Mobile Manufacturing India: सरकार ने PLI योजना 5 साल बढ़ाई

भारत सरकार ने घरेलू मोबाइल निर्माण को बढ़ावा देने वाली उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। पहले खत्म हो चुकी इस योजना को अब अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखा गया है। इस कदम से भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण क्षमता और निर्यात को आगे बढ़ाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। पिछले कुछ वर्षों में इस योजना के कारण भारत दुनिया में मोबाइल फोन बनाने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बना है। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं और खासकर महिलाओं को बड़ी संख्या में काम मिला है।

मोबाइल निर्माण योजना को अगले पांच साल तक बढ़ाया गया

हालांकि, योजना को दोबारा बढ़ाने से यह सवाल भी उठता है कि पांच साल की सहायता मिलने के बाद भी देश में मोबाइल बनाने वाली कंपनियों को अभी तक सरकारी मदद की जरूरत क्यों पड़ रही है। दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए भारत में फोन बनाने वाले कारखानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। भारत के मोबाइल निर्यात में तेजी जरूर आई है, लेकिन इसे समझने के लिए यह भी देखना जरूरी है कि निर्यात बढ़ने के साथ मोबाइल और उनके हिस्सों के आयात में भी काफी वृद्धि हुई है।

देश की आर्थिक स्थिति के लिए केवल निर्यात का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होता। यह देखना भी जरूरी है कि आयात और निर्यात के बीच वास्तविक अंतर कितना है। इसके अलावा मोबाइल फोन की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में भारत कितना वास्तविक मूल्य जोड़ रहा है, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। इन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक और बौद्धिक संपदा का कितना हिस्सा भारत में विकसित होता है, इस बारे में अभी अधिक स्पष्टता की जरूरत है।

रोजगार की बात करें तो इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं से मिलने वाली कुल नौकरियों में पांचवें हिस्से से भी कम योगदान दिया है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का हिस्सा इससे लगभग दोगुना रहा है। फिर भी भारत जैसे देश में जहां बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार की जरूरत है, हर नया रोजगार महत्वपूर्ण है। इसलिए मोबाइल निर्माण क्षेत्र में पैदा हुए अवसरों को पूरी तरह कम करके नहीं देखा जा सकता।

आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने पर जोर

सरकार ने केवल मोबाइल फोन के निर्माण तक खुद को सीमित नहीं रखा है। परिवहन, बुनियादी ढांचे और स्थानीय स्तर पर कारोबार में आने वाली परेशानियों को कम करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। साथ ही मोबाइल के जरूरी हिस्सों को देश में बनाने के लिए एक मजबूत आपूर्ति तंत्र तैयार करने की कोशिश हो रही है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता घटाना, भारत में अधिक मूल्य जोड़ना और उत्पादन इकाइयों को दूसरे देशों में जाने से रोकना है।

सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर भी सरकार काफी जोर दे रही है। इसके लिए अलग से वित्तीय सहायता दी जा रही है। सरकार की योजना भारत में चिप निर्माण का आधार मजबूत करने की है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार आने वाले आठ वर्षों में भारत 40 नैनोमीटर वाली चिप से आगे बढ़कर 3 से 7 नैनोमीटर श्रेणी की चिप विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। ऐसी चिप का इस्तेमाल मोबाइल जैसे आधुनिक उपकरणों में किया जाता है।

लेकिन आने वाले समय में एक नई चुनौती भी सामने आ सकती है। कारखानों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोट के बढ़ते इस्तेमाल से पारंपरिक रोजगार की जरूरत कम हो सकती है। दुनिया की कंपनियां कम लागत और अधिक उत्पादन के लिए तेजी से स्वचालित तकनीक अपना रही हैं। ऐसे में भारत को केवल सस्ते श्रम के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय तकनीक, डिजाइन और उत्पादन क्षमता में तेजी से आगे बढ़ना होगा।

📱 भारत के मोबाइल निर्माण की बड़ी तस्वीर

  • योजना: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को पांच वर्षों के लिए बढ़ाया गया
  • स्थिति: भारत दुनिया में मोबाइल फोन बनाने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बना
  • रोजगार: मोबाइल निर्माण से रोजगार के अवसर बढ़े
  • महिलाओं की भागीदारी: क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाओं को काम मिला
  • मुख्य चुनौती: मोबाइल और हिस्सों के आयात पर निर्भरता कम करना
  • लक्ष्य: भारत में अधिक वास्तविक मूल्य और तकनीकी क्षमता विकसित करना

तकनीक और स्वचालन से नई चुनौती

भारतीय कंपनियां विदेशों में मौजूद कारोबारों को खरीदकर भी अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ा सकती हैं। चीन की कई कंपनियों ने इस तरीके का इस्तेमाल किया है। उदाहरण के तौर पर शाओमी ने मोबाइल कारोबार से आगे बढ़ते हुए वाहन क्षेत्र में प्रवेश किया। इसी तरह चीनी कंपनियों ने पिछले दो दशकों में यूरोप की कई कंपोनेंट कंपनियों का अधिग्रहण किया है। इससे उन्हें वैश्विक आपूर्ति तंत्र और नई तकनीक तक पहुंच बनाने में मदद मिली।

भारत की कंपनियों को भी केवल घरेलू बाजार तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक स्तर पर सोचने की जरूरत होगी। मोबाइल और उसके हिस्सों के निर्माण में सरकारी सहायता के साथ घरेलू डिजाइन, अनुसंधान और तकनीकी विकास पर भी जोर देना जरूरी है। इससे भारत केवल दूसरे देशों के लिए उत्पादन करने वाला केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि अपने उत्पाद और तकनीक विकसित करने की क्षमता भी बढ़ा सकेगा।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने भारत के निर्माण क्षेत्र को नई दिशा दी है, लेकिन अब अगला लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। कंपनियों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने, देश में तकनीक विकसित करने, स्थानीय हिस्सों का इस्तेमाल बढ़ाने और वैश्विक बाजार में भारतीय कंपनियों की मजबूत मौजूदगी बनाने पर ध्यान देना होगा। सरकारी सहायता को लंबे समय तक जारी रखने के साथ यह भी जरूरी है कि कंपनियां धीरे-धीरे बिना सहायता के भी वैश्विक स्तर पर टिकने की क्षमता हासिल करें।

⚙️ भारत के लिए आगे की प्रमुख प्राथमिकताएं

  • तकनीक: घरेलू तकनीक और उत्पादन क्षमता को मजबूत करना
  • डिजाइन: भारतीय कंपनियों की डिजाइन क्षमता बढ़ाना
  • अनुसंधान: देश में शोध और तकनीकी विकास को बढ़ावा देना
  • स्थानीय हिस्से: मोबाइल के जरूरी हिस्सों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना
  • वैश्विक बाजार: भारतीय कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी मजबूत करना
  • आत्मनिर्भरता: लंबे समय में सरकारी सहायता के बिना प्रतिस्पर्धी बनना

अस्वीकरण: यह जानकारी सामान्य समाचार और विश्लेषण पर आधारित है। किसी निवेश या कारोबारी फैसले से पहले आधिकारिक जानकारी जरूर जांचें।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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