India Steel Coal Supply: 2047 तक बड़ी चुनौती की चेतावनी

भारत की steel industry के सामने आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती हो सकती है। Institute for Energy Economics and Financial Analysis (IEEFA) की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट ने भारत की draft National Steel Policy Vision 2047 में metallurgical coal की जरूरत को लेकर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2047 तक steel sector को कुल 284 million tonnes metallurgical coal की जरूरत हो सकती है। वहीं, दुनिया के प्रमुख निर्यातक देशों से आने वाली आपूर्ति इतनी तेजी से बढ़ेगी या नहीं, इस पर सवाल हैं।

भारत की steel policy में coal demand का अनुमान

भारत की draft National Steel Policy Vision 2047 का लक्ष्य देश की steelmaking capacity को 604 million tonnes तक पहुंचाना है। बड़े स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के लिए iron ore, coking coal, electricity और अन्य कच्चे माल की जरूरत भी बढ़ेगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि coking coal की मांग 2025 के 72 million tonnes से बढ़कर 2047 तक 236 million tonnes हो सकती है। इसके अलावा pulverised coal injection यानी PCI coal की जरूरत 17 million tonnes से बढ़कर 48 million tonnes तक पहुंच सकती है। दोनों को मिलाकर कुल metallurgical coal मांग 284 million tonnes तक होने का अनुमान है।

यह अनुमान policy document पर आधारित है, भविष्य का निश्चित आंकड़ा नहीं। वास्तविक मांग steel production की गति, technology mix, scrap recycling और hydrogen-based steelmaking जैसे विकल्पों पर निर्भर करेगी। यदि भारत blast furnace-basic oxygen furnace (BF-BOF) route का उपयोग बढ़ाता है तो coking coal की जरूरत अधिक हो सकती है। दूसरी ओर, electric arc furnace और scrap आधारित उत्पादन का हिस्सा बढ़ने से कुछ coal demand कम की जा सकती है। इसलिए उत्पादन क्षमता के लक्ष्य के साथ तकनीक का चुनाव भी बहुत महत्वपूर्ण होगा।

⚠️ Steel Coal Demand की बड़ी चुनौती

  • 2047 की कुल met coal जरूरत: 284 million tonnes
  • Coking coal अनुमान: 236 million tonnes
  • PCI coal अनुमान: 48 million tonnes
  • वर्तमान निर्भरता: coking coal का बड़ा हिस्सा आयात
  • मुख्य जोखिम: वैश्विक supply और कीमतों में अनिश्चितता

भारत आयात पर इतना निर्भर क्यों है?

भारत के पास घरेलू coal reserves हैं, लेकिन steelmaking में इस्तेमाल होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले coking coal की उपलब्धता सीमित है। Draft policy के अनुसार भारत अपनी coking coal जरूरत का लगभग 92 प्रतिशत विदेशों से पूरा करता है। PCI coal की मांग भी बड़े स्तर पर आयात से पूरी होती है। इस कारण भारतीय steelmakers को ऑस्ट्रेलिया, रूस और अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की mining policy, मौसम, बंदरगाह, समुद्री freight और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर झेलना पड़ सकता है।

आयात पर निर्भरता का मतलब है कि रुपये और डॉलर की विनिमय दर भी लागत को प्रभावित करती है। यदि वैश्विक coal कीमत बढ़ती है या समुद्री परिवहन महंगा होता है तो भारतीय steel plants की production cost बढ़ सकती है। कंपनियां कुछ लागत ग्राहकों पर डाल सकती हैं, जिससे निर्माण, वाहन और engineering products की कीमतों पर असर पड़ सकता है। यदि कीमतें तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकें तो कंपनियों के margins पर दबाव आ सकता है।

वैश्विक supply को लेकर IEEFA की चिंता

IEEFA की रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया, रूस और कनाडा जैसे प्रमुख निर्यातक देशों से metallurgical coal exports 2035 में 2025 के स्तर से कम हो सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के बड़े coking coal exporters में शामिल है, लेकिन वहां उत्पादन लागत, खदानों की उम्र, नई परियोजनाओं की मंजूरी और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे भविष्य की आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं। रिपोर्ट ने यह भी बताया कि ऑस्ट्रेलिया अपने export forecasts में कई बार कमी कर चुका है।

रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार के आंकड़ों की तुलना करते हुए कहा गया है कि 2025 में Mongolia को छोड़कर metallurgical coal का seaborne trade करीब 279 million tonnes था। यह भारत की 2047 के लिए अनुमानित 284 million tonnes मांग से कम है। हालांकि यह तुलना भविष्य की मांग और वर्तमान वैश्विक व्यापार को साथ रखती है, इसलिए इसे संभावित जोखिम का संकेत समझना चाहिए, निश्चित supply gap नहीं। आने वाले वर्षों में नई खदानें, व्यापार समझौते और steelmaking technology इस तस्वीर को बदल सकते हैं।

Steel production के लिए coal क्यों जरूरी है?

Traditional blast furnace route में coking coal को coke में बदला जाता है, जो iron ore से iron निकालने की प्रक्रिया में ईंधन और reducing agent की भूमिका निभाता है। इसी कारण उच्च गुणवत्ता वाले coking coal की जरूरत steel plants के लिए अहम है। हर प्रकार का coal इस काम के लिए उपयुक्त नहीं होता। Coal की गुणवत्ता, ash content, strength और अन्य रासायनिक गुणों का उत्पादन प्रक्रिया पर असर पड़ता है। इसलिए घरेलू coal का उपयोग बढ़ाने के लिए washing, blending और processing में सुधार करना पड़ सकता है।

भारत की policy में घरेलू coal washeries बढ़ाने, बेहतर coal blending और transport bottlenecks कम करने जैसे उपायों का उल्लेख है। इससे उपलब्ध घरेलू coal का उपयोग कुछ हद तक बढ़ सकता है। लेकिन IEEFA ने इन उपायों की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठाए हैं। यदि घरेलू coal की गुणवत्ता और मात्रा जरूरत के अनुसार नहीं बढ़ती तो आयात पर निर्भरता बनी रह सकती है। इसीलिए supply security को केवल खदान खोलने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि processing और logistics भी मजबूत करने होंगे।

Scrap और hydrogen-based steelmaking विकल्प

रिपोर्ट के अनुसार scrap steel recycling और hydrogen-based production जैसे coal-free या कम coal वाले रास्ते आयात जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं। Scrap आधारित electric arc furnace में पुराने steel products और औद्योगिक scrap को पिघलाकर नया steel बनाया जाता है। इससे blast furnace route की तुलना में coal की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन पर्याप्त मात्रा में साफ scrap, बिजली और आधुनिक furnace की उपलब्धता जरूरी है। Scrap की गुणवत्ता और collection व्यवस्था भी उत्पादन की लागत तय करती है।

Hydrogen-based direct reduced iron तकनीक में hydrogen का उपयोग iron ore से oxygen हटाने के लिए किया जा सकता है। यदि hydrogen renewable electricity से बनाया जाए तो steel production का carbon footprint घट सकता है। लेकिन green hydrogen अभी कई जगह महंगा है और बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए renewable power, electrolyser, storage तथा transport infrastructure की जरूरत होगी। इसलिए इसे तुरंत coal का पूर्ण विकल्प मानना सही नहीं होगा। इसे लंबे समय की तकनीकी रणनीति के हिस्से के रूप में देखना चाहिए।

Steel companies और उपभोक्ताओं पर संभावित असर

यदि coking coal की आपूर्ति सीमित रही तो steelmakers को महंगे आयात, ज्यादा inventory और वैकल्पिक suppliers पर खर्च करना पड़ सकता है। बड़ी कंपनियां long-term contracts और overseas assets के जरिए जोखिम घटाने की कोशिश कर सकती हैं। छोटे steel producers के पास ऐसे विकल्प सीमित हो सकते हैं। इससे उद्योग में लागत का अंतर बढ़ सकता है। Steel की कीमतों में बदलाव का असर construction, infrastructure, automobile, appliances और engineering sectors तक पहुंच सकता है।

