भारत अपने शहरों में टिकाऊ और जलवायु के असर को झेल सकने वाला बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए जर्मनी के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 16 अक्टूबर को बैंकॉक में शहरी बुनियादी ढांचे से जुड़े एक कार्यक्रम में कहा कि शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए सरकारी निवेश के साथ निजी पूंजी को भी जोड़ना होगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि निजी निवेश बुनियादी सेवाओं और सामाजिक समावेशन के लिए सरकारी वित्तपोषण की जगह नहीं ले सकता।
- भारत शहरी बुनियादी ढांचे के लिए जर्मनी के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है।
- 2050 तक शहरी ढांचे और सेवाओं की निवेश जरूरत 2.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।
- सरकारी धन के साथ निजी पूंजी जुटाने पर जोर है, लेकिन नई निवेश डील की घोषणा नहीं हुई।
2050 तक शहरों में निवेश की बड़ी जरूरत
सीतारमण ने विश्व बैंक के 2025 के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि भारत की शहरी आबादी 2050 तक लगभग 95.1 करोड़ पहुंच सकती है। वर्ष 2020 में यह संख्या करीब 48 करोड़ थी। बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए परिवहन, ऊर्जा, पानी, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और बाढ़ से बचाव जैसी सेवाओं के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी।
अनुमान है कि 2050 तक नए, मजबूत और कम कार्बन उत्सर्जन वाले शहरी बुनियादी ढांचे तथा सेवाओं के लिए 2.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक निवेश की आवश्यकता हो सकती है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए शहरों की वित्तीय स्थिति और परियोजनाओं की तैयारी मजबूत करना जरूरी होगा।
जर्मनी के साथ वित्तीय सहयोग बढ़ाने की योजना
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत टिकाऊ शहरी विकास में जर्मनी के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को महत्व देता है। जर्मनी की विकास वित्त संस्था केएफडब्ल्यू के सहयोग से भारत में जलवायु के अनुकूल शहरी ढांचे के लिए लगभग 2 अरब यूरो के पुराने और जारी वित्तपोषण में मदद मिली है। इसमें पानी की आपूर्ति, स्वच्छता, गंदे पानी का उपचार, ठोस कचरा प्रबंधन, नदियों और जल निकायों का पुनर्जीवन तथा वर्षा जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
नहीं। भाषण में करीब 1 अरब यूरो की संभावित परियोजना पाइपलाइन और सहयोग बढ़ाने की गुंजाइश का उल्लेख किया गया। इसे नई वित्तीय डील या जर्मनी की ओर से घोषित ताजा निवेश प्रतिबद्धता नहीं समझना चाहिए।
आगे के सहयोग में परियोजनाओं की तैयारी, छोटे शहरों के लिए ऋण हासिल करने में मदद और नगर निकायों की उपयोगिता सेवाओं के प्रबंधन को मजबूत करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य परियोजनाओं में जर्मन संस्थागत निवेशकों की भागीदारी तलाशने की संभावना भी जताई गई।
निवेश के लिए शहरों को क्या सुधार करना होगा?
सीतारमण के अनुसार, निवेश आकर्षित करने के लिए शहरों के खातों में पारदर्शिता, संपत्ति कर की बेहतर वसूली, अपनी आय के मजबूत स्रोत और तैयार परियोजनाएं जरूरी हैं। परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन, मांग के अनुमान, पूरे जीवनकाल की लागत और खरीद प्रक्रिया की स्पष्ट योजना भी होनी चाहिए।
शहरों को रखरखाव और संचालन के खर्च के लिए भरोसेमंद आय की जरूरत होगी। इसके लिए उचित उपयोगकर्ता शुल्क लिए जा सकते हैं, जबकि जरूरतमंद लोगों की सामर्थ्य बनाए रखने के लिए लक्षित सब्सिडी का सहारा लिया जा सकता है।
शहरी निवेश बढ़ाने वाली प्रमुख योजनाएं
1. अर्बन चैलेंज फंड
अर्बन चैलेंज फंड के तहत 1 लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य चुनौती-आधारित प्रक्रिया के जरिए अतिरिक्त 4 लाख करोड़ रुपये के शहरी निवेश को प्रोत्साहित करना है। शहरों को परियोजनाओं के मूल्यांकन और शासन, नियोजन तथा नगर वित्त से जुड़े सुधारों की प्रतिबद्धता के आधार पर सहायता मिल सकती है।
2. सिटी इकोनॉमिक रीजन
