भारत के विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी एक नई रिपोर्ट ने देश की फैक्ट्रियों के बीच उत्पादन और कामकाज का बड़ा अंतर सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में चल रही कुल फैक्ट्रियों में से केवल 10.4 प्रतिशत बड़ी इकाइयां लगभग 72 प्रतिशत विनिर्माण मूल्य जोड़ती हैं। दूसरी ओर, छोटी इकाइयों की संख्या बहुत अधिक है, लेकिन कुल उत्पादन में उनका योगदान काफी कम है। यह अंतर बताता है कि फैक्ट्री की संख्या बढ़ना और उद्योग की वास्तविक क्षमता बढ़ना दो अलग बातें हैं।
बड़ी फैक्ट्रियां
- • कुल चालू इकाइयों में हिस्सा: 10.4 प्रतिशत
- • विनिर्माण मूल्य वर्धन में योगदान: करीब 72 प्रतिशत
- • औद्योगिक रोजगार में हिस्सा: लगभग 63 प्रतिशत
- • 200 से अधिक कर्मचारी वाली इकाइयां
इस खबर के मुख्य आंकड़े और कारण
टाइम्स ऑफ इंडिया में 2 नवंबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की पत्रिका में छपे अध्ययन और उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण 2022-23 के आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन में 200 से अधिक कर्मचारियों वाली इकाइयों को बड़ी फैक्ट्री माना गया है। ऐसी इकाइयां कुल चालू इकाइयों का 10.4 प्रतिशत हैं, लेकिन इनका विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन में योगदान लगभग 72 प्रतिशत बताया गया है। इनका कुल मूल्य लगभग 15.9 लाख करोड़ रुपये है और ये औद्योगिक रोजगार का करीब 63 प्रतिशत हिस्सा देती हैं।
इसके उलट, 50 तक कर्मचारियों वाली छोटी फैक्ट्रियां कुल चालू इकाइयों में 71 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन उनका योगदान कुल विनिर्माण मूल्य वर्धन में लगभग 10 प्रतिशत है। दस या उससे कम कर्मचारियों वाली इकाइयां कुल फैक्ट्रियों का 36.3 प्रतिशत हैं, पर उत्पादन में उनका हिस्सा केवल 2 प्रतिशत बताया गया है। इससे साफ है कि छोटे उद्योग देश की औद्योगिक संरचना का बड़ा आधार हैं, लेकिन वे बड़े कारखानों जैसी उत्पादकता हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
यहां manufacturing productivity का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी फैक्ट्री की उत्पादकता केवल मशीनों की संख्या से तय नहीं होती। मशीनों का सही उपयोग, बिजली की उपलब्धता, प्रशिक्षित कर्मचारी, कच्चे माल की समय पर आपूर्ति, बेहतर प्रबंधन और बाजार तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है। यदि छोटी इकाई के पास मशीन तो है, लेकिन ऑर्डर नियमित नहीं आते या मशीन कई घंटे खाली रहती है, तो उसकी लागत बढ़ती है और प्रति कर्मचारी उत्पादन कम रह जाता है।
उद्योग और कारोबार पर संभावित असर
अध्ययन में कर्ज का अंतर भी सामने आया है। दस या उससे कम कर्मचारियों वाली फैक्ट्रियों का औपचारिक ऋण और उत्पादन मूल्य का अनुपात लगभग 85 प्रतिशत है, जबकि 200 से अधिक कर्मचारियों वाली इकाइयों में यह करीब 39 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर छोटी फैक्ट्री पर कर्ज का बोझ एक जैसा है, बल्कि आंकड़ा दिखाता है कि छोटे प्रतिष्ठान अपनी क्षमता के मुकाबले अधिक औपचारिक ऋण पर निर्भर हो सकते हैं। यदि कर्ज से खरीदी गई मशीन या सुविधा पर्याप्त उत्पादन नहीं दे पाती, तो किस्त चुकाना कठिन हो जाता है।
सकल मूल्य वर्धन यानी gross value added का अर्थ है कि उत्पादन प्रक्रिया में किसी उद्योग ने कच्चे माल और खरीदी गई सेवाओं के मूल्य से आगे कितना नया आर्थिक मूल्य जोड़ा। यह आंकड़ा केवल बिक्री की रकम नहीं बताता। इससे पता चलता है कि उद्योग ने उत्पादन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में कितना अतिरिक्त मूल्य बनाया। बड़ी फैक्ट्रियों का ऊंचा योगदान उनकी बेहतर तकनीक, बड़े ऑर्डर, मशीनों के अधिक उपयोग और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ा हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, शोध और प्रशिक्षण में भी बड़ी और छोटी इकाइयों के बीच बड़ा अंतर है। सभी चालू फैक्ट्रियों में केवल 2.7 प्रतिशत के पास सक्रिय शोध एवं विकास व्यवस्था है और लगभग 6.7 प्रतिशत इकाइयां औपचारिक कौशल प्रशिक्षण देती हैं। बड़ी इकाइयों में यह हिस्सा अधिक है, जबकि बहुत छोटी इकाइयों में शोध व्यवस्था और प्रशिक्षण दोनों सीमित हैं। इसका असर उत्पाद की गुणवत्ता, नई तकनीक अपनाने और बड़े ग्राहकों के मानकों को पूरा करने की क्षमता पर पड़ता है।
इस अंतर का असर रोजगार की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है। छोटी इकाइयां स्थानीय स्तर पर काम देती हैं और कई शहरों तथा कस्बों में परिवारों की आमदनी का आधार हैं। लेकिन यदि वहां मशीनें पुरानी हों, काम का प्रशिक्षण न मिले और उत्पादन स्थिर न रहे, तो कर्मचारियों की आय और नौकरी की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। अध्ययन में महिला कर्मचारियों की हिस्सेदारी भी कम बताई गई है। पूरे विनिर्माण कार्यबल में महिलाओं का हिस्सा लगभग 11 प्रतिशत है, इसलिए उद्योगों में सुरक्षित कार्यस्थल और समान अवसर पर भी ध्यान देना जरूरी है।
छोटी फैक्ट्रियों की चुनौती
- • 50 तक कर्मचारियों वाली इकाइयां: 71 प्रतिशत से अधिक
- • उत्पादन में योगदान: करीब 10 प्रतिशत
- • 10 तक कर्मचारियों वाली इकाइयों का उत्पादन हिस्सा: 2 प्रतिशत
- • मुख्य जरूरत: तकनीक, प्रशिक्षण और आसान ऋण
आगे क्या बदल सकता है?
