केंद्र सरकार ने देश में नई तकनीक विकसित करने और शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई एक लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना के तहत पहले चरण में 19 फंड प्रबंधकों का चयन किया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, इन संस्थाओं के लिए कुल 7,131 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है। इस योजना का उद्देश्य ऐसी कंपनियों और स्टार्टअप को आर्थिक सहायता देना है, जो नई तकनीक विकसित करने और उसे बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
एक लाख करोड़ रुपये की योजना के तहत 19 फंड प्रबंधक चुने गए

इस योजना के तहत चुने गए फंड प्रबंधकों को सरकारी कोष से पैसा दिया जाएगा। वे इस राशि का इस्तेमाल नई तकनीक पर काम करने वाले स्टार्टअप और कंपनियों को आर्थिक सहायता देने के लिए करेंगे। यह मदद कम ब्याज वाले कर्ज या कंपनी में हिस्सेदारी के रूप में दी जा सकती है। इन फंड प्रबंधकों में वैकल्पिक निवेश कोष और शोध एवं नवाचार से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं। ऐसी संस्थाएं खास तौर पर नई तकनीक के विकास, वैज्ञानिक शोध और नए कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं।
योजना की प्रमुख बातें
- योजना का कुल आकार एक लाख करोड़ रुपये है।
- पहले चरण में 19 फंड प्रबंधकों का चयन किया गया है।
- चयनित संस्थाओं के लिए 7,131 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं।
- इनमें 14 वैकल्पिक निवेश कोष और पांच शोध संस्थाएं शामिल हैं।
- इसका उद्देश्य नई तकनीक, वैज्ञानिक शोध और नवाचार से जुड़े कारोबारों को वित्तीय मदद देना है।
किन निवेश कोषों को मिली मंजूरी?
8 अक्टूबर 2026 को हुई बैठक में अधिकारियों के समूह ने 14 वैकल्पिक निवेश कोष और पांच शोध संस्थाओं के प्रस्तावों को मंजूरी दी। इन सभी के लिए कुल 7,131 करोड़ रुपये की राशि तय की गई है। चुने गए निवेश कोषों में स्पेशल इन्वेस्ट ग्रोथ फंड, योरनेस्ट कैपिटल एडवाइजर्स, चिराटे वेंचर्स, कलारी कैपिटल पार्टनर्स इंडिया, सेलेस्टा इंडिया, एडवांटएज इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स, आइवीकैप वेंचर्स, आइडियास्प्रिंग कैपिटल, ब्लूम वेंचर्स, टीवीएस कैपिटल फंड्स, एएमए कैपिटल एडवाइजर्स, ट्रांसलेशन एंडेवर, कैंपस और सिक्स्थ सेंस वेंचर्स शामिल हैं। ये संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों और नए कारोबारों में निवेश करती हैं।
पांच शोध संस्थाओं का भी हुआ चयन
चयनित पांच शोध संस्थाओं में बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान का एआई एवं रोबोटिक्स टेक्नोलॉजी पार्क, सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर प्लेटफॉर्म्स, चेन्नई स्थित आईआईटी मद्रास रिसर्च पार्क, बिट्स पिलानी की पिलानी इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट सोसाइटी और आईआईटी बॉम्बे की सोसाइटी फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप शामिल हैं। ये संस्थाएं शोधकर्ताओं, उद्यमियों और नई तकनीक पर काम करने वाली कंपनियों को सहयोग देती हैं।
फंड प्रबंधकों के चयन की प्रक्रिया कैसे हुई?
सरकार के मुताबिक, इस योजना के तहत मिले आवेदनों की कई चरणों में जांच की गई। इसमें आवेदनों का विस्तृत मूल्यांकन और विशेषज्ञ सलाहकार समिति के साथ आमने-सामने चर्चा भी शामिल थी। इसके बाद प्रस्तावों को अनुषंगी परिषद और अधिकारियों के समूह के सामने मंजूरी के लिए रखा गया। हालांकि, इस चयन प्रक्रिया को लेकर पहले कुछ सवाल भी उठाए गए थे। खबर प्रकाशित होने तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस मामले पर पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया था।
गहरी तकनीक वाले स्टार्टअप को कैसे मिलेगा फायदा?