केंद्रीय बजट 2026-27 में सिटी इकोनॉमिक रीजन के लिए पांच वर्षों में प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव रखा गया। इसका उद्देश्य शहरों के आसपास के व्यापक आर्थिक क्षेत्रों में योजना और बुनियादी ढांचे का बेहतर तालमेल बनाना है, ताकि दोहराव वाले खर्च को कम किया जा सके।
3. छोटे शहरों के लिए ऋण गारंटी
5,000 करोड़ रुपये की ऋण चुकौती गारंटी उप-योजना का मकसद पात्र छोटे नगर निकायों को वित्त तक पहुंच बनाने में मदद देना है। इसमें एक लाख से कम आबादी वाले पात्र शहरी निकायों और पूर्वोत्तर तथा पहाड़ी क्षेत्रों के शहरी निकायों पर भी ध्यान दिया गया है।
4. नगर निकायों के साझा बॉन्ड
तमिलनाडु वाटर एंड सैनिटेशन पूल्ड फंड का उदाहरण देते हुए वित्त मंत्री ने बताया कि 13 शहरी निकायों ने पानी और स्वच्छता से जुड़ी परियोजनाओं के लिए साझा बॉन्ड के जरिए धन जुटाया था। कई नगर निकायों की वित्तीय जरूरतों को एक साथ रखने से छोटे शहरों के लिए निवेशकों तक पहुंच आसान हो सकती है।
5. बुनियादी ढांचा निवेश और प्रदर्शन आधारित अनुबंध
राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष जैसे मंच दीर्घकालीन संस्थागत पूंजी जुटाने में भूमिका निभा सकते हैं। नगर बॉन्ड, प्रदर्शन आधारित अनुबंध और हाइब्रिड एन्युटी व्यवस्था के जरिए पानी की नियमित आपूर्ति, रिसाव कम करने और गंदे पानी के उपचार जैसे परिणामों से भुगतान को जोड़ा जा सकता है।
सरकारी और निजी निवेश की साझा भूमिका
वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र, राज्य और शहरों को परियोजनाओं के क्रियान्वयन तथा राजस्व प्रबंधन में अपनी भूमिका निभानी होगी। राष्ट्रीय संस्थान परियोजनाएं तैयार करने और वित्तीय ढांचा बनाने में मदद कर सकते हैं, जबकि विकास साझेदार तकनीकी विशेषज्ञता, वित्त और जोखिम साझा करने का सहयोग दे सकते हैं। निजी निवेशक वहां पूंजी, तकनीक और संचालन का अनुभव ला सकते हैं, जहां अनुबंध और भुगतान व्यवस्था स्पष्ट हो।
इस रणनीति का उद्देश्य सरकारी धन को हटाना नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल उन कमियों को दूर करने में करना है जिनके कारण कुछ परियोजनाएं अपने दम पर निवेश आकर्षित नहीं कर पातीं। साथ ही, सार्वजनिक सेवाओं और कमजोर वर्गों तक सुविधाओं की पहुंच बनाए रखना भी जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. निर्मला सीतारमण ने शहरी विकास पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि भारत को शहरों के बुनियादी ढांचे के लिए सरकारी निवेश के साथ निजी पूंजी भी जुटानी होगी, लेकिन निजी निवेश सरकारी वित्तपोषण का विकल्प नहीं है।
2. भारत को 2050 तक शहरी ढांचे के लिए कितने निवेश की जरूरत हो सकती है?
अनुमान के अनुसार, नए, मजबूत और कम कार्बन उत्सर्जन वाले शहरी बुनियादी ढांचे तथा सेवाओं के लिए 2.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक निवेश की जरूरत हो सकती है।
3. भारत-जर्मनी शहरी सहयोग में किन क्षेत्रों को शामिल किया गया है?
पानी, स्वच्छता, गंदे पानी का उपचार, कचरा प्रबंधन, जल निकायों का पुनर्जीवन और बाढ़ नियंत्रण जैसे क्षेत्र इसमें शामिल हैं।
4. क्या भारत और जर्मनी के बीच नई डील की घोषणा हुई?
उपलब्ध भाषण के अनुसार, किसी नई वित्तीय डील या ताजा निवेश प्रतिबद्धता की घोषणा नहीं की गई। सहयोग की संभावनाओं और परियोजना पाइपलाइन का उल्लेख किया गया।
5. अर्बन चैलेंज फंड का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य चुनौती-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से केंद्रीय सहायता देना और अतिरिक्त शहरी निवेश को प्रोत्साहित करना है।
निष्कर्ष
भारत के शहरों में बढ़ती आबादी और जलवायु संबंधी चुनौतियां बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की मांग करती हैं। निर्मला सीतारमण ने जर्मनी के साथ सहयोग बढ़ाने, नगर निकायों की वित्तीय स्थिति सुधारने और निजी पूंजी जुटाने पर जोर दिया है। हालांकि, उनका संदेश साफ है कि निजी निवेश सरकारी सहायता की जगह नहीं लेगा; दोनों का संतुलित उपयोग करके ही टिकाऊ और समावेशी शहरी विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख समाचार रिपोर्ट और भाषण में दिए गए विवरण पर आधारित है। इसमें उल्लिखित राशि, योजनाओं और प्रस्तावों की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।
स्रोत: Moneycontrol की मूल रिपोर्ट