भारत में डेटा सेंटर की संख्या और क्षमता बढ़ने के साथ बिजली व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है। 16 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रिड संचालक GRID-INDIA ने चेतावनी दी कि बड़े डेटा सेंटर में बिजली का अचानक कम या ज्यादा होना पूरे ग्रिड के संचालन को चुनौती दे सकता है। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वर को लगातार बिजली चाहिए और किसी गड़बड़ी के समय डेटा सेंटर अक्सर बैटरी या जनरेटर जैसे बैकअप पर चले जाते हैं।
Data Centre Power Grid: चिंता किस बात की है?
डेटा सेंटर में हजारों सर्वर, नेटवर्क उपकरण और स्टोरेज सिस्टम हो सकते हैं। इन्हें चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए। सामान्य समय में ग्रिड इस मांग को संभालने की योजना बना सकता है, लेकिन ट्रांसमिशन लाइन में खराबी या वोल्टेज गिरने पर डेटा सेंटर का सिस्टम तेजी से बैकअप पर जा सकता है। ऐसे में ग्रिड से उसकी बिजली मांग अचानक हट जाती है। बिजली उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाए रखने वाले ऑपरेटरों को इस बदलाव की जानकारी समय पर चाहिए।
GRID-INDIA ने ऐसे अचानक बदलाव को “silent exit” जैसे शब्दों में समझाया है। इसका मतलब यह नहीं कि डेटा सेंटर बंद हो जाता है, बल्कि वह ग्रिड से अपनी खपत अचानक कम कर सकता है और अपने बैकअप से चलता रह सकता है। अगर एक ही समय में कई बड़े केंद्र ऐसा करें, तो ग्रिड में वोल्टेज और आवृत्ति को स्थिर रखना कठिन हो सकता है।
भारत में बिजली मांग क्यों बढ़ सकती है?
क्लाउड कंप्यूटिंग, वीडियो सेवाओं, ऑनलाइन बैंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत बढ़ रही है। AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने में बड़ी संख्या में शक्तिशाली GPU इस्तेमाल हो सकते हैं। ये चिप सामान्य सर्वर की तुलना में अधिक बिजली और कूलिंग मांग सकती हैं। इसलिए नए डेटा सेंटर की योजना बनाते समय केवल भवन की क्षमता नहीं, बल्कि बिजली आपूर्ति और ग्रिड कनेक्शन की उपलब्धता भी देखनी होगी।
केंद्रीय बिजली प्राधिकरण से जुड़े अनुमान का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक 24 से 26 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जबकि वर्तमान क्षमता दो गीगावाट से कम बताई गई। यह एक अनुमान है, सुनिश्चित परिणाम नहीं। वास्तविक वृद्धि निर्माण, बिजली उपलब्धता, निवेश और ग्राहकों की मांग पर निर्भर करेगी।
⚡ ग्रिड के लिए मुख्य चुनौतियां
- बड़ी मांग: सर्वर और AI कंप्यूटिंग को लगातार बिजली चाहिए।
- अचानक बदलाव: बैकअप पर जाने से ग्रिड की मांग तेजी से बदल सकती है।
- ट्रांसमिशन: नई लाइनों और सबस्टेशनों को बनाने में समय लगता है।
- कूलिंग: सर्वर को ठंडा रखने में भी काफी ऊर्जा खर्च होती है।
- समन्वय: ऑपरेटरों को मांग और बैकअप व्यवहार की जानकारी चाहिए।
डेटा सेंटर और बिजली कंपनियां क्या कर सकती हैं?