उद्योग जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि इस योजना के तहत राशि मंजूर होना भारत में गहरी तकनीक से जुड़े कारोबारों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसी तकनीक विकसित करने में काफी समय, पैसा और शोध की जरूरत होती है। कई बार किसी नए विचार को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने में कई साल लग जाते हैं। इस कारण निवेशक अक्सर ऐसे कारोबारों में पैसा लगाने से बचते हैं, जिनसे तुरंत मुनाफा मिलने की संभावना कम होती है।
गहरी तकनीक से जुड़े कारोबारों के लिए संभावित फायदे
- वित्तीय मदद: लंबे समय तक शोध और उत्पाद विकास के लिए पूंजी जुटाने में सहायता मिल सकती है।
- नवाचार को बढ़ावा: नई तकनीक विकसित करने वाले स्टार्टअप को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।
- निजी निवेश: सरकारी सहायता से निवेशकों का भरोसा बढ़ने की संभावना है।
- बाजार तक पहुंच: प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने में मदद मिल सकती है।
लंबे समय के निवेश की चुनौती हो सकती है कम
स्टार्टअप नीति से जुड़े संगठन की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्वेता राजपाल कोहली के अनुसार, गहरी तकनीक पर काम करने वाले उद्यमियों के सामने लंबे समय तक निवेश जुटाने की चुनौती रहती है। उनकी कंपनियों को शोध से लेकर व्यावसायिक स्तर पर उत्पाद तैयार करने तक लगातार आर्थिक मदद की जरूरत होती है। सरकारी योजना के जरिए निवेश कोषों और शोध संस्थाओं तक पैसा पहुंचने से इस कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है। इससे निजी निवेशकों का भरोसा भी बढ़ सकता है और वे ऐसी कंपनियों में निवेश करने के लिए आगे आ सकते हैं।
योजना के अगले चरण में भी चयन की तैयारी
इससे पहले अगस्त 2026 में अनुसंधान, विकास और नवाचार प्रकोष्ठ की प्रमुख ज्योति शर्मा ने कहा था कि योजना के तहत अगले चरण में फंड प्रबंधकों के चयन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार ने यह योजना नई और उन्नत तकनीक पर काम करने वाली कंपनियों को बड़े स्तर पर निवेश उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की है।
स्टार्टअप चयन में पारदर्शिता पर उठे सवाल
हालांकि, योजना के तहत निवेश के लिए कंपनियों के चयन को लेकर पारदर्शिता पर भी सवाल उठे हैं। अगस्त 2026 में प्रकाशित एक समाचार जांच में दावा किया गया था कि शुरुआती चरण में आर्थिक सहायता पाने वाले 22 स्टार्टअप में से 15 का संबंध चयन समिति के सात सदस्यों से था। इस रिपोर्ट के बाद संभावित हितों के टकराव को लेकर चिंता जताई गई। हितों का टकराव ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जिसमें किसी निर्णय लेने वाले व्यक्ति के निजी या कारोबारी संबंध उसके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। इससे पहले 31 जुलाई को प्रेस सूचना ब्यूरो ने कहा था कि प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड में हितों के टकराव से जुड़े मामलों को रोकने के लिए व्यापक नीति लागू है।
कब शुरू हुई थी अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना?
इस योजना की घोषणा जनवरी 2025 में की गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 नवंबर 2025 को इसे औपचारिक रूप से शुरू किया था। शुरुआती चरण में इस कोष से अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप को बड़ी आर्थिक सहायता मिली थी। 10 जून को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती राशि में से 833.89 करोड़ रुपये अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के लिए दिए गए थे। अब 19 नए फंड प्रबंधकों के चयन से सरकार को उम्मीद है कि देश में नई तकनीक, वैज्ञानिक शोध और नवाचार से जुड़े कारोबारों को आगे बढ़ाने के लिए निवेश की उपलब्धता बढ़ेगी।
निष्कर्ष
एक लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना से भारत में नई तकनीक विकसित करने वाले स्टार्टअप को पूंजी मिलने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, योजना का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सहायता कितनी प्रभावी ढंग से वितरित होती है और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता कैसे बनाए रखी जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना का कुल आकार कितना है?
इस योजना का कुल आकार एक लाख करोड़ रुपये है। इसका उद्देश्य नई तकनीक, वैज्ञानिक शोध और नवाचार को बढ़ावा देना तथा ऐसी कंपनियों और स्टार्टअप को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है, जिन्हें अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने के लिए निवेश की जरूरत होती है।
2. पहले चरण में कितने फंड प्रबंधकों का चयन हुआ?
पहले चरण में कुल 19 फंड प्रबंधकों का चयन किया गया है। इनमें 14 वैकल्पिक निवेश कोष और पांच शोध संस्थाएं शामिल हैं। इनके लिए कुल 7,131 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है।
3. इस योजना से स्टार्टअप को किस तरह की मदद मिल सकती है?
योजना के तहत चयनित फंड प्रबंधक स्टार्टअप और कंपनियों को कम ब्याज वाले कर्ज या कंपनी में हिस्सेदारी के रूप में आर्थिक सहायता दे सकते हैं। इससे शोध, तकनीक विकास और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
4. गहरी तकनीक वाले स्टार्टअप के लिए निवेश जुटाना मुश्किल क्यों होता है?
गहरी तकनीक पर काम करने वाली कंपनियों को शोध, प्रयोग, उत्पाद विकास और व्यावसायिक उत्पादन के लिए लंबे समय तक पूंजी की जरूरत होती है। ऐसे कारोबारों में मुनाफा मिलने में कई साल लग सकते हैं, इसलिए निवेश जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
5. योजना के चयन को लेकर क्या सवाल उठे हैं?
एक समाचार जांच में दावा किया गया था कि शुरुआती चरण में सहायता पाने वाले कुछ स्टार्टअप का संबंध चयन समिति के सदस्यों से था। इससे संभावित हितों के टकराव और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे थे।
अस्वीकरण
यह लेख उपलब्ध जानकारी पर आधारित है और केवल सूचनात्मक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। योजना से जुड़े नवीनतम विवरण के लिए संबंधित सरकारी घोषणाओं की पुष्टि करें।