Nagore Dargah Kanduri Festival: कंदूरी उत्सव के लिए 45 किलो चंदन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 22 अक्टूबर 2026 को नागोर दरगाह के प्रतिनिधियों को एक सरकारी आदेश सौंपा। इस आदेश के तहत पेरिया अंडावर कंदूरी उत्सव के लिए 45 किलोग्राम चंदन की लकड़ी मुफ्त देने की मंजूरी दी गई है। यह उत्सव 10 नवंबर को आयोजित होना है। रिपोर्ट के अनुसार, दरगाह के प्रबंध न्यासी एच. हाजा नजीमुद्दीन साहिब और अन्य न्यासियों को यह आदेश दिया गया। इस अवसर पर राज्य सरकार के कई मंत्री और तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष भी मौजूद थे।

Nagore Dargah: नागोर दरगाह का धार्मिक महत्व

नागोर दरगाह तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के तटीय कस्बे नागोर में स्थित एक प्रसिद्ध सूफी तीर्थस्थल है। यह दरगाह सूफी संत हजरत सैयद शाहुल हमीद की मजार पर बनी है। यहां हर दिन श्रद्धालु आते हैं और खास अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं।

दरगाह का सबसे प्रमुख आयोजन कंदूरी उत्सव है, जो संत की बरसी के मौके पर मनाया जाता है। यह आयोजन 14 दिनों तक चलता है। यहां मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ हिंदू श्रद्धालु भी आते हैं, इसलिए यह जगह अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के लोगों के लिए खास महत्व रखती है।

🌿 कंदूरी उत्सव के लिए चंदन की मंजूरी

  • मंजूरी: 45 किलोग्राम चंदन की लकड़ी
  • खर्च: सरकार की ओर से मुफ्त आपूर्ति
  • उत्सव: पेरिया अंडावर कंदूरी
  • तारीख: 10 नवंबर 2026
  • आदेश: तमिलनाडु सरकार का सरकारी आदेश

दरगाह से हिंदू समुदाय का ऐतिहासिक जुड़ाव

नागोर दरगाह को धार्मिक मेल-जोल की एक मिसाल के रूप में भी देखा जाता है। यहां की इमारत में पांच मीनारें हैं। इनमें सबसे ऊंची मीनार का निर्माण हिंदू मराठा शासक प्रताप सिंह के शासनकाल से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, दरगाह के निर्माण और विकास में हिंदू श्रद्धालुओं का भी योगदान रहा है।

दरगाह की पहचान केवल उसके धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है। यह लंबे समय से अलग-अलग समुदायों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही है। यहां की परंपराओं में स्थानीय संस्कृति और धार्मिक आस्थाओं का मेल दिखाई देता है।

Kanduri Festival: क्या है कंदूरी उत्सव?

कंदूरी उत्सव नागोर दरगाह में मनाया जाने वाला 14 दिन का धार्मिक आयोजन है। यह सूफी संत शाहुल हमीद की बरसी के अवसर पर इस्लामी महीने जमादुल आखिर में आयोजित होता है। उत्सव के दौरान प्रार्थनाएं, धार्मिक पाठ, चढ़ावे और कई पारंपरिक रस्में होती हैं।

संत शाहुल हमीद के बारे में प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों में कहा जाता है कि उन्होंने तंजावुर के हिंदू राजा अच्युतप्पा नायक की बीमारी के इलाज में मदद की थी। इस कथा को उत्सव में हिंदू श्रद्धालुओं की भागीदारी से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, ऐसे ऐतिहासिक विवरणों को उनके स्रोतों और संदर्भ के साथ समझना जरूरी है।

🕌 14 दिनों के आयोजन की खास रस्में

  • शुरुआत: पवित्र ध्वज फहराकर उत्सव का आरंभ
  • धार्मिक पाठ: कुरान की आयतों और दुआओं का पाठ
  • आठवां दिन: आतिशबाजी का आयोजन
  • नौवां दिन: पीर मंडपम में फकीरों की रस्म और उपवास की शुरुआत
  • दसवां दिन: चंदन का लेप लेकर जुलूस निकालने की परंपरा
  • समापन: अंतिम दिनों में दुआएं, ध्वज और रोशनी से जुड़ी रस्में

