Batanagar की कहानी सिर्फ Bata कंपनी के एक पुराने कारखाने की कहानी नहीं है, बल्कि भारत में बने उन औद्योगिक शहरों की कहानी भी है, जहां कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए घर, अस्पताल, स्कूल और दूसरी सुविधाएं तैयार करती थीं।
Paramita Sen की किताब Batanagar: A Personal History of India’s Forgotten Company Town इसी शहर के जरिए कंपनी द्वारा बसाए गए ऐसे शहरों का इतिहास बताने की कोशिश करती है। हालांकि, किताब में Batanagar के साथ लेखिका के निजी अनुभवों को भी काफी जगह दी गई है।
Batanagar और भारत के कंपनी शहरों का इतिहास
Batanagar की शुरुआत 1934 के आसपास कोलकाता के पास दलदली इलाके में हुई थी। उस समय यह कोई अनोखा प्रयोग नहीं था। भारत में इससे पहले भी कंपनियों ने अपने कारखानों के आसपास योजनाबद्ध बस्तियां विकसित की थीं। Tatanagar और Kirloskarwadi इसके उदाहरण हैं। इसलिए कंपनी के जरिए शहर बसाने की परंपरा भारत में Bata के आने से पहले ही शुरू हो चुकी थी।
इस सोच को मजबूत आधार Jamsetji Tata ने दिया था। 1902 में उन्होंने अपने बेटे Dorabji Tata को उस शहर की योजना के बारे में बताया था, जो बाद में Jamshedpur बना। वह चाहते थे कि शहर में चौड़ी सड़कें, पेड़, मैदान, बगीचे और अलग-अलग धार्मिक स्थलों के लिए जगह हो। उनका विचार केवल कारखाना बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि कामगारों के लिए एक व्यवस्थित और बेहतर जीवन तैयार करना भी था। बाद में कई औद्योगिक कंपनियों ने इसी तरह की सोच को अपनाया।
इन कंपनी शहरों में रहने वाले कर्मचारियों के लिए घर, इलाज की सुविधा और नियमित वेतन जैसी चीजें काफी महत्वपूर्ण थीं। खासकर उन कामगारों के लिए जो अन्यथा शहरों की खराब बस्तियों में रहने को मजबूर हो सकते थे। लेकिन इस व्यवस्था का दूसरा पहलू भी था। कंपनी द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के साथ कर्मचारियों पर नियंत्रण भी बढ़ जाता था। शहर की बनावट, अलग-अलग क्षेत्रों का विभाजन और नियम-कायदे कर्मचारियों के जीवन को व्यवस्थित रखने के साथ उन पर निगरानी का काम भी करते थे।
कंपनी शहरों की प्रमुख विशेषताएं
- आवास: कर्मचारियों के लिए घर
- स्वास्थ्य: इलाज और अस्पताल की सुविधा
- सुविधाएं: स्कूल और दूसरी जरूरी सेवाएं
- व्यवस्था: योजनाबद्ध शहर और अलग-अलग क्षेत्र
- दूसरा पहलू: कर्मचारियों पर कंपनी का नियंत्रण
सुविधा के साथ नियंत्रण भी
इस व्यवस्था में सुविधा और नियंत्रण दोनों साथ-साथ चलते थे। बाहर से शांत दिखाई देने वाले इन शहरों में कामगारों के बीच असंतोष भी मौजूद था। कोलकाता के आसपास कई औद्योगिक इलाकों में 1970 के दशक में हुए बड़े श्रमिक आंदोलनों ने दिखाया कि कंपनी द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं हमेशा कर्मचारियों की नाराजगी को खत्म नहीं कर सकती थीं।
कंपनी द्वारा बसाए गए शहरों का विचार केवल भारत तक सीमित नहीं था। अमेरिका में भी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिए ऐसे शहर बनाए थे। George Pullman ने शिकागो के पास एक ऐसा औद्योगिक शहर विकसित किया था। बाद में मजदूरी और किराए को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि 1894 में बड़ा श्रमिक आंदोलन हुआ। ब्रिटेन में भी George Cadbury और William Lever ने अपने कर्मचारियों के लिए Bournville और Port Sunlight जैसे योजनाबद्ध शहर बनाए थे।
भारत में इस मॉडल का विस्तार आजादी के बाद और ज्यादा हुआ। सरकार ने Bhilai, Rourkela, Bokaro और Durgapur जैसे औद्योगिक शहरों को विकसित किया। इस तरह पहले निजी कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मॉडल को सार्वजनिक क्षेत्र में भी अपनाया गया। इन शहरों का उद्देश्य उद्योगों के आसपास कामगारों के लिए व्यवस्थित आवास और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना था।
कंपनी शहरों का कमजोर होता मॉडल
