El Nino से घट सकता है Wind Power, बढ़ सकता है बिजली संकट

अल नीनो के संभावित प्रभाव के कारण इस वर्ष भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर हवाएं और बढ़ती बिजली मांग ऊर्जा क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकती हैं।

अल नीनो (El Nino) का असर इस साल केवल मानसून पर ही नहीं, बल्कि भारत के पवन ऊर्जा (Wind Power) उत्पादन पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों के अनुसार, जून से सितंबर के बीच हवा की गति सामान्य से कम रहने की आशंका है। यह वही समय होता है जब देश में पवन ऊर्जा का उत्पादन सबसे अधिक होता है। ऐसे में बिजली की रिकॉर्ड मांग के बीच उत्पादन घटने से बिजली क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।

कमजोर हवाओं से पवन ऊर्जा उत्पादन पर असर

भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता करीब 56.8 गीगावाट (GW) है, जो देश की कुल 520 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। दूसरी ओर, इस वर्ष बिजली की अधिकतम मांग 272 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। इससे पहले मई 2026 में देश में 270.8 गीगावाट की रिकॉर्ड बिजली मांग दर्ज की गई थी। वहीं, कमजोर मानसून के कारण जलविद्युत उत्पादन भी पहले से दबाव में है।

विशेषज्ञों का कहना है कि गुजरात, मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख पवन ऊर्जा उत्पादक राज्यों में इस मानसून के दौरान कम बारिश और कमजोर हवाएं देखने को मिल सकती हैं। इससे कई पवन परियोजनाओं का क्षमता उपयोग (Capacity Utilisation Factor-CUF) लगभग 38 प्रतिशत से घटकर 31 प्रतिशत तक आ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो बिजली की कमी पूरी करने के लिए कोयला आधारित ताप बिजलीघरों (Thermal Power Plants) पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।

💨 पवन ऊर्जा पर संभावित असर

  • स्थापित क्षमता: 56.8 GW
  • संभावित बिजली मांग: 272 GW
  • जोखिम अवधि: जून से सितंबर
  • संभावित CUF: 38% से घटकर 31%
  • मुख्य कारण: कमजोर हवाएं और अल नीनो

अल नीनो और बिजली उत्पादन का संबंध

नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि 1997-98 और 2015-16 जैसे मजबूत अल नीनो वर्षों में भी भारत के कई पवन ऊर्जा क्षेत्रों में हवा की गति और बिजली उत्पादन में कमी दर्ज की गई थी। इस बार भी यदि अल नीनो अगस्त से अक्टूबर के बीच और मजबूत होता है, तो बिजली की मांग बढ़ने के साथ उत्पादन घटने का जोखिम बढ़ सकता है। इससे बिजली उत्पादन लागत और ग्रिड पर दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो के दौरान समुद्र के तापमान में बदलाव के कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो हवाओं की रफ्तार भी कम हो जाती है, जिससे पवन ऊर्जा उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश का मतलब हमेशा कम हवा नहीं होता। मौसम की वास्तविक स्थिति और अल नीनो की तीव्रता के आधार पर ही इसका सही असर आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।

⚡ प्रमुख तथ्य एक नजर में

  • मुख्य राज्य: गुजरात, मध्य प्रदेश
  • प्रभाव: कमजोर हवाएं और कम उत्पादन
  • संभावित विकल्प: कोयला आधारित बिजली उत्पादन
  • चुनौतियां: ग्रिड, PPA और भूमि अधिग्रहण
  • निगरानी: मौसम और अल नीनो की तीव्रता

पवन ऊर्जा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियां

भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें जमीन अधिग्रहण में देरी, ट्रांसमिशन ग्रिड की कमी, बिजली खरीद समझौतों (PPA) में देरी और परियोजनाओं के संचालन से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। ऐसे में यदि अल नीनो के कारण हवा की गति भी कम होती है, तो पवन ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव और बढ़ सकता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा। यदि पवन और जलविद्युत दोनों का उत्पादन उम्मीद से कम रहता है, तो देश को बढ़ती बिजली मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।

Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी निर्णय से पहले आधिकारिक स्रोतों और विशेषज्ञों की सलाह अवश्य लें।

Gourav Kumar Singh

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