Chicken Price Hike: मक्का महंगा, चिकन की कीमतें बढ़ने का खतरा

भारत में कमजोर मानसून और मक्का की बढ़ती मांग के कारण मुर्गियों के चारे की कीमतों में तेजी आई है। इससे चिकन उत्पादन करने वाली कंपनियों और मांस बेचने वाले कारोबारियों की लागत बढ़ गई है।

चारे की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे कम बारिश से फसल को हुआ नुकसान और इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की ओर से मक्के की बढ़ती मांग को भी प्रमुख कारण माना जा रहा है। इसका असर कारोबारियों के मुनाफे पर पड़ रहा है और आने वाले महीनों में चिकन की कीमतों में और बढ़ोतरी होने की आशंका है।

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मक्के की बढ़ती कीमतों से चिकन उत्पादन महंगा

Chicken Price Hike: मक्का महंगा होने से चिकन उत्पादन लागत और कीमतों पर असर
Chicken Price Hike: चारे में मक्के की बढ़ती कीमत से चिकन कारोबार की लागत बढ़ रही है।

 

मुर्गियों को दिए जाने वाले चारे में मक्के की हिस्सेदारी वजन के हिसाब से लगभग 55 से 65 प्रतिशत होती है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुमान के अनुसार, सितंबर के आखिर में मुर्गीपालकों को मक्का खरीदने के लिए 27 से 28 रुपये प्रति किलो तक चुकाने पड़ रहे थे। वर्ष 2019 में इसकी कीमत करीब 12 से 14 रुपये प्रति किलो थी। सरकारी कृषि बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 8 अक्टूबर को देशभर में मक्के की थोक कीमत का मध्य स्तर लगभग 23 रुपये प्रति किलो रहा। चारे के अलावा बिजली, ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ने से पशुपालन और मुर्गीपालन का खर्च भी बढ़ रहा है।

उद्योग संगठन सीएलएफएमए ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दिव्या कुमार गुलाटी के मुताबिक, ऊर्जा, परिवहन और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सीधा असर पशुपालन और मुर्गीपालन के चारे की लागत पर पड़ सकता है। ऐसे में कंपनियों के सामने बढ़ते खर्च और ग्राहकों के लिए कीमतों को काबू में रखने की चुनौती है। कुछ कंपनियां लागत बढ़ने का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालने के बजाय खुद भी उसका एक हिस्सा उठा रही हैं, जबकि कुछ ने चिकन की कीमतों में बढ़ोतरी की है।

चिकन की कीमतें बढ़ने की प्रमुख वजहें

  • मक्का महंगा: चारे में मक्के की हिस्सेदारी लगभग 55 से 65 प्रतिशत है।
  • कमजोर मानसून: कम बारिश से कुछ क्षेत्रों में मक्के की फसल प्रभावित हुई है।
  • इथेनॉल की मांग: इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की मांग बढ़ने से उपलब्धता पर दबाव है।
  • परिवहन खर्च: ईंधन और सामान की ढुलाई महंगी होने से कुल लागत बढ़ रही है।
  • ग्राहकों पर असर: कंपनियां कीमतें बढ़ाने या घटते मुनाफे का बोझ उठाने के बीच संतुलन बना रही हैं।

कंपनियों ने बढ़ाई चिकन की कीमतें

जैपफ्रेश ब्रांड के तहत मांस बेचने वाली कंपनी डीएसएम फ्रेश फूड्स लिमिटेड ने खरीद लागत बढ़ने के बाद चिकन की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत की वृद्धि की है। कंपनी के संस्थापक और प्रबंध निदेशक दीपांशु मनचंदा के अनुसार, बाजार में कीमतें बढ़ने से कंपनी की खरीद लागत लगभग 10 प्रतिशत बढ़ गई है। कंपनी ने लागत में हुई पूरी बढ़ोतरी ग्राहकों पर नहीं डाली, जिसके कारण उसके सकल मुनाफे के मार्जिन में करीब पांच प्रतिशत अंक की गिरावट आई है।

कंपनी के मुताबिक, मौजूदा त्योहारों के दौरान पिछले साल की तुलना में चिकन के ऑर्डर लगभग 5 प्रतिशत बढ़े हैं। ग्राहकों ने खरीदारी की मात्रा, चिकन के पसंदीदा हिस्सों और औसत ऑर्डर मूल्य में खास बदलाव नहीं किया है। कंपनी को उम्मीद है कि आने वाले तीन से छह महीनों तक लागत का दबाव बना रह सकता है। इस अवधि में मांस की मांग आमतौर पर बढ़ती है। कंपनी का मानना है कि जरूरत पड़ने पर वह कीमतों में और बढ़ोतरी कर सकती है, हालांकि इसका वास्तविक असर ग्राहकों की खरीदारी पर निर्भर करेगा।

