भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में रूस की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। जुलाई महीने में भी रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता रहा। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।
जुलाई में भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा Russia
भारत की कच्चे तेल की जरूरतों को पूरा करने में जुलाई महीने के दौरान Russia सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना रहा। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश ने इस महीने करीब 27.8 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल रूस से खरीदा, जो कुल आयात का आधे से भी अधिक हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता के कारण भारत ने रूस से लगातार बड़ी मात्रा में तेल खरीदना जारी रखा है।
जुलाई में भारत के तेल आयात की प्रमुख बातें
- सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता: Russia
- रूस से आयात: करीब 27.8 लाख बैरल प्रतिदिन
- कुल आयात: लगभग 49.6 लाख बैरल प्रतिदिन
- अन्य प्रमुख स्रोत: सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात
- रणनीति: कई देशों से तेल खरीदकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना
- फोकस: स्थिर आपूर्ति और आयात जोखिम कम करना
ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाली संस्था Kpler के अनुसार जुलाई में भारत का कुल कच्चा तेल आयात करीब 49.6 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। यह जून की तुलना में थोड़ा कम है, लेकिन रूस से आयात में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब भी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहे। सऊदी अरब से खरीद में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली, जबकि संयुक्त अरब अमीरात से आयात में कुछ कमी दर्ज की गई।
ब्राजील, वेनेजुएला, ओमान, अमेरिका और नाइजीरिया से भी भारत ने तेल खरीदा। इससे साफ है कि देश केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं रहना चाहता और अलग-अलग देशों से आपूर्ति लेकर ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। यही रणनीति भारत को वैश्विक बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव से काफी हद तक बचाने में मदद करती है।
पश्चिम एशिया का तनाव और भारत की रणनीति
इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हालात लगातार बदल रहे हैं। अमेरिका में रूस से जुड़े व्यापार पर सख्ती बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। यदि आगे चलकर ऐसे फैसले लागू होते हैं तो भारत समेत कई देशों पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल भारत की तेल आपूर्ति सामान्य बनी हुई है और रिफाइनरी कंपनियों को किसी बड़ी परेशानी का सामना नहीं पड़ा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि Red Sea और Hormuz के आसपास बढ़ता तनाव भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। यदि इन समुद्री मार्गों पर किसी तरह की रुकावट आती है तो तेल की ढुलाई प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिससे यात्रा का समय बढ़ेगा और परिवहन खर्च भी अधिक होगा।
ऊर्जा बाजार पर संभावित असर
- जोखिम वाले मार्ग: Red Sea और Hormuz
- संभावित असर: लंबा समुद्री मार्ग और अधिक परिवहन खर्च
- अतिरिक्त लागत: बीमा और ईंधन खर्च बढ़ सकता है
- कीमतों पर नजर: Brent कच्चे तेल की चाल महत्वपूर्ण
- भारत पर असर: आयात बिल और रिफाइनरी लागत बढ़ सकती है
- समाधान: कई देशों से आयात जारी रखना
आने वाले समय में किन बातों पर रहेगी नजर
अगर जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से से होकर लंबा मार्ग चुनना पड़ता है तो ईंधन की खपत बढ़ेगी, बीमा महंगा होगा और माल ढुलाई का खर्च भी बढ़ जाएगा। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। साथ ही रिफाइनरी कंपनियों की लागत भी बढ़ने की आशंका रहेगी।
बाजार जानकारों का मानना है कि यदि मौजूदा तनाव जल्द समाप्त हो जाता है तो अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में सीमित बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। लेकिन यदि संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो Brent कच्चे तेल की कीमत काफी ऊपर जा सकती है। इससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल समुद्री मार्गों से तेल की आवाजाही जारी है, लेकिन विशेषज्ञ लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। उनका कहना है कि आने वाले दिनों में जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और वैश्विक हालात यह तय करेंगे कि भारत के लिए तेल आयात कितना आसान या महंगा होगा। ऐसे समय में अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है। ऊर्जा बाजार से जुड़े निर्णय लेने से पहले आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों की जानकारी अवश्य देखें।

