ज्यादा म्यूचुअल फंड रखने से हमेशा बेहतर डायवर्सिफिकेशन नहीं मिलता, ऐसे बचें पोर्टफोलियो ओवरलैप से कई निवेशक मानते हैं कि ज्यादा म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने से उनका पोर्टफोलियो ज्यादा सुरक्षित और डायवर्सिफाइड हो जाता है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।
सही डायवर्सिफिकेशन का मतलब सिर्फ फंड की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि अलग-अलग एसेट क्लास, निवेश शैली, मार्केट सेगमेंट और जोखिम के हिसाब से संतुलन बनाना है।
ज्यादा म्यूचुअल फंड रखने से क्यों बढ़ सकता है पोर्टफोलियो ओवरलैप?
विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशकों को यह देखना चाहिए कि उनके पोर्टफोलियो में हर म्यूचुअल फंड की भूमिका क्या है। केवल ज्यादा स्कीम जोड़ने से फायदा नहीं होता, क्योंकि कई बार अलग-अलग नाम वाले फंड एक ही तरह के शेयरों और सेक्टरों में निवेश कर रहे होते हैं।
वेल्दी डॉट इन के को-फाउंडर आदित्य अग्रवाल के अनुसार, फंड की संख्या और डायवर्सिफिकेशन एक जैसी चीजें नहीं हैं। असली डायवर्सिफिकेशन तब होता है जब पोर्टफोलियो में अलग-अलग मार्केट कैप, निवेश रणनीति, भौगोलिक क्षेत्र और जोखिम वाले विकल्प शामिल हों।
📊 सही म्यूचुअल फंड डायवर्सिफिकेशन के नियम
- फंड संख्या: ज्यादा फंड हमेशा बेहतर नहीं होते
- असली डायवर्सिफिकेशन: अलग एसेट क्लास और रणनीति जरूरी
- जांच: टॉप होल्डिंग्स और सेक्टर एक्सपोजर देखें
- उद्देश्य: हर फंड की पोर्टफोलियो में भूमिका तय करें
- संतुलन: जोखिम और लक्ष्य के अनुसार निवेश करें
कई बार निवेशक लार्ज कैप फंड, फ्लेक्सी कैप फंड, फोकस्ड फंड और वैल्यू फंड जैसे अलग-अलग नामों वाली योजनाएं खरीद लेते हैं, लेकिन इन सभी में एक जैसे बड़े शेयर और सेक्टर शामिल हो सकते हैं। ऐसे में निवेशक को नया फायदा मिलने के बजाय वही निवेश दोहराया जाता है।
नया म्यूचुअल फंड चुनने से पहले क्या देखें?
निवेश करने से पहले केवल फंड की कैटेगरी देखने के बजाय उसके पोर्टफोलियो में शामिल कंपनियां, सेक्टर का वजन, मार्केट कैप और टॉप होल्डिंग्स को जरूर जांचना चाहिए।
हर नए म्यूचुअल फंड को जोड़ने से पहले निवेशक को खुद से पूछना चाहिए कि यह फंड पोर्टफोलियो में क्या नया जोड़ रहा है। अगर कोई फंड अंतरराष्ट्रीय बाजार में निवेश का मौका देता है, डेट फंड के जरिए स्थिरता बढ़ाता है, गोल्ड में निवेश देता है या किसी अलग रणनीति को शामिल करता है तो उसका उद्देश्य समझ में आता है।
⚠️ ज्यादा फंड रखने की समस्याएं
- ओवरलैप: एक जैसे शेयरों में दोहराव
- मैनेजमेंट: ज्यादा फंड को ट्रैक करना मुश्किल
- समीक्षा: पोर्टफोलियो की निगरानी कठिन
- फोकस: लक्ष्य और जोखिम से ध्यान हट सकता है
- लाभ: छोटा लेकिन संतुलित पोर्टफोलियो बेहतर हो सकता है
लेकिन सिर्फ इसलिए नया फंड खरीदना कि वह अलग नाम से उपलब्ध है, सही रणनीति नहीं है। हर निवेश का कोई स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए और वह पोर्टफोलियो की किसी कमी को पूरा करना चाहिए।
बहुत ज्यादा फंड रखने से उन्हें संभालना भी मुश्किल हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई निवेशक हर महीने 25 हजार रुपये की एसआईपी पांच अलग-अलग फंड में करता है तो उसे ट्रैक करना आसान हो सकता है। लेकिन यही रकम 8 या 10 फंड में बांटने पर हर निवेश का असर कम हो सकता है और पोर्टफोलियो की समीक्षा करना भी कठिन हो जाता है।
कितने म्यूचुअल फंड रखना बेहतर हो सकता है?
ज्यादा फंड रखने से निवेशक अक्सर पूरे पोर्टफोलियो के जोखिम और लक्ष्य पर ध्यान देने के बजाय हर फंड के प्रदर्शन को देखने लगते हैं। इससे लंबी अवधि की निवेश योजना प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को फंड की संख्या बढ़ाने के बजाय सही संतुलन बनाने पर ध्यान देना चाहिए। 5 से 6 अच्छे और उद्देश्य के अनुसार चुने गए म्यूचुअल फंड कई बार 10 से 12 ऐसे फंड से बेहतर डायवर्सिफिकेशन दे सकते हैं जिनमें एक जैसा निवेश हो।
इसलिए नया म्यूचुअल फंड खरीदने से पहले यह जांचना जरूरी है कि क्या वह पोर्टफोलियो में नया एक्सपोजर जोड़ रहा है, जोखिम कम कर रहा है और आपके वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार सही है। सही योजना के साथ छोटा लेकिन संतुलित पोर्टफोलियो लंबे समय में ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। निवेश से पहले वित्तीय सलाहकार से सलाह लेना बेहतर है।