कम बारिश और इथेनॉल की मांग से मक्का संकट

चारे की कमी का असर चिकन उत्पादन से जुड़े दूसरे कारोबारियों पर भी दिखाई दे रहा है। नंदूज के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी नरेंद्र पसुपार्थी के अनुसार, कर्नाटक में सूखे और फसल खराब होने के कारण इस मौसम में मक्के का उत्पादन करीब 25 प्रतिशत घट गया है। उन्होंने बताया कि इथेनॉल बनाने के लिए भी मक्के की मांग बढ़ी है, जिससे उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। कमी को पूरा करने के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से मक्का मंगाया जा रहा है।

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का मौसम सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना और राजस्थान में सूखे को लेकर चिंता जताई गई है। कम बारिश का असर खरीफ फसलों की बुवाई पर भी पड़ा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मक्के सहित कुछ फसलों के खेती वाले क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है। इससे बाजार में मक्के की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

चिकन उद्योग के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

  • चारे की उपलब्धता: मक्के की कमी के कारण कंपनियों को दूसरे राज्यों से खरीद करनी पड़ रही है।
  • उत्पादन का खर्च: चूजों की उपलब्धता में कमी और परिवहन की बढ़ती लागत भी कारोबार को प्रभावित कर रही है।
  • मुनाफे का दबाव: ग्राहकों को कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से बचाने के लिए कुछ कंपनियां अतिरिक्त लागत खुद उठा रही हैं।

चूजों की कमी से भी बढ़ रहा उत्पादन खर्च

मुर्गीपालन उद्योग में चारे के अलावा छोटे चूजों की उपलब्धता में कमी भी लागत बढ़ा रही है। नंदूज के अनुसार, शुरुआती स्तर पर मुर्गियों के उत्पादन के लिए उपलब्ध चूजों की संख्या घटने से कंपनियों का खर्च बढ़ रहा है। कंपनी फिलहाल अपनी आपूर्ति व्यवस्था के कारण उत्पादन की मात्रा बनाए रखने में सफल रही है, लेकिन भविष्य में संभावित कमी से निपटने के लिए मक्के का भंडार बढ़ा रही है। कंपनी आमतौर पर किसी भी समय करीब 4,000 टन मक्का अपने पास रखती है और अब इस मात्रा को लगभग दोगुना करने की योजना बना रही है।

नरेंद्र पसुपार्थी के मुताबिक, नवरात्रि के बाद मांस की मांग में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। नवंबर से मार्च तक का समय आमतौर पर मांस की अधिक खपत वाला माना जाता है। ऐसे में अगर मांग बढ़ती है और चारे की उपलब्धता कम रहती है, तो चिकन उत्पादन की लागत और कीमतों पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कीमतें बढ़ने पर कुछ ग्राहक मांस खाना पूरी तरह बंद करने के बजाय कम मात्रा में खरीदारी कर सकते हैं।

परिवहन खर्च और खुदरा कीमतों का दबाव

टेंडरकट्स नाम की कंपनी भी चारे और परिवहन की बढ़ती लागत से प्रभावित है। कंपनी बाहरी आपूर्तिकर्ताओं से चिकन खरीदती और उसका प्रसंस्करण करती है। इसके संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशिकुमार कल्लनई के अनुसार, पिछले छह महीनों में चारे से जुड़ी लागत बढ़ी है। कंपनी आपूर्तिकर्ताओं के साथ हर तीन महीने में कीमतों की व्यवस्था तय करती है और जरूरत के अनुसार कुछ कीमतों में बदलाव भी कर चुकी है। हालांकि, ग्राहकों की कीमतों को लेकर संवेदनशीलता के कारण कंपनी खुदरा दरों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है।

कल्लनई ने चारे की बढ़ती लागत के लिए इथेनॉल की मांग को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया। हालांकि, उन्होंने बताया कि तेल की ऊंची कीमतों से परिवहन खर्च बढ़ा है, जिससे चारे और अन्य जरूरी सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की लागत भी बढ़ गई है। कंपनी मांग में मौसमी बदलाव को ध्यान में रखकर अपने उत्पादों की उपलब्धता तय करती है, ताकि जरूरत से ज्यादा सामान जमा न हो और बिक्री कम होने पर नुकसान से बचा जा सके।

मक्के की उपलब्धता और कृषि उत्पादन से जुड़ी आधिकारिक जानकारी के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट देखी जा सकती है।

