दवाओं की दुनिया में अब वैज्ञानिकों का ध्यान मस्तिष्क में जागने और सोने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले एक खास तंत्र पर है। जिस तरह जीएलपी-1 पर आधारित दवाओं ने मधुमेह के इलाज से शुरुआत करके वजन घटाने और कुछ अन्य बीमारियों के उपचार में अपनी उपयोगिता दिखाई है, उसी तरह अब ओरेक्सिन नामक रसायनों पर आधारित दवाओं से नई उम्मीदें जुड़ रही हैं। दवा कंपनियों को उम्मीद है कि ये दवाएं नींद से जुड़ी समस्याओं के अलावा भविष्य में मस्तिष्क और व्यवहार से संबंधित कुछ अन्य स्थितियों के इलाज में भी मदद कर सकती हैं।
ओरेक्सिन आधारित दवाओं से इलाज की नई उम्मीदें
ओरेक्सिन मस्तिष्क में संदेश पहुंचाने वाले रसायन हैं, जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है। इनका एक प्रमुख काम व्यक्ति को जागृत रखने और उसकी सतर्कता बनाए रखने में मदद करना है। वैज्ञानिक अब ऐसी दवाएं विकसित कर रहे हैं, जो ओरेक्सिन की तरह काम करके मस्तिष्क के जागने वाले तंत्र को सक्रिय कर सकें। जापान की दवा कंपनी टाकेडा की बनाई ओवेपोरक्सटन नामक दवा को अमेरिका के औषधि नियामक ने 5 अगस्त को नार्कोलेप्सी के इलाज के लिए मंजूरी दी थी। नार्कोलेप्सी एक ऐसी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति को दिन के समय बहुत ज्यादा नींद आती है और वह बिना किसी चेतावनी के अचानक सो सकता है।
इस क्षेत्र में दूसरी कंपनियां भी काम कर रही हैं। आयरलैंड की जैव प्रौद्योगिकी कंपनी अल्करमेस ओरेक्सिन पर आधारित एक दूसरी दवा विकसित कर रही है। वहीं, अमेरिकी दवा कंपनी एली लिली ने जून में सेंटेसा नामक कंपनी को खरीदने का समझौता किया था। इस सौदे का कुल मूल्य परीक्षणों की सफलता के आधार पर 7.8 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। सेंटेसा ऐसी दवा पर काम कर रही थी, जो शुरुआती परीक्षणों के चरण में थी। मॉर्गन स्टेनली के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2035 तक नार्कोलेप्सी और इससे जुड़ी नींद की समस्याओं के इलाज में ओरेक्सिन आधारित दवाओं का सालाना बाजार 16 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके मुकाबले इन बीमारियों के लिए इस्तेमाल होने वाली मौजूदा दवाओं की सालाना बिक्री करीब 3 अरब डॉलर बताई गई है।
ओरेक्सिन दवाओं से जुड़ी प्रमुख बातें
- मुख्य उद्देश्य: जागने और सोने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना
- प्रमुख बीमारी: नार्कोलेप्सी
- प्रमुख कंपनियां: टाकेडा, एली लिली और अल्करमेस
- अनुमानित बाजार: वर्ष 2035 तक सालाना 16 अरब डॉलर
- मौजूदा दवाओं की बिक्री: करीब 3 अरब डॉलर सालाना
- महत्वपूर्ण बात: अन्य बीमारियों में संभावित उपयोग की पुष्टि के लिए और शोध जरूरी है।
नींद, ध्यान और मस्तिष्क की इनाम प्रणाली में भूमिका
इन दवाओं को लेकर बढ़ती दिलचस्पी का कारण केवल नार्कोलेप्सी का इलाज नहीं है। ओरेक्सिन नींद, ध्यान, प्रेरणा और मस्तिष्क की इनाम से जुड़ी प्रणाली को भी नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं। इसलिए वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इन पर आधारित दवाएं अवसाद, ध्यान की कमी और अतिसक्रियता से जुड़ी समस्या यानी एडीएचडी तथा नशे की लत जैसी स्थितियों में भी उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि, इन संभावित उपयोगों को साबित करने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
ओरेक्सिन की खोज कैसे हुई?
