीन शिपयार्ड के साथ मिलकर कोच्चि में जहाजों के ढांचे के हिस्से बनाने वाली इकाई स्थापित करने की योजना की समीक्षा रोक दी थी। इसके बावजूद दोनों कंपनियों के बीच तकनीकी सहयोग जारी रहने की बात कही गई है। इससे पता चलता है कि किसी परियोजना पर बातचीत आगे बढ़ना और उसके लिए अंतिम निवेश मंजूर होना अलग-अलग बातें हैं।
🚢 भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र की प्रमुख योजनाएं
- विदेशी निवेश: दक्षिण कोरिया और जापान की कंपनियों को आकर्षित करने की तैयारी।
- प्रस्तावित परियोजना: तूतीकोरिन में लगभग 4 अरब डॉलर की लागत वाला जहाज निर्माण केंद्र।
- घरेलू विकास: पांच नए जहाज निर्माण केंद्रों की पहचान।
- मरम्मत सुविधाएं: मौजूदा समुद्री बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने की योजना।
- मुख्य लक्ष्य: भारत की जहाज निर्माण क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना।
दक्षिण कोरिया और जापान से तकनीकी सहयोग की उम्मीद
सरकार दक्षिण कोरिया और जापान की कंपनियों के साथ बातचीत के जरिए तकनीक के आदान-प्रदान, वित्तीय सहायता और भारतीय सरकारी तथा निजी जहाज निर्माण कंपनियों के साथ साझेदारी की संभावनाएं तलाशना चाहती है। सरकार का उद्देश्य विदेशी कंपनियों के अनुभव का लाभ उठाकर देश में आधुनिक जहाज निर्माण सुविधाएं विकसित करना है। इससे भारतीय उद्योग की उत्पादन क्षमता बढ़ाने और वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
69,725 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज से उद्योग को मिलेगा समर्थन
पिछले वर्ष अक्टूबर में केंद्र सरकार ने जहाज निर्माण, मरम्मत और पुनर्चक्रण की सुविधाओं को विकसित करने के लिए 69,725 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज की घोषणा की थी। इस योजना में समुद्री विकास कोष के लिए 25,000 करोड़ रुपये, जहाज निर्माण से जुड़ी वित्तीय सहायता के लिए 24,736 करोड़ रुपये और जहाज निर्माण केंद्रों के विकास के लिए 19,989 करोड़ रुपये शामिल हैं। इस राशि के माध्यम से उद्योग के लिए जरूरी सुविधाएं तैयार करने और निवेश को प्रोत्साहित करने की योजना है।
भारत ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र में पांच नए जहाज निर्माण केंद्र विकसित करने की पहचान की है। इसके अलावा, पहले से मौजूद सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए तीन परियोजनाओं की योजना है। इनमें गुजरात के वडीनार में जहाजों की मरम्मत से जुड़ी सुविधाएं और कांडला के साथ केरल में कोचीन बंदरगाह के पास जहाज निर्माण सुविधाओं का विकास शामिल है।
जहाज निर्माण केंद्रों से सहायक कारोबार को भी बढ़ावा
इन केंद्रों का उद्देश्य केवल जहाज बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। यहां जहाजों के उपकरण बनाने वाली कंपनियों, कलपुर्जों के आपूर्तिकर्ताओं, ईंधन भरने की सुविधाओं, जहाज पट्टे पर देने वाली कंपनियों और अन्य समुद्री सेवाओं से जुड़े कारोबार को भी जगह मिल सकती है। इससे जहाज निर्माण उद्योग के आसपास कई सहायक व्यवसाय विकसित होने की संभावना है।
📊 जहाज निर्माण क्षेत्र के लिए सरकारी लक्ष्य
- कुल सहायता पैकेज: 69,725 करोड़ रुपये
- समुद्री विकास कोष: 25,000 करोड़ रुपये
- जहाज निर्माण वित्तीय सहायता: 24,736 करोड़ रुपये
- जहाज निर्माण केंद्रों का विकास: 19,989 करोड़ रुपये
- वर्ष 2030 का लक्ष्य: दुनिया के शीर्ष 10 जहाज निर्माता देशों में जगह बनाना।
- वर्ष 2047 का लक्ष्य: दुनिया के शीर्ष 5 जहाज निर्माता देशों में शामिल होना।
भारत वैश्विक जहाज निर्माण बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है
सरकार छोटे तटीय जहाजों से लेकर बड़े व्यापारिक जहाजों तक के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना चाहती है। इसके साथ ही विदेशी ग्राहकों से भी नए ऑर्डर हासिल करने का लक्ष्य है। भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और बड़े समुद्री व्यापार के बावजूद वैश्विक जहाज निर्माण में देश की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम बताई जाती है। दक्षिण कोरिया की तकनीकी विशेषज्ञता इस अंतर को कम करने में मदद कर सकती है, क्योंकि वहां बड़े व्यापारिक जहाज बनाने और आधुनिक जहाज निर्माण केंद्र विकसित करने का व्यापक अनुभव है।
भारत सरकार वर्ष 2030 तक दुनिया के शीर्ष दस जहाज निर्माता देशों में और 2047 तक शीर्ष पांच देशों में जगह बनाने का लक्ष्य रख रही है। जापान और दक्षिण कोरिया के साथ प्रस्तावित बातचीत इसी दिशा में एक कदम है। हालांकि, केवल नई सुविधाएं तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को यह भरोसा भी चाहिए कि भारत में बने जहाजों की पर्याप्त मांग होगी और परियोजनाओं को समय पर पूरा किया जा सकेगा।
