फ्लिपकार्ट के खिलाफ छोटे कारोबारियों के संगठन FIRST की शिकायत ने ई-कॉमर्स सेक्टर में प्रतिस्पर्धा, डिस्काउंटिंग और मार्केटप्लेस मॉडल को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मामला सिर्फ भारी छूट का नहीं, बल्कि इस सवाल का भी है कि क्या बड़े प्लेटफॉर्म अपने ऑपरेशनल ढांचे और पूंजी के दम पर छोटे विक्रेताओं के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल बना रहे हैं।
वॉलमार्ट के स्वामित्व वाले फ्लिपकार्ट ग्रुप के खिलाफ छोटे कारोबारियों के संगठन फोरम फॉर इंटरनेट रिटेलर्स, सेलर्स एंड ट्रेडर्स (FIRST) ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग यानी CCI का दरवाजा खटखटाया है। संगठन ने फ्लिपकार्ट पर आरोप लगाया है कि उसने ऐसी कारोबारी व्यवस्था बनाई, जिससे बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है, कुछ चुनिंदा विक्रेताओं को फायदा मिलता है और बड़ी संख्या में छोटे रिटेलर्स ऑनलाइन मार्केटप्लेस सिस्टम से बाहर होते जाते हैं।
फ्लिपकार्ट पर CCI में शिकायत, FIRST ने छोटे विक्रेताओं के खिलाफ पक्षपात और भारी छूट मॉडल का आरोप लगाया
2 जुलाई को CCI में दाखिल 157 पन्नों की शिकायत में FIRST ने कहा है कि फ्लिपकार्ट ने संरचनात्मक और परिचालन स्तर पर ऐसी व्यवस्था खड़ी की, जिसके जरिए अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी में बड़े पैमाने पर भारी छूट को बढ़ावा दिया गया। शिकायत के मुताबिक, यह सिर्फ सामान्य डिस्काउंटिंग नहीं है, बल्कि पूरे मार्केटप्लेस में ऐसी कीमतें तय करने की रणनीति है, जिससे स्वतंत्र और छोटे विक्रेताओं के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है।
FIRST ने फ्लिपकार्ट के डिस्काउंट मॉडल और मार्केटप्लेस रणनीति पर क्या आरोप लगाए
FIRST की शिकायत के मुख्य आरोप
- शिकायतकर्ता: फोरम फॉर इंटरनेट रिटेलर्स, सेलर्स एंड ट्रेडर्स (FIRST)
- किसके खिलाफ शिकायत: वॉलमार्ट स्वामित्व वाले फ्लिपकार्ट ग्रुप के खिलाफ
- कहां शिकायत: भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI)
- मुख्य आरोप: कुछ चुनिंदा विक्रेताओं को फायदा पहुंचाने वाला मॉडल
- दूसरा आरोप: भारी छूट के जरिए छोटे और स्वतंत्र विक्रेताओं पर दबाव
- मुख्य चिंता: निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और ऑनलाइन मार्केटप्लेस में बराबरी का अवसर
FIRST ने यह भी आरोप लगाया है कि फ्लिपकार्ट ने अपने लॉजिस्टिक्स और फुलफिलमेंट ऑपरेशंस से जुड़े जीएसटी दायित्वों में कमी या बचाव के जरिए हर साल करीब 3,000 करोड़ रुपये का एक “फंड पूल” तैयार किया। संगठन का दावा है कि इस रकम का इस्तेमाल पसंदीदा विक्रेताओं को इंसेंटिव, रिबेट और अतिरिक्त छूट देने में किया जाता है, जिसका असर आखिरकार कम रिटेल कीमतों के रूप में दिखता है। शिकायत में कहा गया है कि छोटे और स्वतंत्र विक्रेता ऐसी कीमतों का मुकाबला बिना भारी नुकसान उठाए नहीं कर सकते, जिससे उनके कारोबार पर सीधा दबाव पड़ता है।
GST, फंड पूल और पसंदीदा विक्रेताओं को कथित फायदा देने का आरोप
शिकायत में उठाए गए कारोबारी मुद्दे
- कथित फंड पूल: हर साल करीब 3,000 करोड़ रुपये
- आधार: लॉजिस्टिक्स और फुलफिलमेंट ऑपरेशंस से जुड़े GST दायित्वों में कमी या बचाव का आरोप
- राशि का कथित उपयोग: पसंदीदा विक्रेताओं को इंसेंटिव, रिबेट और अतिरिक्त छूट
- असर: कम रिटेल कीमतें और छोटे विक्रेताओं पर प्रतिस्पर्धी दबाव
- छोटे कारोबारियों की चिंता: भारी नुकसान उठाए बिना कीमतों का मुकाबला मुश्किल
यह मामला फ्लिपकार्ट के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है, खासकर ऐसे समय में जब कंपनी भारतीय शेयर बाजार में अपनी लिस्टिंग की तैयारी कर रही है। शिकायत से यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अपने आकार, पूंजी और ऑपरेशनल मॉडल का इस्तेमाल कर बाजार में ऐसी स्थिति बना रहे हैं, जिसमें छोटे कारोबारियों के लिए टिके रहना मुश्किल हो जाए। हालांकि, इस मामले पर फ्लिपकार्ट की ओर से खबर लिखे जाने तक कोई जवाब सामने नहीं आया था।
Disclaimer: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट्स और आरोपों पर आधारित है। मामले में नियामकीय जांच और संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया आगे तस्वीर बदल सकती है।