ओरेक्सिन की खोज करीब तीन दशक पहले हुई थी। जनवरी 1998 में कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में लुइस डी लिओसिया और उनके सहयोगियों ने इन रसायनों की पहचान की थी और उन्हें हाइपोक्रेटिन नाम दिया था। इसके कुछ सप्ताह बाद टेक्सास के एक अन्य शोध दल ने भी इन्हीं रसायनों की पहचान की। इस दल का नेतृत्व मासाशी यानागिसावा कर रहे थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि चूहों के मस्तिष्क में इन रसायनों को पहुंचाने से उनकी भूख बढ़ सकती है। इसी आधार पर उन्होंने इन्हें ओरेक्सिन नाम दिया। यह नाम ग्रीक भाषा के एक शब्द से आया है, जिसका संबंध भूख से है।
अगले वर्ष वैज्ञानिकों को ओरेक्सिन की जागने और सोने की प्रक्रिया में अहम भूमिका का पता चला। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता इमैनुएल मिग्नोट कुत्तों में नार्कोलेप्सी से जुड़े आनुवंशिक कारणों का अध्ययन कर रहे थे। कुछ कुत्ते खेलते समय अचानक गिर जाते थे। शोध में पता चला कि एक आनुवंशिक बदलाव के कारण उनका मस्तिष्क ओरेक्सिन के संकेतों पर ठीक से प्रतिक्रिया नहीं कर पा रहा था। इसी दौरान दूसरे प्रयोगों में भी पाया गया कि जिन चूहों में ओरेक्सिन नहीं था, वे बार-बार सोने लगते थे और अचानक गिर जाते थे। बाद में मनुष्यों पर किए गए अध्ययनों में भी नार्कोलेप्सी के कुछ मरीजों में ओरेक्सिन बनाने वाली विशेष तंत्रिका कोशिकाओं की कमी पाई गई।
मस्तिष्क में ओरेक्सिन कैसे काम करता है?
ओरेक्सिन बनाने वाली ये कोशिकाएं मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस नामक हिस्से में होती हैं। वहां से निकलने के बाद ओरेक्सिन आसपास की तंत्रिका कोशिकाओं की सतह पर मौजूद विशेष रिसेप्टर से जुड़ते हैं। ये रिसेप्टर दो प्रकार के होते हैं, जिन्हें ओएक्स1आर और ओएक्स2आर कहा जाता है। इनमें ओएक्स2आर व्यक्ति को जागृत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके सक्रिय होने से मस्तिष्क में नॉरएपिनेफ्रिन, सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे दूसरे रसायनों से जुड़ी प्रणालियां भी सक्रिय रहती हैं। इनका मिलाजुला असर व्यक्ति की सतर्कता बनाए रखने में मदद करता है। दूसरी ओर, ओएक्स1आर का संबंध प्रेरणा और इनाम से जुड़ी मस्तिष्क की प्रक्रियाओं से अधिक है।
अनिद्रा के इलाज में ओरेक्सिन प्रतिरोधक दवाओं का इस्तेमाल
वैज्ञानिक पहले ऐसी दवाएं विकसित करने में सफल हुए, जो ओरेक्सिन के प्रभाव को रोकती हैं। इन दवाओं को ओरेक्सिन प्रतिरोधक कहा जाता है। वर्ष 2014 से इनका इस्तेमाल अनिद्रा के इलाज में किया जा रहा है। सामान्य नींद की गोलियां मस्तिष्क में एक ऐसे रसायन की गतिविधि बढ़ाती हैं, जो तंत्रिका तंत्र को शांत करता है। इसके विपरीत, ओरेक्सिन प्रतिरोधक दवाएं जागृत रखने वाले संकेतों को कम करती हैं, जिससे शरीर की नींद से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रियाओं को काम करने में मदद मिलती है।
कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी की ओरेक्सिन विशेषज्ञ बिरगिटे कोर्नम के अनुसार, कुछ पारंपरिक नींद की दवाएं व्यक्ति को शांत या सुस्त कर सकती हैं और लगातार इस्तेमाल करने पर उनका असर कम भी हो सकता है। ओरेक्सिन को रोकने वाली दवाएं अलग तरीके से काम करती हैं। वे मस्तिष्क के जागने वाले संकेतों को कम करके नींद आने की प्रक्रिया को बढ़ावा देती हैं। हालांकि, अब वैज्ञानिकों का ध्यान ऐसी दवाओं पर है, जो ओरेक्सिन के संकेतों को रोकने के बजाय उन्हें दोबारा सक्रिय कर सकें।
नई दवाओं की संभावनाएं और चुनौतियां
- संभावित लाभ: जागने और सतर्कता बनाए रखने में मदद
- अनुसंधान के क्षेत्र: नार्कोलेप्सी, एडीएचडी और नशे की लत
- प्रमुख चुनौती: दवा का रक्त और मस्तिष्क के बीच सुरक्षा अवरोध पार करना
- परीक्षण में सामने आए प्रभाव: जागने की अवधि में सुधार और कैटाप्लेक्सी के दौरों में कमी
- संभावित दुष्प्रभाव: अनिद्रा और बार-बार पेशाब करने की इच्छा
- आगे की जरूरत: बड़े परीक्षणों से सुरक्षा और प्रभावशीलता की पुष्टि
नार्कोलेप्सी टाइप-1 में नई दवाओं की जरूरत
ऐसी दवाओं की सबसे अधिक जरूरत नार्कोलेप्सी टाइप-1 से पीड़ित लोगों के लिए मानी जा रही है। इस बीमारी में दिन के समय अत्यधिक नींद आने के साथ मांसपेशियों पर नियंत्रण अचानक खत्म हो सकता है। इस स्थिति को कैटाप्लेक्सी कहा जाता है। यह तेज हंसी, उत्साह या किसी अन्य मजबूत भावना के दौरान भी हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बीमारी में ओएक्स2आर से जुड़ने वाले ओरेक्सिन का स्तर असामान्य रूप से कम हो जाता है। इसके कारण जागने और मांसपेशियों पर नियंत्रण बनाए रखने वाली प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।
सपने देखने वाली नींद की अवस्था को रैपिड आई मूवमेंट यानी आरईएम स्लीप कहा जाता है। इस दौरान शरीर की मांसपेशियों की गतिविधि काफी हद तक रुक जाती है, ताकि व्यक्ति सपनों में होने वाली गतिविधियों को वास्तव में न करने लगे। जागते समय कुछ रसायन इस प्रक्रिया को नियंत्रित रखते हैं। ओरेक्सिन की कमी होने पर यह संतुलन बिगड़ सकता है और व्यक्ति पूरी तरह जागते हुए भी अचानक मांसपेशियों पर नियंत्रण खो सकता है। यही कारण है कि ओरेक्सिन के संकेतों को दोबारा सक्रिय करने वाली दवाओं को इस बीमारी के इलाज के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ओरेक्सिन आधारित दवाएं बनाना क्यों मुश्किल है?
हालांकि, ओरेक्सिन को सक्रिय करने वाली दवा बनाना आसान नहीं है। किसी रसायन के प्रभाव को रोकने वाली दवा को केवल संबंधित रिसेप्टर से जुड़कर उसका काम रोकना होता है। लेकिन ओरेक्सिन जैसी दवा को शरीर में प्राकृतिक रसायन के समान प्रभाव पैदा करना पड़ता है। इसके अलावा, दवा को रक्त और मस्तिष्क के बीच मौजूद सुरक्षा अवरोध को पार करना होता है। यह अवरोध कई हानिकारक पदार्थों को मस्तिष्क तक पहुंचने से रोकता है।
टाकेडा की दवा के परीक्षण में क्या सामने आया?
