भारत के समुद्री कारोबार में बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाना अब अकेला समाधान नहीं रह गया है। देश के बंदरगाहों पर माल की आवाजाही तेज हुई है, लेकिन निर्यात की मंजूरी मिलने के बाद जहाज तक माल पहुंचाने में काफी समय लग रहा है। 3 नवंबर 2026 को जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में सड़क और रेल संपर्क, गोदाम, जहाजरानी सेवाएं और औद्योगिक क्षेत्रों के साथ बेहतर तालमेल भारत के समुद्री व्यापार की रफ्तार तय करेंगे। रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2017-18 से 2025-26 के बीच बंदरगाहों पर संभाला गया माल 38 प्रतिशत बढ़ा, जबकि क्षमता में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
नई रिपोर्ट में भारत के समुद्री कारोबार पर क्या कहा गया?
फिक्की और केर्नी की संयुक्त रिपोर्ट का नाम भारत का समुद्री एजेंडा 2030 रखा गया है। इसमें कहा गया है कि देश को केवल नए घाट और क्रेन बनाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बंदरगाह से माल को सड़क, रेल और औद्योगिक केंद्रों तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। यदि माल बंदरगाह पर जल्दी संभल जाए, लेकिन उसे आगे ले जाने में कई दिन लगें, तो निर्यातक को समय और धन दोनों का नुकसान होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, देश के बड़े और छोटे बंदरगाहों पर संभाला गया माल वित्त वर्ष 2017-18 में 1,209 मिलियन टन था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 1,668 मिलियन टन हो गया। इसी अवधि में कुल माल संभालने की क्षमता 22 प्रतिशत बढ़कर सालाना 2.8 अरब टन पहुंची। क्षमता के उपयोग का स्तर 52 प्रतिशत से बढ़कर 59 प्रतिशत हो गया। इसका मतलब है कि बंदरगाहों में अभी भी आगे बढ़ने की गुंजाइश मौजूद है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि बड़े बंदरगाहों पर जहाज के आने से लेकर उसके रवाना होने तक का औसत समय 18 प्रतिशत घटकर करीब 49 घंटे रह गया। जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह, पिपावाव और मुंद्रा जैसे बंदरगाह विश्व बैंक के 2025 के कंटेनर बंदरगाह प्रदर्शन सूचकांक में दुनिया के शीर्ष 30 बंदरगाहों में शामिल रहे। यह भारत की समुद्री व्यवस्था में हुई प्रगति का संकेत है।
🚢 रिपोर्ट के अहम आंकड़े
- माल की मात्रा: 1,209 से बढ़कर 1,668 मिलियन टन
- बंदरगाह क्षमता: सालाना 2.8 अरब टन
- क्षमता उपयोग: 52 से बढ़कर 59 प्रतिशत
- जहाज का औसत समय: करीब 49 घंटे
- निर्यात समय: मंजूरी के बाद कुल समय का 84 प्रतिशत बीतता है
निर्यात की मंजूरी के बाद सबसे ज्यादा समय क्यों लगता है?
