दिल्ली में 18 अक्टूबर को Lakme Fashion Week x FDCI के आखिरी दिन डिजाइनर अमित अग्रवाल के शो की शुरुआत तेज रोशनी और सड़क जैसे बनाए गए रैंप से हुई। वहां ट्रैफिक सिग्नल, लैम्प पोस्ट पर प्लास्टिक के कबूतर और “Kiss” तथा “No Stress” जैसे बोर्ड लगाए गए थे। इसके बाद AM:IT के “On A Day Like Today” कलेक्शन के कपड़े पेश किए गए। इस शो में रोजमर्रा के भारतीय जीवन से प्रेरणा लेकर रंग और अलग-अलग सामग्री का इस्तेमाल किया गया।
Lakme Fashion Week में रंगों और प्रयोगों की भरमार
अमित अग्रवाल ने रंगीन प्लास्टिक की चटाइयों को चमकदार इकट और गिंगहम जैसे पैटर्न में बदला। इनसे बैग, स्कर्ट, कॉर्सेट, केप और घुटनों तक लटकती झालरों वाले कपड़े बनाए गए। सूती शर्ट और जैकेट पर भी चटाई से बनी जेबें लगाई गईं। मॉडलों के गले में प्लास्टिक की मालाएं भी दिखाई दीं। डिजाइन में प्रयोग जरूर था, लेकिन इतने प्लास्टिक वाले कपड़े पहनना गर्मी और आराम के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कलेक्शन में रोजमर्रा के भारतीय दृश्य भी शामिल थे। एक मॉडल तिरपाल से बने कपड़ों में साइकिल चलाती दिखी, जबकि दूसरे दृश्य में पुरुष ऑटो रिक्शा में बैठे थे। एक मॉडल आइसक्रीम की गाड़ी भी धकेलती नजर आई। इन प्रस्तुतियों ने भारतीय सड़कों और आम जिंदगी को फैशन के मंच पर लाने की कोशिश की।
🎨 शो में क्या रहा खास
- मुख्य डिजाइनर: अमित अग्रवाल और AM:IT
- प्रमुख सामग्री: प्लास्टिक की चटाई, सूती कपड़ा और तिरपाल
- प्रेरणा: भारतीय सड़कें और रोजमर्रा की जिंदगी
- खास बात: रंगीन पैटर्न और सामग्री के नए प्रयोग
- कमी: कुछ कपड़ों में आराम और नए आकार को लेकर सवाल
फैशन वीक की शुरुआत पेरो के शो से हुई, जिसमें Mattel की Barbie दुनिया से प्रेरित गुलाबी रंगों का खूब इस्तेमाल किया गया। मॉडल गुलाबी और चटख रंगों के कपड़ों में रैंप पर चले, रोलर स्केटिंग की और नृत्य भी किया। हालांकि, लंबे जैकेट, छोटे शॉर्ट्स, शर्ट, टी-शर्ट और ट्राउजर पर फूलों के प्रिंट, धारियां, क्रोशिया, लेस और बो जैसे डिजाइन देखने को मिले, लेकिन इनमें से कई अंदाज पहले भी फैशन में दिखाई दे चुके हैं।
भारतीय कपड़ों और पारंपरिक कारीगरी की झलक
पांच दिन के इस आयोजन में 20 से अधिक डिजाइनरों ने शर्ट, टी-शर्ट, कोट, जैकेट, स्कर्ट और ड्रेस जैसे आम कपड़ों को नए रंगों और सतहों के साथ पेश किया। रंगों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर इस्तेमाल करने का चलन भी दिखा। इसके बावजूद कपड़ों के नए आकार और अलग सिल्हूट कम नजर आए।
समंत चौहान ने अपने “Where My Home Is” कलेक्शन में भागलपुर सिल्क के साथ प्रयोग किए। कुछ कपड़ों पर धातु जैसी झालरें और लटकन थीं, जबकि कुछ पारंपरिक राजस्थानी पहनावे से प्रेरित थे। सुनहरे रंग का टॉप और सफेद धोती जैसी स्कर्ट आकर्षक दिखे, लेकिन कुछ कपड़ों का अनुपात और फिटिंग बेहतर हो सकती थी। इसके मुकाबले छोटे और कढ़ाई वाले डिजाइन ज्यादा संतुलित लगे।
सुनीत वर्मा के काशी से प्रेरित कलेक्शन में भी चमक और कढ़ाई का खूब इस्तेमाल हुआ। काले जॉगर्स, काले-सफेद लेस वाली साड़ी और धातु जैसी सजावट वाले ट्राउजर पेश किए गए। घाट की कढ़ाई वाली सीधी काली स्कर्ट खास थी, लेकिन उसके साथ पहने गए चांदी जैसे टॉप और केप ने स्कर्ट की बारीकी को कुछ हद तक छिपा दिया।
⚠️ डिजाइन में दिखीं ये कमियां
- दोहराव: कई कलेक्शन में पुराने प्रिंट और परिचित डिजाइन दिखे
- फिटिंग: कुछ कपड़ों का आकार और अनुपात सही नहीं लगा
