भारत सरकार वर्ष 2030 तक देश में यूरिया का उत्पादन बढ़ाकर अपनी घरेलू जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने की योजना बना रही है। इसके लिए हर साल यूरिया बनाने की क्षमता में करीब 1.37 करोड़ टन की बढ़ोतरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
इससे देश की कुल वार्षिक उत्पादन क्षमता बढ़कर लगभग 4.37 करोड़ टन हो सकती है। सरकार का उद्देश्य विदेशों से खाद मंगाने पर निर्भरता कम करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाना है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण खाद की वैश्विक कीमतों पर दबाव बढ़ा है, जिससे घरेलू उत्पादन को मजबूत करना और भी जरूरी हो गया है।
यूरिया उत्पादन बढ़ाने की जरूरत क्यों है?
फिलहाल भारत में हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया की जरूरत होती है। देश में इसकी मांग करीब 5 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन से लगभग 75 प्रतिशत जरूरत पूरी होती है, जबकि बाकी आपूर्ति आयात के जरिए की जाती है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यूरिया की घरेलू मांग बढ़कर 4.86 करोड़ टन से अधिक हो सकती है। यदि उत्पादन क्षमता को प्रस्तावित स्तर तक पहुंचा दिया जाता है, तो देश अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत यूरिया खुद तैयार कर सकेगा। इससे विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम होगी और देश की विदेशी मुद्रा की बचत भी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, हर 10 लाख टन आयात की जगह घरेलू उत्पादन होने से सालाना लगभग 50 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है।
यूरिया उत्पादन बढ़ने से संभावित फायदे
- विदेशों से यूरिया आयात करने की जरूरत कम हो सकती है।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर घरेलू आपूर्ति को सहारा मिल सकता है।
- विदेशी मुद्रा की बचत करने में मदद मिल सकती है।
- किसानों के लिए खाद की उपलब्धता बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
नई परियोजनाओं से बढ़ेगी उत्पादन क्षमता
इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार कई योजनाओं और नई परियोजनाओं पर काम कर रही है। इनमें यूरिया उत्पादन बढ़ाने के लिए वर्ष 2026 की राष्ट्रीय निवेश नीति के तहत हर साल एक करोड़ टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता विकसित करने की योजना भी शामिल है। इसके अलावा, देश में दो नई यूरिया परियोजनाओं के जरिए कुल 25.4 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता जोड़ने का प्रस्ताव है। रूस की एक खाद निर्माता कंपनी के साथ प्रस्तावित परियोजना भी भविष्य में आपूर्ति बढ़ाने में मदद कर सकती है। सरकार को नई यूरिया फैक्ट्रियां लगाने के लिए विभिन्न कंपनियों से 17 प्रस्ताव मिले हैं। इनमें गेल, हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड, कृषक भारती सहकारी लिमिटेड, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स और मैटिक्स फर्टिलाइजर्स जैसी कंपनियां शामिल हैं। इन प्रस्तावों की अलग-अलग स्तर पर जांच की जा रही है।
ओडिशा के तालचेर में नई फैक्ट्री
ओडिशा में तालचेर फर्टिलाइजर्स लिमिटेड एक नई यूरिया फैक्ट्री स्थापित कर रही है। इस परियोजना में गेल, राष्ट्रीय रसायन एवं उर्वरक लिमिटेड, कोल इंडिया और फर्टिलाइजर्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की भागीदारी है। यहां कोयले से गैस तैयार करने की तकनीक के जरिए हर साल लगभग 12.7 लाख टन यूरिया बनाने की योजना है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 19,000 करोड़ रुपये है और इसे वित्त वर्ष 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके शुरू होने से घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
असम में भी स्थापित होगी यूरिया फैक्ट्री
असम में भी इसी क्षमता की एक नई यूरिया फैक्ट्री स्थापित करने की योजना है। इस परियोजना में असम सरकार, ऑयल इंडिया, नेशनल फर्टिलाइजर्स, हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड और ब्रह्मपुत्र वैली फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन की भागीदारी है। इसकी अनुमानित लागत करीब 10,600 करोड़ रुपये बताई गई है। परियोजना को शुरू करने के लिए लगभग 48 महीने का समय निर्धारित किया गया है। हालांकि, इसके चालू होने की समयसीमा को लेकर अलग-अलग जानकारी सामने आई है। कुछ अनुमानों के अनुसार, इसका संचालन वित्त वर्ष 2031 में शुरू हो सकता है, जबकि संबंधित कंपनी ने दिसंबर 2030 तक इसे चालू करने की उम्मीद जताई है।
रूस के साथ यूरिया उत्पादन में सहयोग की योजना
भारत यूरिया की आपूर्ति मजबूत करने के लिए रूस के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी काम कर रहा है। इस संबंध में रूसी कंपनी जेएससी यूरालकेम, राष्ट्रीय रसायन एवं उर्वरक लिमिटेड, नेशनल फर्टिलाइजर्स और इंडियन पोटाश लिमिटेड के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्रस्तावित परियोजना रूस के समारा क्षेत्र के तोलियाती में स्थापित की जानी है। इसके तहत हर साल लगभग 20 लाख टन यूरिया बनाने की क्षमता विकसित करने का प्रस्ताव है। यदि यह योजना आगे बढ़ती है, तो भारत को खाद की आपूर्ति सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
यूरिया परियोजनाओं से जुड़े प्रमुख आंकड़े
- 2030 का लक्ष्य: घरेलू जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत यूरिया देश में तैयार करना।
