Poultry Industry: मक्का आयात शुल्क हटाने की मांग तेज

भारत के मुर्गी पालन कारोबार पर चारे की बढ़ती लागत का दबाव बढ़ रहा है। इसी वजह से उद्योग से जुड़े संगठनों ने सरकार से गैर-जीएम मक्का के आयात पर शुल्क हटाने और भारतीय खाद्य निगम के ऐसे अनाज को पशु आहार में इस्तेमाल करने की अनुमति देने की मांग की है, जो इंसानों के खाने योग्य नहीं रह गया है। यह मांग ऐसे समय आई है जब मौसम से जुड़ी अनिश्चितता, मक्का और सोयाबीन की कीमतों तथा चिकन की कमजोर मांग ने कारोबारियों की चिंता बढ़ाई है।

उद्योग के प्रतिनिधियों की बैठक में जीवित मुर्गे के लिए 110 रुपये प्रति किलोग्राम का आधार मूल्य तय करने पर भी सहमति बनी। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार को व्यवस्थित रखना बताया गया है। हालांकि ऐसा आधार मूल्य अपने आप खुदरा दुकानों पर चिकन की कीमत तय नहीं करता। अंतिम कीमत में परिवहन, दुकान का खर्च, कटाई, पैकेजिंग, स्थानीय मांग और आपूर्ति जैसे कई पहलू शामिल होते हैं।

चारे की लागत क्यों बढ़ रही है?

मुर्गी पालन में कुल खर्च का बड़ा हिस्सा दाने और चारे पर होता है। मक्का और सोयाबीन जैसे पदार्थ ऊर्जा और प्रोटीन उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। यदि इनकी कीमत बढ़ती है, तो किसान और बड़े उत्पादक दोनों की लागत बढ़ जाती है। छोटे पोल्ट्री फार्म के पास अक्सर लंबे समय तक महंगा चारा खरीदने की आर्थिक क्षमता कम होती है। उन्हें मुर्गियों की संख्या, बिक्री का समय और बाजार में मिलने वाले भाव के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

मक्का की उपलब्धता पर मौसम का असर पड़ता है। कमजोर बारिश, फसल की पैदावार में कमी और खेत से मंडी तक पहुंचने में आने वाली दिक्कतें बाजार में आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं। सोयाबीन की कीमत में बदलाव भी चारे की कुल लागत पर असर डालता है। इसके अलावा बिजली, ईंधन, श्रम और परिवहन खर्च बढ़ने पर दाना तैयार करने और फार्म तक पहुंचाने की लागत भी ऊपर जा सकती है।

पोल्ट्री फार्म में इस्तेमाल होने वाला चारा केवल एक अनाज से नहीं बनता। इसमें अलग-अलग अनाज, तेल निकाले जाने के बाद बचने वाली खली, खनिज और पोषण संबंधी सामग्री शामिल हो सकती है। इनकी मात्रा पक्षी की उम्र, नस्ल और उत्पादन के उद्देश्य के अनुसार तय की जाती है। इसलिए किसी एक वस्तु की कीमत कम होने से पूरी लागत हमेशा उसी अनुपात में कम नहीं होती।

गैर-जीएम मक्का आयात की मांग क्या है?

उद्योग संगठनों ने गैर-जीएम मक्का के आयात पर शुल्क-मुक्त सुविधा मांगी है। गैर-जीएम का अर्थ है ऐसा मक्का जिसे आनुवंशिक बदलाव वाली फसल के रूप में तैयार नहीं किया गया हो। उद्योग का तर्क है कि घरेलू बाजार में मक्का महंगा या कम उपलब्ध होने पर आयात से अतिरिक्त आपूर्ति मिल सकती है। इससे चारा बनाने वाली इकाइयों को विकल्प मिलेगा और उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन आयात से जुड़ा फैसला कई बातों पर निर्भर करेगा। सरकार को घरेलू किसानों के हित, देश में उपलब्ध स्टॉक, आयात की कीमत, गुणवत्ता मानक और खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा। यदि सस्ते आयात से घरेलू मक्का किसानों को नुकसान होता है, तो नीति में संतुलन बनाना जरूरी होगा। इसलिए उद्योग की मांग को तत्काल सरकारी मंजूरी नहीं समझना चाहिए। यह एक प्रस्ताव है, जिस पर संबंधित विभागों का फैसला बाकी है।

