भारतीय शेयर बाजार में मोमेंटम निवेश (Momentum Investing) ने लगभग 15 महीनों की सुस्त चाल के बाद एक बार फिर जोरदार वापसी की है। अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में इस निवेश रणनीति ने अन्य प्रमुख फैक्टर आधारित निवेश शैलियों जैसे वैल्यू, क्वालिटी और लो-वोलैटिलिटी की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया।
मोमेंटम निवेश की दमदार वापसी
इसका संकेत है कि बाजार में भले ही व्यापक स्तर पर तेजी सीमित रही हो, लेकिन कुछ चुनिंदा सेक्टर और शेयर लगातार मजबूत रिटर्न दे रहे हैं, जिनकी ओर निवेशकों का ध्यान तेजी से बढ़ा है।
उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, 30 जून तक के तीन महीनों में Nifty 500 Momentum 50 Index में करीब 17.29% की बढ़त दर्ज की गई। इसी अवधि में क्वालिटी इंडेक्स लगभग 16.07%, वैल्यू इंडेक्स 7.89% और लो-वोलैटिलिटी इंडेक्स 5.52% की बढ़त तक सीमित रहे। इससे स्पष्ट होता है कि हाल के महीनों में तेजी दिखाने वाले शेयरों ने निवेशकों को अपेक्षाकृत बेहतर रिटर्न दिया है।
मोमेंटम रणनीति ने 2023 और 2024 में भी शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन 2025 के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव, वैश्विक टैरिफ विवाद और भू-राजनीतिक तनाव के कारण इसकी रफ्तार कमजोर पड़ गई थी। अब बाजार में स्थिरता लौटने और कुछ सेक्टरों में लगातार मजबूती आने के साथ यह रणनीति फिर से निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।
मोमेंटम रणनीति ने क्यों पकड़ी रफ्तार
मोमेंटम निवेश का मूल सिद्धांत यह है कि जिन शेयरों में पिछले छह से बारह महीनों के दौरान लगातार तेजी रही है, उनके आगे भी अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना मानी जाती है। फंड मैनेजर ऐसे शेयरों का चयन उनके पिछले प्रदर्शन और जोखिम के आधार पर तैयार किए गए मोमेंटम स्कोर से करते हैं। जिन कंपनियों का स्कोर सबसे अधिक होता है, उन्हें पोर्टफोलियो में शामिल किया जाता है।
हालांकि, यह रणनीति जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही जोखिमपूर्ण भी हो सकती है। यदि बाजार की दिशा अचानक बदल जाए या व्यापक बिकवाली शुरू हो जाए, तो मोमेंटम वाले शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है। ऐसे समय में इन फंडों का प्रदर्शन सामान्य बाजार से भी कमजोर हो सकता है। इसलिए इस रणनीति में निवेश करने वाले निवेशकों को अधिक जोखिम उठाने की क्षमता और लंबी अवधि का नजरिया रखना चाहिए।
मोमेंटम निवेश में जोखिम और सावधानियां
निवेश विशेषज्ञों का मानना है कि मोमेंटम फंड उन लोगों के लिए अधिक उपयुक्त हैं जो बाजार की चाल को समझते हैं और अपने निवेश पोर्टफोलियो में अतिरिक्त रिटर्न की संभावना तलाश रहे हैं। इन्हें मुख्य निवेश के बजाय पोर्टफोलियो के एक छोटे हिस्से के रूप में रखना अधिक संतुलित रणनीति माना जाता है।
दूसरी ओर, क्वालिटी निवेश उन कंपनियों पर केंद्रित होता है जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होती है, कर्ज कम होता है और नकदी प्रवाह बेहतर रहता है। वैल्यू निवेश में ऐसे शेयर चुने जाते हैं जो अपने वास्तविक मूल्य की तुलना में कम कीमत पर कारोबार कर रहे हों, जबकि लो-वोलैटिलिटी रणनीति अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव वाले शेयरों को प्राथमिकता देती है।
दीर्घकालिक प्रदर्शन और विविधीकरण का महत्व
लंबी अवधि के आंकड़ों पर नजर डालें तो मोमेंटम रणनीति ने पिछले तीन और पांच वर्षों में भी कई अन्य फैक्टर आधारित निवेश शैलियों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि किसी एक रणनीति पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय निवेशकों को विविधीकरण (Diversification) अपनाना चाहिए, ताकि बाजार में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव उनके कुल निवेश पर सीमित रहे।