आम उपभोक्ताओं पर असर अप्रत्यक्ष होगा। घर, वाहन, मशीन, बिजली उपकरण और सार्वजनिक infrastructure में steel का इस्तेमाल होता है। यदि raw material लागत लंबे समय तक बढ़ती है तो कुछ उत्पादों की कीमत या परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है। हालांकि अंतिम कीमत में labour, transport, tax, demand और competition का भी योगदान होता है। इसलिए coal की एक रिपोर्ट के आधार पर किसी उत्पाद की कीमत बढ़ने का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

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भारत को आगे कौन से कदम उठाने होंगे?

भारत को coking coal के स्रोतों में विविधता लाने, घरेलू खनन और washing क्षमता सुधारने तथा बेहतर logistics विकसित करने की जरूरत होगी। इसके साथ steel plants को energy efficiency और scrap use बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। नई तकनीकों को अपनाने के लिए research, pilot projects और skilled workforce में निवेश जरूरी है। नीति में केवल capacity target नहीं, बल्कि कच्चे माल की वास्तविक उपलब्धता और पर्यावरणीय असर का भी हिसाब होना चाहिए।

सरकार और उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम यह होगा कि 2047 के लक्ष्य को चरणों में बांटा जाए। हर चरण में coal demand, import dependence, domestic supply और low-carbon technology की प्रगति की समीक्षा की जा सकती है। यदि वैश्विक coal supply कम होती है तो समय रहते वैकल्पिक रास्ते विकसित करने होंगे। Steel production बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसे ऐसी supply chain पर आधारित करना भी जरूरी है जो कीमतों के झटकों और अंतरराष्ट्रीय संकटों को सह सके।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. भारत को 2047 तक कितने metallurgical coal की जरूरत हो सकती है?

IEEFA की रिपोर्ट में draft policy के अनुमान के अनुसार 2047 तक भारत की कुल metallurgical coal जरूरत 284 million tonnes हो सकती है। इसमें coking coal और pulverised coal injection coal दोनों शामिल हैं।

2. भारत coking coal का कितना हिस्सा आयात करता है?

Draft National Steel Policy के अनुसार भारत अपनी coking coal जरूरत का लगभग 92 प्रतिशत आयात करता है। इससे घरेलू steel industry वैश्विक आपूर्ति, कीमतों और समुद्री परिवहन में बदलाव के प्रति संवेदनशील रहती है।

3. Coking coal steel production में क्यों जरूरी है?

Blast furnace आधारित steelmaking में coking coal से बना coke iron ore से iron निकालने की प्रक्रिया में मदद करता है। इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता उत्पादन की लागत तथा क्षमता को प्रभावित करती है।

4. क्या scrap recycling से coal की जरूरत कम हो सकती है?

हां, scrap आधारित electric arc furnace route में पुराने steel को पिघलाकर नया steel बनाया जा सकता है। इससे पारंपरिक blast furnace route के मुकाबले coal की जरूरत कम हो सकती है, लेकिन scrap और बिजली की उपलब्धता जरूरी है।

5. क्या hydrogen steelmaking अभी coal का विकल्प बन सकती है?

Hydrogen-based steelmaking एक उभरता विकल्प है, लेकिन इसे बड़े स्तर पर लागू करने के लिए सस्ती green hydrogen, renewable electricity और नई औद्योगिक सुविधाओं की जरूरत है। इसलिए इसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ने की संभावना है।

निष्कर्ष

भारत की steel capacity बढ़ाने के साथ coking coal की भरोसेमंद आपूर्ति जरूरी होगी। Scrap recycling, बेहतर sourcing और hydrogen तकनीक भविष्य के जोखिम कम करने में मदद कर सकती हैं।

Disclaimer: कोयले की मांग के आंकड़े नीति और शोध रिपोर्ट के अनुमान हैं। भविष्य की वास्तविक जरूरत उत्पादन और तकनीक के अनुसार बदल सकती है।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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