पहला कदम यह है कि डेटा सेंटर बनाने वाली कंपनियां अपनी वर्तमान और भविष्य की बिजली जरूरत ग्रिड ऑपरेटरों को समय रहते बताएं। केवल कुल मेगावाट की जानकारी पर्याप्त नहीं है। बिजली में गड़बड़ी होने पर सिस्टम कैसे प्रतिक्रिया देगा, कितनी जल्दी बैकअप चालू होगा और कितनी मांग ग्रिड से हटेगी, इसकी जानकारी भी योजना में शामिल होनी चाहिए। इससे बिजली कंपनियां बेहतर मॉडल बना सकती हैं।
दूसरा कदम मांग प्रतिक्रिया तकनीक को बेहतर बनाना है। ऐसी तकनीक से बड़े उपभोक्ता कुछ परिस्थितियों में अपनी बिजली खपत को नियंत्रित या समायोजित कर सकते हैं। इसके लिए सुरक्षा और सेवा की जरूरतों को ध्यान में रखना होगा, क्योंकि सर्वर को मनमाने ढंग से बंद करना संभव नहीं है। डेटा सेंटर, बिजली कंपनियों और नियामकों को मिलकर परीक्षण करना चाहिए कि किस तरह सिस्टम की स्थिरता बनाए रखते हुए डिजिटल सेवाएं जारी रखी जा सकती हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा और नई जगहों की भूमिका
रिपोर्ट में गुजरात और राजस्थान जैसे नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वाले राज्यों के पास डेटा सेंटर स्थापित करने की संभावना पर भी चर्चा की गई। बिजली उत्पादन के स्रोतों के करीब केंद्र बनाने से कुछ परिस्थितियों में ट्रांसमिशन खर्च घट सकता है और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़ सकता है। हालांकि, जगह चुनते समय पानी, जमीन, फाइबर नेटवर्क, प्राकृतिक आपदाओं और स्थानीय जरूरतों का आकलन भी जरूरी है। केवल सस्ती बिजली के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है।
उद्योग ने परीक्षण केंद्र बनाने का सुझाव भी दिया है। ऐसे केंद्रों में बैकअप बिजली, कूलिंग, AI वर्कलोड और ग्रिड के साथ तालमेल की जांच की जा सकती है। डिजिटल मॉडल या सिमुलेशन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी खराबी के दौरान सिस्टम कैसा व्यवहार करेगा। परीक्षण से पहले जोखिम पहचानने और असली केंद्रों में बेहतर तकनीक लागू करने का अवसर मिलता है।
मूल रिपोर्ट यहां पढ़ें: Moneycontrol की पूरी रिपोर्ट।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. डेटा सेंटर को कितनी बिजली चाहिए?
बिजली की जरूरत केंद्र के आकार, सर्वर की संख्या, GPU क्षमता और कूलिंग व्यवस्था पर निर्भर करती है। छोटे केंद्र की मांग सीमित हो सकती है, जबकि बड़े AI केंद्र सैकड़ों मेगावाट तक की योजना बना सकते हैं। हर परियोजना का आंकड़ा अलग होता है।
2. Silent exit का क्या अर्थ है?
यह ऐसी स्थिति है जब डेटा सेंटर किसी बिजली गड़बड़ी के बाद अचानक ग्रिड से अपनी खपत कम कर देता है और बैटरी या जनरेटर पर चलने लगता है। इससे ग्रिड ऑपरेटर को मांग में तेज बदलाव संभालना पड़ सकता है।
3. क्या इससे आम लोगों की बिजली प्रभावित होगी?
रिपोर्ट संभावित ग्रिड संचालन जोखिम की ओर ध्यान दिलाती है, यह नहीं कहती कि हर डेटा सेंटर से घरेलू बिजली बाधित होगी। सही योजना, मजबूत ट्रांसमिशन और समन्वय से जोखिम कम किया जा सकता है।
4. AI डेटा सेंटर अधिक बिजली क्यों लेते हैं?
AI के लिए इस्तेमाल होने वाले GPU और अन्य प्रोसेसर बड़े गणितीय काम एक साथ करते हैं। इससे कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ती है, लेकिन बिजली और कूलिंग की जरूरत भी बढ़ सकती है। ऊर्जा दक्ष उपकरण और बेहतर डिजाइन खपत घटा सकते हैं।
5. ग्रिड स्थिरता सुधारने के लिए क्या जरूरी है?
डेटा सेंटर ऑपरेटरों को बिजली मांग की जानकारी साझा करनी चाहिए, बैकअप सिस्टम की जांच करनी चाहिए और ग्रिड ऑपरेटरों के साथ परीक्षण करने चाहिए। मजबूत ट्रांसमिशन, नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण और मांग प्रबंधन भी उपयोगी कदम हो सकते हैं।
निष्कर्ष
डेटा सेंटर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी बिजली मांग को पहले से समझना जरूरी है। ग्रिड ऑपरेटरों और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल, मजबूत नेटवर्क और परीक्षण आधारित योजना से डिजिटल विकास को अधिक भरोसेमंद बनाया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख प्रकाशित समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। आंकड़े अनुमान हो सकते हैं और निर्णय से पहले आधिकारिक जानकारी जांचें।