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्यात प्रक्रिया में देरी का बड़ा हिस्सा मंजूरी मिलने के बाद होता है। चार प्रमुख समुद्री बंदरगाहों के 2025 के समय अध्ययन के अनुसार, निर्यात की मंजूरी में औसतन करीब 30 घंटे लगे। लेकिन मंजूरी मिलने से जहाज के रवाना होने तक लगभग 158 घंटे लग गए। यह कुल मापे गए समय का करीब 84 प्रतिशत है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरा समय केवल सरकारी देरी के कारण लगता है। इसमें माल को बंदरगाह तक पहुंचाना, ट्रक और रेल की उपलब्धता, गोदाम में इंतजार, जहाज का तय कार्यक्रम और अन्य जरूरी काम शामिल हो सकते हैं। रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस समय में कुछ नियोजित प्रतीक्षा भी होती है। फिर भी यह आंकड़ा बताता है कि अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल सुधारने की जरूरत है।
जवाहरलाल नेहरू सीमा शुल्क केंद्र पर निर्यात की सीमा शुल्क मंजूरी का औसत समय 2026 में दो घंटे 12 मिनट रहा। इसके बावजूद पूरी निर्यात प्रक्रिया आठ दिन से अधिक हो सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि एक विभाग की प्रक्रिया तेज होने के बाद भी पूरी आपूर्ति व्यवस्था तेज नहीं होती। माल को मंजूरी के बाद सही समय पर जहाज तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
सड़क और रेल संपर्क को मजबूत करना जरूरी
बंदरगाह के आसपास सड़क और रेल की अच्छी सुविधा न हो तो माल की आवाजाही धीमी पड़ सकती है। औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाले ट्रक रास्ते में जाम में फंस सकते हैं। रेल के लिए पर्याप्त मालगाड़ी या समय पर खाली डिब्बे नहीं मिलने पर सामान बंदरगाह तक देर से पहुंचता है। इससे निर्यातक को भंडारण, ढुलाई और समय से जुड़ा अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बंदरगाहों को उनके पीछे स्थित औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़ने के लिए पहचानी गई 294 सड़क और रेल परियोजनाओं में से जुलाई 2026 तक केवल 84 पूरी हुई थीं। पश्चिमी समर्पित माल गलियारा, जो जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह को दादरी से जोड़ता है, मार्च 2026 में पूरी तरह चालू हो गया। इस तरह की परियोजनाएं माल को तेज और भरोसेमंद तरीके से पहुंचाने में मदद कर सकती हैं।
हर बंदरगाह की जरूरत अलग होती है। किसी बंदरगाह से कंटेनर अधिक जाते हैं, किसी से कोयला और ऊर्जा से जुड़ा सामान, जबकि कुछ बंदरगाह वाहन और औद्योगिक उत्पादों के निर्यात के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए एक जैसी योजना हर जगह लागू करने के बजाय स्थानीय माल, उद्योग और विदेशी बाजार को ध्यान में रखकर निवेश करना चाहिए।
📦 कारोबार को क्या लाभ मिल सकता है?
- निर्यातक: माल भेजने में लगने वाला समय घट सकता है
- उद्योग: कच्चा माल और तैयार सामान जल्दी पहुंच सकता है
- छोटे कारोबार: ढुलाई और भंडारण खर्च घटने की संभावना
- रोजगार: बंदरगाह और सहायक सेवाओं में काम बढ़ सकता है
- ग्राहक: आपूर्ति बेहतर होने से समय पर सामान मिल सकता है
ट्रांसशिपमेंट और निजी भागीदारी की चुनौती
भारत के समुद्री व्यापार में ट्रांसशिपमेंट भी एक बड़ा मुद्दा है। इसका अर्थ है कि एक जहाज से उतारे गए कंटेनर को दूसरे जहाज में रखकर आगे भेजा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 तक भारत के लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट कंटेनर विदेशी बंदरगाहों पर संभाले जा रहे थे। इससे भारतीय माल को दूसरे देशों के समुद्री केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता है।
विझिंजम बंदरगाह के चालू होने से भारत में गहरे समुद्र वाले बंदरगाह की क्षमता बढ़ी है। लेकिन किसी बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियों का प्रमुख केंद्र बनने के लिए नियमित जहाज सेवाएं, तेज माल प्रबंधन, बेहतर संपर्क और प्रतिस्पर्धी लागत चाहिए। केवल गहरा पानी या बड़ा ढांचा बन जाने से यह लक्ष्य अपने आप पूरा नहीं होता।
निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रमुख बंदरगाहों पर करीब दो-तिहाई माल निजी तौर पर संचालित टर्मिनलों से संभाला जा रहा है। सरकार ने 2030 तक इस हिस्से को 85 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। निजी निवेश से तकनीक, प्रबंधन और क्षमता में सुधार हो सकता है, लेकिन निगरानी और सेवा की गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी होगा।
छोटे उद्योगों और देश की अर्थव्यवस्था पर असर
समुद्री व्यापार केवल बड़े निर्यातकों तक सीमित नहीं है। छोटे और मध्यम उद्योग भी कपड़े, मशीन के पुर्जे, खाद्य उत्पाद, रसायन और दूसरे सामान विदेश भेजते हैं। यदि बंदरगाह तक पहुंचने में देरी और खर्च कम होता है तो छोटे कारोबारियों को भी फायदा मिल सकता है। समय पर माल पहुंचने से विदेशी खरीदारों का भरोसा बढ़ता है और नए बाजारों में कारोबार करने का अवसर मिलता है।
बंदरगाहों से जुड़े क्षेत्रों में ट्रक चालक, गोदाम कर्मचारी, माल ढुलाई एजेंट, पैकेजिंग इकाइयां और तकनीकी सेवाएं काम करती हैं। व्यापार बढ़ने पर इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बन सकते हैं। साथ ही, बेहतर ढुलाई व्यवस्था से कंपनियों को कच्चा माल समय पर मिल सकता है और उत्पादन की योजना बनाना आसान हो सकता है।
रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि हर प्रमुख समुद्री केंद्र के लिए एक जिम्मेदार समन्वयक तय किया जाए। उसे काम, निवेश, धन की व्यवस्था और समय सीमा की जिम्मेदारी दी जाए। माल की कुल लागत, पहुंचने का समय, बाजार तक पहुंच और कारोबार से मिलने वाले लाभ के आधार पर प्रगति मापी जानी चाहिए।
भारत के समुद्री कारोबार की नई चुनौतियों का विस्तृत विवरण इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में दिया गया है। कारोबार और आपूर्ति व्यवस्था को समझने के लिए आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन की पुस्तकें भी देख सकते हैं। इस लिंक से खरीदारी होने पर वेबसाइट को कमीशन मिल सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. भारत में बंदरगाहों पर माल की मात्रा कितनी बढ़ी है?
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से 2025-26 के बीच बड़े और छोटे बंदरगाहों पर संभाला गया माल 1,209 मिलियन टन से बढ़कर 1,668 मिलियन टन हो गया। इस अवधि में कुल माल की मात्रा में 38 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
2. निर्यात की मंजूरी के बाद माल भेजने में देरी क्यों होती है?
मंजूरी के बाद माल को बंदरगाह तक पहुंचाना, गोदाम में रखना, रेल या सड़क की व्यवस्था करना और जहाज के तय समय से जोड़ना पड़ता है। अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल कमजोर होने पर पूरी प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता है।
3. भारत के कितने ट्रांसशिपमेंट कंटेनर विदेशों में संभाले जाते थे?
रिपोर्ट में मई 2025 तक भारत के लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट कंटेनरों के विदेशी बंदरगाहों पर संभाले जाने की बात कही गई है। इससे देश में मजबूत समुद्री केंद्र और नियमित जहाज सेवाएं विकसित करने की जरूरत सामने आती है।
4. सड़क और रेल परियोजनाएं बंदरगाह कारोबार के लिए क्यों जरूरी हैं?
बंदरगाह से माल को कारखानों, गोदामों और बाजारों तक पहुंचाने के लिए सड़क और रेल संपर्क जरूरी है। अच्छी व्यवस्था से ट्रकों की प्रतीक्षा, माल ढुलाई का खर्च और निर्यात में लगने वाला समय कम हो सकता है।
5. समुद्री व्यापार बढ़ने से छोटे उद्योगों को क्या फायदा होगा?
बेहतर बंदरगाह और ढुलाई व्यवस्था से छोटे उद्योगों को सामान भेजने में कम समय और कम खर्च लग सकता है। इससे वे विदेशी ग्राहकों को समय पर माल दे सकते हैं, नए बाजारों तक पहुंच सकते हैं और कारोबार बढ़ाने के अवसर पा सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत के बंदरगाहों पर माल की मात्रा तेजी से बढ़ी है, लेकिन निर्यात की मंजूरी के बाद ढुलाई में देरी बड़ी चुनौती बनी हुई है। सड़क, रेल, जहाजरानी और उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल से व्यापार की लागत घट सकती है और देश की प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है।
अस्वीकरण: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट पर आधारित है। परियोजनाओं और व्यापार के परिणाम समय के साथ बदल सकते हैं।