विदेशी निवेश के लिए पर्याप्त ऑर्डर होना जरूरी
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करने में रुचि दिखा सकती हैं, क्योंकि यहां कुशल श्रमिक उपलब्ध हैं और सरकार की ओर से वित्तीय सहायता सहित कई प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। लेकिन बड़े निवेश के लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सरकारी कंपनियां और निजी कारोबार भारत में बने जहाज खरीदने के लिए पर्याप्त ऑर्डर देंगे। मांग को लेकर भरोसा मिलने पर निवेश का फैसला करना कंपनियों के लिए आसान हो सकता है।
जैस्पर शिपिंग के अधिकारी पुष्पक कौशिक के अनुसार, समुद्री माल ढुलाई, तटीय परिवहन, जहाजों की मरम्मत और नए जहाजों की जरूरत बढ़ने से भारत में इस क्षेत्र के विकास की संभावनाएं बन रही हैं। वहीं, ईवाई इंडिया के कुलजीत सिंह का मानना है कि भारत में बने जहाजों के लिए बड़े स्तर पर मांग का भरोसा मिलने से निवेश को गति मिल सकती है।
भारत के जहाज निर्माण उद्योग का भविष्य
यदि सरकार किसी बड़े विदेशी निवेशक से अंतिम सहमति हासिल कर लेती है, तो प्रस्तावित जहाज निर्माण केंद्रों को निर्माण के अगले चरण में ले जाना आसान हो सकता है। इससे नए रोजगार पैदा होने, सहायक उद्योगों के विकसित होने और देश में जहाजों का उत्पादन बढ़ने की संभावना है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दक्षिण कोरिया और जापान के साथ होने वाली बातचीत से कितनी ठोस निवेश प्रतिबद्धताएं सामने आती हैं और भारत अपनी जहाज निर्माण योजनाओं को जमीन पर उतारने में कितना सफल रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. भारत सरकार किन देशों से जहाज निर्माण में निवेश आकर्षित करना चाहती है?
भारत सरकार दक्षिण कोरिया और जापान की बड़ी कंपनियों से निवेश आकर्षित करना चाहती है। इसके लिए अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों का दल भेजने की योजना है। इसका उद्देश्य जहाज निर्माण, मरम्मत और आधुनिक समुद्री सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना है।
2. जहाज निर्माण उद्योग के लिए सरकार ने कितने रुपये के पैकेज की घोषणा की है?
केंद्र सरकार ने जहाज निर्माण, मरम्मत और पुनर्चक्रण सुविधाओं को विकसित करने के लिए 69,725 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज की घोषणा की थी। इसमें समुद्री विकास कोष, वित्तीय सहायता और जहाज निर्माण केंद्रों के विकास के लिए अलग-अलग राशि निर्धारित की गई है।
3. भारत में नया जहाज निर्माण केंद्र कहां प्रस्तावित है?
दक्षिण कोरिया की कंपनी एचडी हुंडई और तमिलनाडु सरकार के बीच हुए समझौते के तहत तूतीकोरिन में लगभग 4 अरब डॉलर की लागत से जहाज निर्माण केंद्र स्थापित करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। परियोजना की अंतिम निवेश प्रतिबद्धता की स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
4. भारत ने जहाज निर्माण उद्योग के लिए क्या लक्ष्य तय किए हैं?
भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक दुनिया के शीर्ष दस जहाज निर्माता देशों में और वर्ष 2047 तक शीर्ष पांच देशों में जगह बनाना है। इसके लिए सरकार घरेलू उत्पादन, विदेशी निवेश, तकनीकी सहयोग और जहाज निर्माण से जुड़ी सुविधाओं को बढ़ावा देना चाहती है।
5. विदेशी कंपनियां भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र में निवेश क्यों कर सकती हैं?
भारत में कुशल श्रमिकों की उपलब्धता, सरकारी वित्तीय सहायता और समुद्री कारोबार की संभावनाएं विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर सकती हैं। हालांकि, निवेश के लिए भारत में बने जहाजों की पर्याप्त मांग, समय पर परियोजना पूरी होने और स्थिर कारोबारी माहौल का भरोसा भी महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
दक्षिण कोरिया और जापान से निवेश हासिल करना भारत के जहाज निर्माण उद्योग के लिए महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। सरकारी सहायता, तकनीकी सहयोग और पर्याप्त ऑर्डर मिलने पर उत्पादन और रोजगार बढ़ सकते हैं। हालांकि, योजनाओं की सफलता वास्तविक निवेश और परियोजनाओं के समय पर पूरा होने पर निर्भर करेगी।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। निवेश और सरकारी परियोजनाओं से जुड़े निर्णय लेने से पहले संबंधित मंत्रालय की आधिकारिक घोषणाओं की पुष्टि करें।