शेयर बाजार में भी दिखा असर

शेयर बाजार में भी इस क्षेत्र की कुछ कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। एक महीने के दौरान एसकेएम एग प्रोडक्ट्स के शेयर करीब 18 प्रतिशत, डीएसएम फ्रेश फूड्स के शेयर 14 प्रतिशत, गोदरेज एग्रोवेट के शेयर 7 प्रतिशत और वेंकीज इंडिया के शेयर 6 प्रतिशत नीचे आए। इसी अवधि में निफ्टी 50 सूचकांक में लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट रही। हालांकि, शेयरों में गिरावट के पीछे केवल चारे की बढ़ती लागत को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, क्योंकि कंपनियों के प्रदर्शन पर कई अन्य कारकों का भी असर पड़ता है।

महंगाई बढ़ने से घरेलू बजट पर असर

बढ़ती लागत का असर आम लोगों के खाने के खर्च पर भी दिखाई देने लगा है। क्रिसिल इंटेलिजेंस के अनुसार, सितंबर में घर पर तैयार होने वाली मांसाहारी थाली की लागत बढ़कर 59.50 रुपये हो गई। यह एक साल पहले की तुलना में 6 प्रतिशत और अगस्त की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक थी। जून तक थाली की लागत बढ़ी थी, अगस्त में कुछ राहत मिली, लेकिन सितंबर में चिकन की कीमतों और अन्य खाद्य सामग्री तथा खाना पकाने के खर्च में बदलाव के कारण फिर तेजी आई।

खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। अगस्त में खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.95 प्रतिशत हो गई थी और खुदरा महंगाई दर 20 महीने के उच्च स्तर 4.82 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। ऐसे माहौल में खाने-पीने की चीजों की कीमतें और बढ़ती हैं, तो परिवारों को अपने खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है। इसका असर बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर भी पड़ सकता है।

नोमुरा के अर्थशास्त्रियों सोनल वर्मा और औरोदीप नंदी ने 7 अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में कमजोर मानसून के कारण कृषि क्षेत्र की वृद्धि और ग्रामीण मांग पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई थी। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से लोगों की खरीदने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। 5 अक्टूबर की एक अन्य रिपोर्ट में अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया था कि खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई अक्टूबर और नवंबर में बढ़कर 8.5 से 9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। अगस्त में यह 5.7 प्रतिशत थी। इसके बाद 2027 की पहली छमाही में इसके करीब 7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. भारत में चिकन की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

कमजोर मानसून, मक्के की सीमित उपलब्धता, इथेनॉल उत्पादन के लिए बढ़ती मांग और परिवहन खर्च में वृद्धि से मुर्गियों के चारे की लागत बढ़ रही है। चारा उत्पादन खर्च का बड़ा हिस्सा है, इसलिए इसकी कीमतों में तेजी चिकन की खुदरा कीमतों और कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित कर सकती है।

2. मुर्गियों के चारे में मक्के की कितनी हिस्सेदारी होती है?

मुर्गियों को दिए जाने वाले चारे में वजन के हिसाब से मक्के की हिस्सेदारी लगभग 55 से 65 प्रतिशत होती है। इसलिए मक्के की कीमतों में बदलाव का असर मुर्गीपालन की लागत पर पड़ता है। इसकी उपलब्धता कम होने पर कारोबारियों को दूसरे राज्यों से खरीद करनी पड़ सकती है।

3. क्या आने वाले महीनों में चिकन और महंगा हो सकता है?

अगर चारे की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और मांस की मांग बढ़ती है, तो चिकन की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है। हालांकि, वास्तविक कीमतें मक्के की उपलब्धता, उत्पादन खर्च, कंपनियों की मूल्य नीति और ग्राहकों की मांग जैसे कई कारकों पर निर्भर करेंगी।

4. मक्के की बढ़ती कीमतों का मुर्गीपालन कंपनियों पर क्या असर पड़ता है?

मक्के की कीमत बढ़ने से चारा महंगा होता है और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। कंपनियों को या तो ग्राहकों के लिए कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं या अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उनके मुनाफे का मार्जिन कम हो सकता है।

5. चिकन महंगा होने से घरेलू बजट पर क्या असर पड़ेगा?

चिकन की कीमतों में बढ़ोतरी से मांसाहारी भोजन पर परिवारों का खर्च बढ़ सकता है। यदि अन्य खाद्य पदार्थ और खाना पकाने की लागत भी बढ़ती है, तो घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। कुछ परिवार खर्च संभालने के लिए खरीदारी की मात्रा कम कर सकते हैं।

FAQ Schema

Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। बाजार की कीमतें बदल सकती हैं। खरीदारी और निवेश संबंधी निर्णय से पहले नवीनतम जानकारी की जांच करें।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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