दूसरी मांग भारतीय खाद्य निगम के ऐसे अनाज को चारे में इस्तेमाल करने की है, जो मानव उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं है। यदि ऐसे अनाज की गुणवत्ता जांच के बाद सुरक्षित उपयोग संभव हो, तो उसका उपयोग संसाधनों की बर्बादी कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन इसके लिए नमी, फफूंद, विषैले तत्व और भंडारण की स्थिति की जांच जरूरी होगी। खराब या दूषित अनाज को बिना परीक्षण पशुओं के आहार में देना नुकसानदेह हो सकता है।

🐔 पोल्ट्री कारोबार की अहम बातें

  • मुख्य मांग: गैर-जीएम मक्का आयात पर शुल्क हटाना
  • दूसरी मांग: अनुपयोगी एफसीआई अनाज का सुरक्षित चारा उपयोग
  • लागत का दबाव: मक्का, सोयाबीन, ऊर्जा और परिवहन
  • बैठक में आधार भाव: जीवित मुर्गे के लिए 110 रुपये प्रति किलो
  • मुख्य चिंता: कमजोर मांग और बढ़ती उत्पादन लागत

उद्योग प्रतिनिधियों ने जीवित मुर्गे के लिए 110 रुपये प्रति किलोग्राम का आधार भाव रखने पर भी चर्चा की। यह कदम बाजार में बहुत कम कीमत मिलने की स्थिति में उत्पादकों को राहत देने के उद्देश्य से जुड़ा है। फिर भी अलग-अलग राज्यों में मांग और आपूर्ति का स्तर अलग होता है। इसलिए किसी एक आधार भाव से पूरे देश में एक जैसी कीमत बनने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। स्थानीय बाजार, त्योहार, मौसम और उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता का असर बना रहेगा।

यदि फार्म को चारे की लागत ज्यादा चुकानी पड़ती है और बिक्री का भाव कम मिलता है, तो उसकी कमाई पर दबाव आता है। ऐसी स्थिति में कुछ किसान उत्पादन कम कर सकते हैं या नए बैच शुरू करने में देरी कर सकते हैं। इससे आगे चलकर बाजार में चिकन और अंडों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। हालांकि कीमतों में बदलाव का समय और स्तर पहले से तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि मांग और उत्पादन दोनों तेजी से बदल सकते हैं।

उपभोक्ताओं और किसानों पर संभावित असर

आम उपभोक्ताओं के लिए इसका सीधा संबंध चिकन और अंडों की कीमत से है। यदि चारा महंगा बना रहता है, तो कुछ समय बाद उत्पादक बढ़ी हुई लागत का हिस्सा बिक्री कीमत में शामिल करने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यदि बाजार में मांग कमजोर रहती है, तो वे पूरी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाएंगे। इसलिए लागत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि खुदरा कीमत तुरंत या समान मात्रा में बढ़ जाएगी।

🧾 किसानों के लिए जरूरी कदम

  • खरीद: अलग-अलग सप्लायर के भाव और गुणवत्ता की तुलना
  • भंडारण: चारे को सूखी और साफ जगह पर रखना
  • बर्बादी: फीडर और दाने की मात्रा सही रखना
  • पोषण: वैकल्पिक चारे की गुणवत्ता जांचना
  • योजना: बिक्री और नए बैच का समय सोच-समझकर तय करना