हालांकि, 1970 के दशक तक कंपनी शहरों की पुरानी व्यवस्था कमजोर होने लगी। श्रमिक संगठनों के मजबूत होने से कंपनियों और कर्मचारियों के बीच पुराना संबंध बदलने लगा। पहले जिन सुविधाओं को कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए विशेष लाभ के रूप में देती थीं, उनमें से कई बाद में श्रम कानूनों के तहत जरूरी हो गईं। इसके अलावा कई पुराने शहरों की आबादी तेजी से बढ़ गई और कंपनियों के लिए उनका संचालन पहले की तरह आसान नहीं रहा।
कंपनी शहरों में आया बदलाव
- समय: 1970 के दशक तक पुरानी व्यवस्था कमजोर होने लगी
- श्रमिक संगठन: कर्मचारियों की भूमिका मजबूत हुई
- श्रम कानून: कई सुविधाएं कानूनी जरूरत बन गईं
- आबादी: पुराने शहरों की आबादी तेजी से बढ़ी
- परिणाम: कंपनियों के लिए पुराने मॉडल का संचालन मुश्किल हुआ
Bata पर बदलती परिस्थितियों का असर
Bata पर भी बदलती परिस्थितियों का असर पड़ा। 1960 के दशक से कंपनी ने अपने कुछ पुराने इलाकों में चमड़े से जुड़े उत्पादन को कम करना शुरू किया। सस्ते एशियाई उत्पादन और बदलती बाजार व्यवस्था ने पुराने कारखाना-शहर मॉडल को कमजोर किया। सरकारी कंपनियों द्वारा बनाए गए औद्योगिक शहर कुछ ज्यादा समय तक टिके, लेकिन आसपास के शहरों के तेजी से फैलने के कारण उनका अलग महत्व धीरे-धीरे कम होता गया।
Bata का मूल मॉडल भारत से नहीं बल्कि Zlin से आया था। यह वही जगह थी जहां Tomas Bata ने अपना शुरुआती कारखाना बनाया था। कारखाने के साथ कर्मचारियों के लिए घर, अस्पताल और कंपनी का मुख्यालय भी विकसित किया गया। बाद में यही सोच Bata के दूसरे देशों में विस्तार का हिस्सा बनी। भारत में भी कंपनी ने इसी मॉडल को अपने तरीके से अपनाया।
भारत को लेकर Tomas Bata की शुरुआती सोच पूरी तरह सकारात्मक नहीं थी। लेकिन समय के साथ यात्रा और व्यापारिक संपर्क बढ़ने पर भारत कंपनी के लिए महत्वपूर्ण बाजार बन गया। 1932 के Ottawa Conference के बाद भारत का ब्रिटिश व्यापारिक व्यवस्था से संबंध और मजबूत हुआ, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए यहां कारोबार करने की संभावनाएं भी बढ़ीं।
Bata के विस्तार और Batanagar की कहानी
Bata के विस्तार को हर देश में आसानी से स्वीकार नहीं किया गया। अमेरिका में कंपनी को स्थानीय उत्पादकों, श्रमिक संगठनों और सरकारी अधिकारियों की आपत्तियों का सामना करना पड़ा। वहां विदेशी कंपनी के अपने कर्मचारियों को लाने और कंपनी शहर जैसी व्यवस्था बनाने को लेकर संदेह था। इसके विपरीत बंगाल में कंपनी के लिए जमीन और कामगार जुटाना अपेक्षाकृत आसान रहा।
Batanagar की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Bata परिवार के अंदर हुए विवादों से भी जुड़ा है। Tomas Bata की मृत्यु के बाद परिवार के अलग-अलग हिस्सों के बीच कंपनी के नियंत्रण को लेकर संघर्ष हुआ। यह विवाद Bata के कारोबारी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन किताब में इसे उतनी जगह नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिए थी।
समय के साथ Batanagar का पुराना रूप भी खत्म हो गया। जिस जगह कभी कारखाने और कर्मचारियों की बस्ती थी, वहां बाद में निजी विकास की योजनाएं सामने आईं। पुराने इलाके की जगह नए आवासीय और व्यावसायिक निर्माण की कल्पना की गई। इस बदलाव के साथ Batanagar के पुराने औद्योगिक इतिहास का बड़ा हिस्सा पीछे छूट गया।
कंपनी शहरों के दौर का अंत
कंपनी शहरों का दौर अब लगभग इतिहास बन चुका है। फिर भी Batanagar, Jamshedpur और ऐसे दूसरे शहर यह दिखाते हैं कि उद्योग और शहर का विकास कभी एक-दूसरे से अलग नहीं रहा। इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के बीच जो सामाजिक जुड़ाव बना, वह केवल संयोग से नहीं बल्कि शहर की योजना और उसकी बनावट से भी पैदा हुआ था। Batanagar का खत्म होना इसलिए केवल एक पुराने औद्योगिक इलाके का अंत नहीं है, बल्कि भारत के औद्योगिक इतिहास के एक खास दौर के समाप्त होने की कहानी भी है।