टाकेडा ने इससे पहले फिराजोरेक्सटन नामक दवा विकसित करने की कोशिश की थी। शुरुआती नतीजे उम्मीद जगाने वाले थे, लेकिन वर्ष 2021 में कुछ मरीजों के लिवर को नुकसान पहुंचने के बाद इसका विकास रोक दिया गया। इसके बाद कंपनी ने ओवेपोरक्सटन पर काम किया। मई 2025 में इसके परीक्षण के नतीजे सामने आए, जिनसे वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ी।
आठ सप्ताह तक चले एक परीक्षण में 90 मरीज शामिल हुए। इसमें यह जांचा गया कि दवा लेने के बाद मरीज कितनी देर तक जागते रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें एक शांत और कम रोशनी वाले कमरे में बैठाया गया। परीक्षण के नतीजों के अनुसार, दवा की अलग-अलग खुराक लेने वाले मरीजों की जागते रहने की अवधि में 12.5 से 25 मिनट तक का सुधार हुआ। कई मरीजों के नतीजे सामान्य स्तर के करीब पहुंच गए। दवा लेने वाले मरीजों में कैटाप्लेक्सी के दौरे भी प्लेसिबो यानी बिना सक्रिय दवा वाले उपचार की तुलना में लगभग एक-तिहाई कम देखे गए। हालांकि, कुछ मरीजों को अनिद्रा हुई और करीब एक-तिहाई मरीजों ने बार-बार पेशाब करने की असहज इच्छा महसूस होने की शिकायत की।
ओवेपोरक्सटन और मौजूदा नार्कोलेप्सी दवाओं में अंतर
ओवेपोरक्सटन की एक खास बात यह है कि यह मौजूदा दवाओं से अलग तरीके से काम करती है। अभी नार्कोलेप्सी के इलाज में मेथिलफेनिडेट और मोडाफिनिल जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। ये दवाएं सतर्कता बढ़ाने और लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन बीमारी के मूल कारण को सीधे ठीक नहीं करतीं। कुछ दवाएं मस्तिष्क के कई हिस्सों में डोपामिन और नॉरएपिनेफ्रिन जैसे रसायनों की गतिविधि बढ़ाती हैं। इससे घबराहट, रक्तचाप बढ़ने और नींद प्रभावित होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ दवाओं के साथ लत लगने का जोखिम भी जुड़ा होता है।
इसके विपरीत, ओरेक्सिन मस्तिष्क की जागृत रहने वाली कई प्रणालियों के बीच तालमेल बनाने में मदद करते हैं। जापानी शोधकर्ता मासाशी यानागिसावा का मानना है कि ओरेक्सिन को सक्रिय करने वाली दवाएं अधिक प्राकृतिक और स्थिर सतर्कता पैदा कर सकती हैं। उनसे कुछ मौजूदा दवाओं की तुलना में दुष्प्रभाव और गलत इस्तेमाल का जोखिम कम होने की उम्मीद है। हालांकि, इन संभावनाओं की पुष्टि के लिए बड़े और लंबे परीक्षण जरूरी होंगे।
एली लिली और अल्करमेस की दवाओं पर शोध
एली लिली भी ओरेक्सिन पर आधारित दवाओं के परीक्षण कर रही है। सेंटेसा के अधिग्रहण के माध्यम से कंपनी को मिली एक दवा का परीक्षण नार्कोलेप्सी टाइप-1, नार्कोलेप्सी टाइप-2 और इडियोपैथिक हाइपरसोम्निया के लिए किया जा रहा है। इडियोपैथिक हाइपरसोम्निया में व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा नींद आती है, लेकिन इसका स्पष्ट कारण पता नहीं चलता। शुरुआती परीक्षणों में 55 मरीज शामिल थे। नतीजों में नार्कोलेप्सी टाइप-1 के मरीजों की जागने की अवधि में 20 मिनट से अधिक और टाइप-2 के मरीजों में 10 मिनट से अधिक सुधार देखा गया। हालांकि, परीक्षण में मरीजों की संख्या कम होने के कारण इन नतीजों को शुरुआती संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
दवा कंपनियां अब यह भी पता लगा रही हैं कि ओरेक्सिन से जुड़ी दवाएं दूसरी बीमारियों में कितनी उपयोगी हो सकती हैं। अल्करमेस वयस्कों में एडीएचडी के इलाज के लिए एक दवा का परीक्षण कर रही है। इसके पीछे यह विचार है कि नार्कोलेप्सी के मरीजों में जागरूकता बढ़ने के साथ ध्यान देने की क्षमता में भी सुधार देखा गया है। वैज्ञानिक यह भी जांच रहे हैं कि इन दवाओं से स्लीप एपनिया जैसी समस्या में कोई लाभ मिल सकता है या नहीं। स्लीप एपनिया में सोते समय सांस बार-बार रुकने या बाधित होने की समस्या होती है।
अवसाद और नशे की लत पर भी हो रहा है शोध
