जिंदल स्टेनलेस ने सिक्कों के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के खाली टुकड़ों की अपनी सालाना उत्पादन क्षमता बढ़ाने का फैसला किया है। कंपनी इसे 10,000 टन से बढ़ाकर 12,000 टन करने जा रही है, यानी क्षमता में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। कंपनी को उम्मीद है कि अलग-अलग देशों में कागजी मुद्रा के बजाय धातु के सिक्कों की मांग बढ़ने से इस कारोबार में नए अवसर मिलेंगे।
जिंदल स्टेनलेस बढ़ाएगी सिक्कों के धातु टुकड़ों की क्षमता
कंपनी के हिसार स्थित विशेष उत्पाद प्रभाग में सिक्कों के लिए जरूरी इन खाली धातु टुकड़ों का उत्पादन कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच किया जाता है। यहां सिक्कों के अलावा रेजर ब्लेड और बेहद सटीक धातु पट्टियों जैसे दूसरे विशेष उत्पाद भी बनाए जाते हैं। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, बहुत से लोगों को जानकारी नहीं है कि जिंदल स्टेनलेस भारत के साथ-साथ कई विदेशी टकसालों के लिए भी सिक्कों की सामग्री तैयार करती है।
कंपनी भारत, फ्रांस, फिनलैंड, पोलैंड, नीदरलैंड, ब्रिटेन, मलेशिया और स्लोवाकिया की टकसालों को बिना छपे सिक्के के टुकड़े उपलब्ध कराती है। इनका आकार और बनावट संबंधित टकसाल की जरूरत के अनुसार तय की जाती है। इसमें व्यास, मोटाई, आकार और इस्तेमाल होने वाली धातु की संरचना जैसी चीजों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
विदेशी बाजारों से नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद
कंपनी का मानना है कि आने वाले समय में उसे दूसरे देशों से भी नए ऑर्डर मिल सकते हैं। स्टेनलेस स्टील के उत्पादन में अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन होने के कारण इसकी मांग बढ़ने की उम्मीद है। इसी संभावना को देखते हुए कंपनी नए बाजारों में प्रवेश करने और उन सिक्कों के लिए भी ऑर्डर हासिल करने की कोशिश कर रही है, जिनका उत्पादन वह अभी नहीं करती।
🪙 सिक्कों के कारोबार से जुड़ी अहम बातें
- मौजूदा क्षमता: 10,000 टन सालाना
- नई क्षमता: 12,000 टन सालाना
- क्षमता बढ़ोतरी: करीब 20 प्रतिशत
- विदेशी बाजार: कई देशों की टकसालों को सामग्री की आपूर्ति
- जरूरी मानक: व्यास, मोटाई, आकार और धातु की संरचना
- भविष्य की योजना: नए देशों से ऑर्डर हासिल करने पर जोर
रेजर ब्लेड कारोबार में भी बड़ी हिस्सेदारी
हिसार स्थित विशेष उत्पाद इकाई में रेजर ब्लेड का कारोबार भी काफी बड़ा है। कंपनी के अनुसार इस क्षेत्र में उसकी वैश्विक हिस्सेदारी करीब 60 से 70 प्रतिशत है। हाल में रेजर ब्लेड की सालाना उत्पादन क्षमता 13,200 टन से बढ़ाकर 19,500 टन की गई है। इन उत्पादों की आपूर्ति भारत के अलावा पोलैंड, वियतनाम, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी की जाती है।
हिसार का यह संयंत्र जिंदल स्टेनलेस की पुरानी औद्योगिक इकाइयों में से एक है। यहां 1970 में कार्बन स्टील का उत्पादन शुरू हुआ था और 1978 में इसे स्टेनलेस स्टील उत्पादन में बदला गया। इसका उद्देश्य उस समय देश की आयात पर निर्भरता को कम करना था।
🏭 हिसार संयंत्र की खास बातें
- पुराना उत्पादन: 1970 में कार्बन स्टील का उत्पादन शुरू हुआ
- बदलाव: 1978 में स्टेनलेस स्टील उत्पादन में बदला गया
- रेजर ब्लेड क्षमता: 13,200 टन से बढ़कर 19,500 टन
- वैश्विक हिस्सेदारी: करीब 60 से 70 प्रतिशत
- जल प्रबंधन: पानी और एसिड को साफ करके दोबारा इस्तेमाल किया जाता है
- हरित ऊर्जा लक्ष्य: कुल ऊर्जा जरूरत में हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से बढ़ाकर 80 प्रतिशत
पानी और रसायनों के दोबारा इस्तेमाल पर जोर
संयंत्र में पानी और औद्योगिक रसायनों के दोबारा इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया जा रहा है। यहां ऐसी व्यवस्था है जिसमें इस्तेमाल किए गए पानी और एसिड को साफ करके फिर से काम में लिया जाता है। इससे औद्योगिक गंदे पानी को बाहर निकालने की जरूरत काफी कम हो जाती है।
कंपनी अपने उत्पादन में हरित ऊर्जा का इस्तेमाल भी बढ़ा रही है। इस साल संयंत्र की कुल ऊर्जा जरूरत में हरित ऊर्जा की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से बढ़ाकर 80 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए कंपनी हाइड्रोजन से जुड़े दो प्रोजेक्ट और एक तैरते हुए सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट का सहारा ले रही है।
अस्वीकरण: यह जानकारी सामान्य समाचार उद्देश्य के लिए है और कंपनी की भविष्य की योजनाएं परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती हैं।
