IDBI Bank Stake Sale: दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर वित्त मंत्रालय

आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बेचने की सरकारी नीति को लेकर वित्त मंत्रालय ने कहा है कि कानून का इतिहास, दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला और लगातार पेश किए गए केंद्रीय बजट भाषण इस नीति में समय के साथ आए बदलाव को स्पष्ट करते हैं। मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2003 के आईडीबीआई निरसन कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है, जो केंद्र सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने या बेचने से रोकता हो।

मुख्य बात

केंद्र सरकार की आईडीबीआई बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की योजना को इस कानूनी व्याख्या से समर्थन मिलता है कि कानून सरकार को अपनी हिस्सेदारी कम करने से नहीं रोकता।

मंत्रालय का यह बयान ऐसे समय आया है, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 53,000 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है। यह सौदा भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े विदेशी निवेशों में से एक माना जा रहा है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के निजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

वित्त मंत्रालय ने बताया कि 17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने आईडीबीआई अधिकारियों के संगठन और केंद्र सरकार से जुड़े मामले में कहा था कि आईडीबीआई निरसन कानून, 2003 में सरकार की हिस्सेदारी घटाने या विनिवेश करने पर कोई रोक नहीं है। अदालत के अनुसार, कानून के स्पष्ट शब्दों में ऐसी पाबंदी जोड़कर नहीं पढ़ी जा सकती, जो उसमें लिखी ही नहीं गई है।

2003 में संशोधन का प्रस्ताव क्यों महत्वपूर्ण था?

मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2003 के केंद्रीय बजट और आईडीबीआई निरसन कानून पर संसद में हुई चर्चा के दौरान सरकार की हिस्सेदारी कम करने पर रोक लगाने के लिए संशोधन लाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, यह संशोधन स्वीकार नहीं हुआ और अंतिम कानून का हिस्सा नहीं बना। मंत्रालय का कहना है कि इसी विधायी इतिहास को समझना मौजूदा हिस्सेदारी बिक्री की कानूनी पृष्ठभूमि के लिए जरूरी है।

कानूनी पहलू

संसदीय बहस के दौरान दिए गए बयान और कानून में शामिल किए गए प्रावधान अलग-अलग चीजें हैं। मंत्रालय ने हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की हिस्सेदारी घटाने पर रोक लगाने वाला प्रावधान कानून में शामिल नहीं किया गया था।

हाई कोर्ट ने वचनबद्धता के सिद्धांत पर क्या कहा?

इस मामले में सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए वचनबद्धता के सिद्धांत का भी सहारा लिया गया था। इस सिद्धांत के तहत कुछ परिस्थितियों में पहले दिए गए आश्वासनों के आधार पर किसी पक्ष को अपना रुख बदलने से रोकने की दलील दी जाती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि संसद में हुई चर्चा के दौरान दिए गए बयानों के आधार पर इस सिद्धांत का इस्तेमाल करके सरकार को आईडीबीआई बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने से नहीं रोका जा सकता।

वित्त मंत्रालय ने दोहराया कि अदालत का फैसला और कानून का अंतिम स्वरूप सरकार के विनिवेश अधिकार को स्पष्ट करते हैं। मंत्रालय के मुताबिक, संसद में चर्चा के दौरान व्यक्त विचार अपने आप में ऐसे कानूनी प्रतिबंध नहीं बन जाते, जिन्हें पारित कानून में शामिल नहीं किया गया हो।

बजट भाषणों में कैसे बदली नीति?

सरकार की नीति में बदलाव का उल्लेख अलग-अलग वर्षों के केंद्रीय बजट भाषणों में भी मिलता है। वर्ष 2016-17 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और सरकार अपनी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से नीचे लाने के विकल्प पर विचार करेगी।

इसके बाद, वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोविड-19 महामारी के बावजूद आईडीबीआई बैंक और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के रणनीतिक विनिवेश पर सरकार के काम का उल्लेख किया था। मंत्रालय के अनुसार, ये बजट वक्तव्य बताते हैं कि बैंक में सरकारी हिस्सेदारी घटाने की नीति एक दिन में नहीं बनी, बल्कि समय के साथ आगे बढ़ी।

आईडीबीआई बैंक सौदे का आगे क्या महत्व है?

मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद प्रस्तावित सौदे में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे। सौदा पूरा होने पर बैंक के स्वामित्व और नियंत्रण में बदलाव आने की उम्मीद है। हालांकि, अंतिम प्रक्रिया संबंधित शर्तों और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगी। घोषित सौदे की कीमत लगभग 53,000 करोड़ रुपये है, जबकि वित्त मंत्रालय का ताजा बयान मुख्य रूप से इस बिक्री की कानूनी और नीतिगत पृष्ठभूमि स्पष्ट करता है।

इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि रणनीतिक विनिवेश केवल वित्तीय फैसला नहीं होता; इसके साथ कानून की व्याख्या, संसद में हुई चर्चा और सरकार की दीर्घकालिक नीति भी जुड़ी रहती है। पाठक संबंधित जानकारी के लिए वित्तीय सेवा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. सरकार आईडीबीआई बैंक की कितनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है?

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को लगभग 53,000 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है।

2. दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 में क्या स्पष्ट किया था?

अदालत ने कहा था कि आईडीबीआई निरसन कानून, 2003 में सरकार को बैंक की हिस्सेदारी घटाने या बेचने से रोकने वाला कोई प्रावधान नहीं है।

3. वर्ष 2003 में प्रस्तावित संशोधन का क्या हुआ था?

सरकार की हिस्सेदारी घटाने पर रोक लगाने के लिए संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन वह स्वीकार नहीं हुआ और अंतिम कानून में शामिल नहीं किया गया।

4. वचनबद्धता के सिद्धांत का इस मामले में क्या अर्थ है?

इस सिद्धांत के आधार पर सरकार को हिस्सेदारी घटाने से रोकने की दलील दी गई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि संसदीय बहस के बयानों से ऐसा प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता।

5. बजट भाषणों में आईडीबीआई बैंक के बारे में क्या कहा गया था?

2016-17 के बजट में सरकारी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से नीचे लाने के विकल्प पर विचार का उल्लेख था। 2021-22 के बजट में भी रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया का जिक्र किया गया।

निष्कर्ष

वित्त मंत्रालय के अनुसार, आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बिक्री की नीति को कानून, दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले और अलग-अलग बजट भाषणों से समझा जा सकता है। प्रस्तावित सौदे के पूरा होने की प्रक्रिया आगे की शर्तों और मंजूरियों पर निर्भर करेगी।

अस्वीकरण: यह समाचार उपलब्ध रिपोर्टों और आधिकारिक बयान पर आधारित है। इसे निवेश, कानूनी या वित्तीय सलाह न माना जाए।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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