- तालचेर परियोजना: लगभग 12.7 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता।
- असम परियोजना: लगभग 12.7 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता प्रस्तावित।
- रूस की प्रस्तावित परियोजना: लगभग 20 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता।
- मुख्य चुनौती: बढ़ती मांग के साथ खाद की कीमतों और आपूर्ति को संतुलित रखना।
खाद का संतुलित इस्तेमाल भी जरूरी
हालांकि, केवल उत्पादन बढ़ाना ही समस्या का पूरा समाधान नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि खाद का सही और संतुलित इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है। किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा, ताकि फसलों को जरूरी पोषक तत्व मिलें और खाद की बर्बादी कम हो। इससे बढ़ती मांग को लंबे समय तक पूरा करने में मदद मिल सकती है। उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खाद के इस्तेमाल की दक्षता सुधारने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता खर्च
यूरिया और दूसरी खाद पर सरकारी सब्सिडी का खर्च भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वित्त वर्ष 2026 में भारत का उर्वरक सब्सिडी खर्च 2.17 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया, जबकि सरकार ने इसके लिए 1.77 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा था। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कीमतें बढ़ने के बाद उर्वरक विभाग ने सब्सिडी के बजट को बढ़ाकर 3.5 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव भी रखा था। बाद में खाद की कीमतों में कमी आने और घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त भंडार तैयार करने के प्रयासों के चलते खर्च के अनुमान में कुछ नरमी आई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में उतार-चढ़ाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में भी इस दौरान काफी बदलाव देखने को मिला। उर्वरक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 में इसकी कीमत लगभग 447 डॉलर प्रति टन थी, जो मार्च में बढ़कर 510 डॉलर हो गई। इसके बाद अप्रैल में कीमत 772 डॉलर और मई में बढ़कर 947 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। हालांकि, जुलाई में इसमें गिरावट आई और कीमत फिर लगभग 447 डॉलर प्रति टन रह गई। इन उतार-चढ़ाव से साफ है कि भारत के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण है। फिर भी, किसानों को उचित कीमत पर खाद उपलब्ध कराने के लिए उत्पादन, आयात, भंडारण, सब्सिडी और संतुलित उपयोग के बीच बेहतर तालमेल बनाना जरूरी होगा।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
यूरिया उत्पादन बढ़ाने की योजना का उद्देश्य देश में खाद की उपलब्धता मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलावों का असर कम करना है। हालांकि, किसानों को इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब नई परियोजनाएं समय पर पूरी हों, खाद की आपूर्ति नियमित बनी रहे और वितरण व्यवस्था प्रभावी हो। इसके साथ ही मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाना भी जरूरी होगा।
भारत में यूरिया की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कदम है। नई फैक्ट्रियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से आयात पर निर्भरता घटाने की संभावना है। हालांकि, उत्पादन क्षमता के साथ भंडारण, वितरण, सब्सिडी और संतुलित उपयोग पर भी ध्यान देना होगा, ताकि किसानों को समय पर उचित कीमत पर खाद मिल सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. भारत वर्ष 2030 तक यूरिया उत्पादन को कितना बढ़ाना चाहता है?
सरकार का लक्ष्य वार्षिक उत्पादन क्षमता को लगभग 4.37 करोड़ टन तक पहुंचाना है। इसके जरिए देश की घरेलू यूरिया जरूरत का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने की योजना है।
2. भारत में यूरिया की मांग कितनी है?
भारत में फिलहाल हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया की जरूरत बताई गई है। मांग करीब 5 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है और 2030 तक इसके 4.86 करोड़ टन से अधिक होने का अनुमान है।
3. तालचेर यूरिया परियोजना की क्षमता कितनी है?
ओडिशा की तालचेर परियोजना में हर साल लगभग 12.7 लाख टन यूरिया बनाने की योजना है। इसकी अनुमानित लागत 19,000 करोड़ रुपये है और इसे वित्त वर्ष 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
4. यूरिया उत्पादन बढ़ने से भारत को क्या लाभ हो सकता है?
घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, विदेशी मुद्रा बच सकती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के समय देश में खाद की उपलब्धता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
5. क्या केवल यूरिया उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त है?
नहीं। उत्पादन के साथ खाद का संतुलित इस्तेमाल, मिट्टी की जांच, उचित भंडारण, समय पर वितरण और सब्सिडी खर्च का बेहतर प्रबंधन भी जरूरी है, ताकि किसानों को लगातार खाद मिल सके।
आधिकारिक जानकारी
भारत में उर्वरक नीति, योजनाओं और सरकारी पहलों से संबंधित जानकारी के लिए रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देखी जा सकती है।
अस्वीकरण: यह लेख उपलब्ध जानकारी और बताए गए अनुमानों पर आधारित है। परियोजनाओं की लागत, समयसीमा और उत्पादन लक्ष्य में बदलाव संभव है।