छोटे किसानों के लिए चारे की खरीद सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। उनके पास बड़े उत्पादकों की तरह थोक खरीद और लंबे समय के आपूर्ति समझौते का लाभ नहीं होता। उन्हें स्थानीय डीलर से दाना खरीदना पड़ता है, जहां कीमत और उपलब्धता बदल सकती है। बेहतर भंडारण, सही मात्रा में दाना खरीदना, बर्बादी रोकना और पक्षियों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना लागत प्रबंधन में मदद कर सकता है।

उत्पादकों को केवल सस्ता चारा तलाशने के बजाय उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए। पोषण में कमी होने पर पक्षियों की वृद्धि धीमी हो सकती है और बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। इससे इलाज, मृत्यु दर और उत्पादन समय का खर्च बढ़ सकता है। किसी भी वैकल्पिक दाने को अपनाने से पहले पशु पोषण विशेषज्ञ या योग्य सलाहकार से उसकी मात्रा और गुणवत्ता की पुष्टि करना उपयोगी होगा।

छोटे फार्म में दाना बर्बाद होने से रोकने के लिए सही आकार का फीडर और सूखा भंडारण उपयोगी हो सकता है। मुर्गियों के लिए दाना फीडर के विकल्प यहां देखें। खरीद से पहले फार्म में पक्षियों की संख्या, फीडर की क्षमता, सफाई और सामग्री की मजबूती जांचें।

इस घटनाक्रम की जानकारी 3 नवंबर 2026 को प्रकाशित हिंदू बिजनेसलाइन की रिपोर्ट पर आधारित है। सरकार की ओर से आयात शुल्क में बदलाव या खाद्य निगम के अनाज के उपयोग को लेकर अंतिम आदेश जारी होने पर ही नीति की स्थिति स्पष्ट होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. पोल्ट्री उद्योग सरकार से क्या मांग रहा है?

उद्योग गैर-जीएम मक्का के आयात पर शुल्क हटाने और मानव उपभोग के योग्य नहीं बचे एफसीआई अनाज के सुरक्षित उपयोग की मांग कर रहा है। इसका उद्देश्य चारे की लागत कम करना और उपलब्धता बढ़ाना है।

2. मक्का की कीमत बढ़ने से मुर्गी पालन पर क्या असर होता है?

मक्का चारे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी कीमत बढ़ने पर दाना बनाने का खर्च बढ़ सकता है। इससे छोटे किसानों का लाभ कम हो सकता है और कुछ उत्पादक नए बैच शुरू करने में देरी कर सकते हैं।

3. गैर-जीएम मक्का का क्या मतलब है?

गैर-जीएम मक्का ऐसी फसल को कहा जाता है जिसे आनुवंशिक बदलाव की तकनीक से तैयार नहीं किया गया हो। उद्योग ने इसी प्रकार के मक्का के आयात पर शुल्क हटाने की मांग रखी है।

4. क्या चिकन की कीमत तुरंत बढ़ जाएगी?

ऐसा जरूरी नहीं है। कीमत पर चारे की लागत के साथ स्थानीय मांग, उपलब्धता, परिवहन और खुदरा खर्च का असर पड़ता है। यदि मांग कमजोर रही, तो उत्पादक बढ़ी हुई लागत पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पाएंगे।

5. क्या 110 रुपये प्रति किलो का भाव खुदरा कीमत है?

नहीं, यह बैठक में जीवित मुर्गे के लिए तय किया गया आधार भाव है। दुकान पर मिलने वाले साफ किए गए चिकन की कीमत में कटाई, सफाई, परिवहन और विक्रेता का खर्च भी जुड़ता है।

निष्कर्ष: पोल्ट्री उद्योग की मांग चारे की लागत से जुड़ी बड़ी चुनौती दिखाती है। अब सरकार के फैसले और घरेलू फसल की उपलब्धता से आगे की दिशा तय होगी।

अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है। पशु आहार या कारोबार संबंधी निर्णय से पहले विशेषज्ञ और आधिकारिक दिशा-निर्देश जांचें।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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