- ज्यादा चमक: सजावट ने कुछ खास डिजाइन की बारीकियां छिपा दीं
- रेडी-टू-वियर: कुछ कपड़े रोज पहनने के बजाय खास मौकों के लिए ज्यादा उपयुक्त लगे
- जरूरत: नए आकार, आराम और उपयोगी डिजाइन पर अधिक ध्यान
Ready-to-Wear फैशन में नए डिजाइन की जरूरत
इस बार मनीष मल्होत्रा ने भी अपने रेडी-टू-वियर कलेक्शन के जरिए अधिक ग्राहकों तक पहुंचने की कोशिश की। इसमें ढीले ट्राउजर, लंबे और छोटे जैकेट, कंधे पर डाले गए दुपट्टे, साड़ी और बस्टियर ब्लाउज जैसे कपड़े शामिल थे। हालांकि, कई डिजाइन रोज पहनने वाले कपड़ों से ज्यादा शादी या खास अवसरों के पहनावे जैसे लगे। भारतीय डिजाइनरों के लिए शादी के कपड़ों से अलग रोजमर्रा के फैशन को नया रूप देना अब भी चुनौती बना हुआ है।
नए डिजाइनरों के शो में कुछ अलग प्रयोग देखने को मिले। अभिषेक चौहान ने आम, कैक्टस और टमाटर से जुड़े जैविक चमड़े जैसे विकल्पों और संतरे के रेशे से बने कपड़ों का इस्तेमाल किया। उनके डिजाइन नाटकीय अंदाज वाले थे और उन लोगों को पसंद आ सकते हैं जो रोज के कपड़ों में भी अलग पहचान चाहते हैं।
कोलकाता की निमिषा दिवाकर ने Subbah लेबल के लिए बाटिक, फ्रेंच नॉट, कान्था कढ़ाई और आरी वर्क को साथ लाकर कपड़े बनाए। लाल रंग का जैकेट और उससे मेल खाते ट्राउजर-पायजामा ऑफिस की बैठक से लेकर किसी खास कार्यक्रम तक पहने जा सकते हैं। इन कपड़ों की एक खास बात यह भी थी कि वे किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं थे।
जेंडर-न्यूट्रल कपड़ों और टिकाऊ सामग्री पर जोर
इस सीजन में ऐसे कपड़े भी देखने को मिले जिन्हें पुरुष और महिलाएं दोनों पहन सकते हैं। Countrymade के सुशांत अब्रोल ने खाकी-हरे रंग की सफारी शर्ट को सिल्क जैसे डेनिम कपड़े में नया रूप दिया। आशीष सोनी ने छोटे ब्लेजर और चौड़े ट्राउजर के जरिए कामकाजी कपड़ों को थोड़ा अलग अंदाज दिया। TIL के डिजाइनर अंकुर वर्मा ने बचे हुए धागों और कपड़े के टुकड़ों से पतझड़ के पत्तों से प्रेरित स्वेटशर्ट और धोती बनाई।
Huemn ने जेंडर-न्यूट्रल कपड़ों के साथ अपने कलेक्शन में उस समय के सामाजिक और राजनीतिक माहौल की झलक भी दिखाई। कुछ मॉडलों के कपड़ों पर खून जैसा प्रिंट था, जबकि कुछ ने मिट्टी जैसे डरावने मास्क पहने थे। नीले और सफेद रंग के कुछ डिजाइन साड़ी, ड्रेस और शर्ट-ट्राउजर के बीच की पारंपरिक सीमाओं को धुंधला करते दिखे।
लद्दाख के Zilzom और Namza Couture जैसे लेबल ने ऊन और बनारसी सिल्क से कोट और ब्लेजर के नए रूप पेश किए। नारंगी और हल्के हरे, गहरे मरून और हल्के नीले जैसे रंगों का मेल आकर्षक था। अलग-अलग लंबाई और आकार के कोट ने सर्दियों में पहने जाने वाले इस पुराने कपड़े को नया रूप देने की कोशिश की।
फैशन वीक में रंगों, भारतीय सामग्री और कारीगरी को जगह मिली, लेकिन हर कलेक्शन नया या यादगार नहीं लगा। फैशन का उद्देश्य कल्पना और रोजमर्रा की जिंदगी से थोड़ी दूरी देना भी हो सकता है, पर इसके लिए कपड़ों में कुछ ऐसा होना जरूरी है जो सचमुच नया, उपयोगी और रोमांचक महसूस हो।
निष्कर्ष
Lakme Fashion Week x FDCI में रंगों, पारंपरिक कपड़ों और नई सामग्री के कई प्रयोग दिखे। कुछ उभरते डिजाइनरों ने रोजमर्रा के पहनावे को नया नजरिया दिया, लेकिन कई बड़े कलेक्शन में पुराने अंदाज दोहराए गए। आगे फैशन में आराम, उपयोगिता और नए सिल्हूट का संतुलन अहम रहेगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध फैशन शो रिपोर्ट पर आधारित है। डिजाइन और पहनावे पर राय व्यक्तिपरक हो सकती है।