ओरेक्सिन की दूसरी प्रणाली, ओएक्स1आर, पर भी शोध किया जा रहा है। इसका संबंध प्रेरणा और मस्तिष्क की इनाम प्रणाली से है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रिसेप्टर को रोकने से नशे की तलब कम करने में मदद मिल सकती है। वहीं, इसे सक्रिय करने से कुछ प्रकार के अवसाद में राहत देने या प्रेरणा बढ़ाने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है। फिलहाल ये शुरुआती विचार हैं और इनके असर को साबित करने के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों की जरूरत है।
एली लिली के मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी डैन स्कोवरोन्स्की के अनुसार, भूख और नींद शरीर के संतुलन को बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण प्रणालियां हैं। जब इनका नियंत्रण बिगड़ता है, तो कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। जीएलपी-1 पर आधारित दवाओं की सफलता ने दिखाया है कि शरीर की किसी महत्वपूर्ण नियामक प्रणाली को सही ढंग से प्रभावित करने वाली दवाएं कई बीमारियों के इलाज में उपयोगी हो सकती हैं। अब दवा कंपनियां ओरेक्सिन पर आधारित उपचारों से भी ऐसी ही संभावनाएं तलाश रही हैं। हालांकि, नींद, ध्यान, अवसाद और नशे की लत जैसी अलग-अलग स्थितियों में इन दवाओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित होने में अभी समय लग सकता है।
इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय तंत्रिका संबंधी विकार एवं स्ट्रोक संस्थान की नार्कोलेप्सी संबंधी जानकारी देखी जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. ओरेक्सिन क्या है और यह शरीर में क्या काम करता है?
ओरेक्सिन मस्तिष्क में बनने वाला एक रासायनिक संदेशवाहक है, जो जागने, सतर्कता, ध्यान और प्रेरणा को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसकी कमी से नींद से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। वैज्ञानिक अब ऐसी दवाओं पर शोध कर रहे हैं, जो इसके संकेतों को सक्रिय कर सकें।
2. नार्कोलेप्सी बीमारी में क्या होता है?
नार्कोलेप्सी एक तंत्रिका संबंधी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति को दिन में अत्यधिक नींद आती है और वह अचानक सो सकता है। कुछ मरीजों में तेज भावनाओं के दौरान मांसपेशियों पर नियंत्रण भी खत्म हो सकता है। उपचार से लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
3. ओरेक्सिन आधारित दवाएं किस तरह काम करती हैं?
ओरेक्सिन आधारित सक्रिय करने वाली दवाएं मस्तिष्क के उन रिसेप्टरों को सक्रिय करने के लिए बनाई जाती हैं, जो जागने और सतर्कता बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं। इनका उद्देश्य ओरेक्सिन के संकेतों को मजबूत करना है। इन दवाओं के लाभ और जोखिम जानने के लिए आगे परीक्षण जरूरी हैं।
4. क्या ओरेक्सिन दवाएं अनिद्रा के इलाज में इस्तेमाल होती हैं?
ओरेक्सिन प्रतिरोधक दवाएं अनिद्रा के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं। ये मस्तिष्क के जागृत रखने वाले संकेतों को कम करके नींद आने में मदद करती हैं। इसके विपरीत, ओरेक्सिन को सक्रिय करने वाली नई दवाओं पर अत्यधिक नींद और नार्कोलेप्सी जैसी स्थितियों के उपचार के लिए शोध किया जा रहा है।
5. क्या ओरेक्सिन आधारित दवाएं अवसाद और एडीएचडी में उपयोगी हो सकती हैं?
वैज्ञानिक ओरेक्सिन की भूमिका को देखते हुए अवसाद, एडीएचडी और नशे की लत जैसी स्थितियों में इनके संभावित उपयोग का अध्ययन कर रहे हैं। अभी इन उपचारों की प्रभावशीलता और सुरक्षा के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इन्हें इन समस्याओं का स्थापित इलाज नहीं माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
ओरेक्सिन पर आधारित दवाएं नार्कोलेप्सी और अत्यधिक नींद जैसी समस्याओं के इलाज में नई संभावनाएं खोल रही हैं। हालांकि, अन्य बीमारियों में इनके उपयोग को साबित करने और दीर्घकालीन सुरक्षा समझने के लिए बड़े वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। दवा लेने, बदलने या बंद करने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