उत्सव के दौरान होने वाली प्रमुख रस्में

उत्सव के पहले दिन पवित्र ध्वज फहराया जाता है और उसे जुलूस के साथ दरगाह तक लाया जाता है। शुरुआती दिनों में धार्मिक विद्वान कुरान का पाठ और दुआएं करते हैं। श्रद्धालु दरगाह में संत की याद में प्रार्थना करते हैं और चढ़ावा पेश करते हैं।

आठवें दिन आतिशबाजी भी उत्सव का हिस्सा होती है। नौवें दिन कुछ फकीर पीर मंडपम नामक स्थान पर जाते हैं और श्रद्धालु उपवास शुरू करते हैं। दसवें दिन चंदन का लेप लेकर जुलूस निकाला जाता है, जिसके बाद इसे दरगाह के पवित्र स्थानों पर लगाया जाता है। उपवास अगले दिन समाप्त किया जाता है।

उत्सव के दौरान दरगाह परिसर में मौजूद शिफा गुंटा नामक तालाब में श्रद्धालु पवित्र स्नान भी करते हैं। अंतिम दिनों में धार्मिक पाठ और दुआएं जारी रहती हैं। उत्सव पूरा होने पर ध्वज और सजावटी रोशनियां हटा दी जाती हैं। रस्मों का विवरण अलग-अलग स्रोतों में कुछ भिन्न हो सकता है।

धार्मिक सद्भाव का प्रतीक

नागोर दरगाह और कंदूरी उत्सव की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग समुदायों के लोग शामिल होते हैं। चंदन की सरकारी आपूर्ति से जुड़ा फैसला इस आयोजन की तैयारियों का हिस्सा है। दरगाह का इतिहास और वहां की परंपराएं दक्षिण भारत में धार्मिक आस्था, स्थानीय संस्कृति और साझा विरासत के संबंध को दर्शाती हैं।

अधिक जानकारी के लिए नागोर दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट देखी जा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नागोर दरगाह कहां स्थित है?

नागोर दरगाह तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के नागोर कस्बे में स्थित है। यह सूफी संत सैयद शाहुल हमीद की मजार के लिए प्रसिद्ध है और यहां मुस्लिम तथा हिंदू समुदायों के श्रद्धालु आते हैं।

2. कंदूरी उत्सव कितने दिनों तक चलता है?

कंदूरी उत्सव 14 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान धार्मिक पाठ, प्रार्थनाएं, चढ़ावे, जुलूस और अन्य पारंपरिक रस्में होती हैं। आयोजन संत शाहुल हमीद की बरसी से जुड़ा हुआ है।

3. तमिलनाडु सरकार ने कितने चंदन की लकड़ी देने की मंजूरी दी?

रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने कंदूरी उत्सव के लिए 45 किलोग्राम चंदन की लकड़ी मुफ्त देने की मंजूरी दी। इसके लिए सरकारी आदेश दरगाह के प्रतिनिधियों को सौंपा गया।

4. कंदूरी उत्सव में हिंदू श्रद्धालु क्यों शामिल होते हैं?

नागोर दरगाह में हिंदू श्रद्धालुओं की भागीदारी की ऐतिहासिक और स्थानीय परंपराएं रही हैं। संत शाहुल हमीद से जुड़ी कथाएं और दरगाह के निर्माण में हिंदू शासकों तथा भक्तों के योगदान का उल्लेख इस साझा परंपरा के संदर्भ में किया जाता है।

5. कंदूरी उत्सव में चंदन का क्या महत्व है?

उत्सव के दौरान चंदन का लेप एक प्रमुख रस्म से जुड़ा है। परंपरा के अनुसार, चंदन को जुलूस के साथ दरगाह लाया जाता है और संत की मजार पर लगाया जाता है। यह रस्म आयोजन के धार्मिक महत्व का हिस्सा है।

निष्कर्ष

नागोर दरगाह का कंदूरी उत्सव धार्मिक आस्था और साझा सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा आयोजन है। तमिलनाडु सरकार की ओर से 45 किलोग्राम चंदन मुफ्त देने की मंजूरी उत्सव की तैयारियों में मदद करेगी। यह आयोजन विभिन्न समुदायों की भागीदारी के लिए जाना जाता है।

Disclaimer: यह खबर उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक विवरणों में स्रोतों के अनुसार अंतर हो सकता है।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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