छोटे कारखानों को मजबूत करने के लिए केवल नई सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें सस्ती और समय पर मिलने वाली कार्यशील पूंजी, साझा परीक्षण प्रयोगशालाएं, आधुनिक मशीनों तक आसान पहुंच और बड़े उद्योगों के साथ स्थायी आपूर्ति संबंध चाहिए। औद्योगिक क्लस्टर में साझा गोदाम, बिजली, सड़क, प्रशिक्षण केंद्र और गुणवत्ता जांच सुविधा विकसित करने से छोटे उद्यमों की लागत कम हो सकती है। इससे वे बड़े खरीदारों के लिए समय पर और तय गुणवत्ता वाला माल बना पाएंगे।
नीति विशेषज्ञों के सुझावों में तकनीकी उन्नयन, बड़े कारखानों से आपूर्ति संबंध और आसान ऋण पहुंच जैसे कदम शामिल हैं। सरकार की योजनाओं का लाभ तभी व्यापक होगा जब छोटे उद्यमों को आवेदन प्रक्रिया समझने, जरूरी दस्तावेज तैयार करने और तकनीक चुनने में व्यावहारिक मदद मिले। बैंक भी केवल संपत्ति या पुराने कारोबार के आधार पर निर्णय लेने के बजाय ऑर्डर, नकदी प्रवाह और उत्पादन क्षमता का आकलन बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
भारत के लिए बड़ी फैक्ट्रियों का विस्तार जरूरी है, लेकिन छोटे कारखानों को पीछे छोड़कर औद्योगिक विकास टिकाऊ नहीं बन सकता। बड़ी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन और निर्यात कर सकती हैं, जबकि छोटी इकाइयां स्थानीय रोजगार, विशेष पुर्जों और क्षेत्रीय आपूर्ति में अहम भूमिका निभाती हैं। दोनों के बीच बेहतर साझेदारी बनने पर उद्योग का आधार मजबूत हो सकता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: भारत की कितनी बड़ी फैक्ट्रियां कुल उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देती हैं?
अध्ययन के अनुसार, 200 से अधिक कर्मचारियों वाली बड़ी फैक्ट्रियां कुल चालू इकाइयों का लगभग 10.4 प्रतिशत हैं, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन में उनका योगदान करीब 72 प्रतिशत है।
सवाल 2: छोटी फैक्ट्रियों का उत्पादन कम क्यों रहता है?
छोटी इकाइयों को पुरानी मशीनों, सीमित पूंजी, कम प्रशिक्षण, अनियमित ऑर्डर और कमजोर बाजार पहुंच जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इन कारणों से उनकी मशीनों और कर्मचारियों की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
सवाल 3: रिपोर्ट में कौन से आंकड़े इस्तेमाल किए गए हैं?
यह जानकारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन और उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण 2022-23 के आंकड़ों पर आधारित है। इसमें फैक्ट्री के आकार, कर्मचारियों, उत्पादन मूल्य और प्रशिक्षण जैसी बातों का आकलन किया गया।
सवाल 4: छोटे उद्योगों को मजबूत करने के लिए क्या जरूरी है?
छोटे उद्योगों को सस्ती पूंजी, आधुनिक मशीनें, साझा परीक्षण केंद्र, प्रशिक्षित कर्मचारी और बड़े खरीदारों से नियमित ऑर्डर मिलने चाहिए। स्थानीय औद्योगिक समूहों में साझा सुविधाएं बनाने से उनकी लागत घट सकती है और उत्पादन बेहतर हो सकता है।
सवाल 5: क्या बड़ी फैक्ट्रियों का बढ़ना छोटे उद्योगों के लिए नुकसान है?
जरूरी नहीं। बड़ी फैक्ट्रियां छोटे उद्योगों से पुर्जे और सेवाएं खरीद सकती हैं। यदि दोनों के बीच भरोसेमंद आपूर्ति संबंध बनें, तो छोटी इकाइयों को नियमित काम मिलेगा और बड़ी कंपनियों को स्थानीय स्तर पर जरूरी सामग्री मिल सकेगी।
निष्कर्ष
भारत के विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए बड़ी फैक्ट्रियों के साथ छोटे उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाना भी जरूरी है। तकनीक, प्रशिक्षण, ऋण और बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने से उत्पादन तथा रोजगार दोनों में सुधार हो सकता है।
यह लेख सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है। उद्योग, रोजगार और निवेश से जुड़े निर्णय लेने से पहले आधिकारिक आंकड़ों की जांच अवश्य करें।
