ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत के अलग-अलग राज्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का असर रोजगार पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में ऐसे काम करने वाले लोगों की हिस्सेदारी अधिक है, जिनमें नई तकनीक इंसानों की जगह लेने के बजाय उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद कर सकती है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में ऐसे रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत कम हैं। इन राज्यों के सामने चुनौती यह है कि यहां नई तकनीक का लाभ उठाने के लिए जरूरी काम और कौशल दोनों का विस्तार करना होगा।
अध्ययन में रोजगार पर तकनीक के प्रभाव का विश्लेषण
अक्टूबर 2026 में जारी अध्ययन में वर्ष 2012 और 2025 के रोजगार संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इसमें ऐसे कामों के बीच अंतर किया गया है, जिनमें नई तकनीक इंसानों की मदद करती है, जिनमें कर्मचारियों की जगह मशीनें ले सकती हैं और जिनमें सामान्य स्वचालन का खतरा अधिक है। अध्ययन के मुताबिक, रोजगार पर तकनीक का प्रभाव केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कितने काम इससे प्रभावित हैं। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उन कामों की प्रकृति कैसी है और कर्मचारियों के पास किस तरह का ज्ञान तथा कौशल है।
मुख्य आंकड़े एक नजर में
- केरल में तकनीक से प्रभावित हो सकने वाले रोजगार की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत है।
- हरियाणा में यह आंकड़ा 37.3 प्रतिशत है।
- मध्य प्रदेश में ऐसी नौकरियों की हिस्सेदारी 16.8 प्रतिशत दर्ज की गई।
- देश में सामान्य स्वचालन से जुड़े रोजगार की हिस्सेदारी 2012 के 27.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 32.4 प्रतिशत हो गई।
राज्यों में केरल सबसे आगे है, जहां लगभग 42 प्रतिशत रोजगार ऐसे कामों से जुड़े हैं जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो सकते हैं। हरियाणा में यह आंकड़ा 37.3 प्रतिशत है। वहीं मध्य प्रदेश में ऐसी नौकरियों की हिस्सेदारी सबसे कम 16.8 प्रतिशत दर्ज की गई। हालांकि, तकनीक से प्रभावित होने का मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी की नौकरी पर खतरा है। कई कामों में नई तकनीक लोगों को बेहतर और तेजी से काम करने में सहायता दे सकती है।
केरल, हरियाणा और दक्षिण भारतीय राज्यों में अवसर
केरल में लगभग 14.4 प्रतिशत रोजगार ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां नई तकनीक इंसानों की क्षमता को बढ़ा सकती है। इस मामले में हरियाणा 11.5 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। महाराष्ट्र में यह हिस्सेदारी 11.1 प्रतिशत और तमिलनाडु में 10.7 प्रतिशत है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनुभव, निर्णय लेने की क्षमता और जिम्मेदारी की अहम भूमिका होती है। इसलिए इन क्षेत्रों में तकनीक कर्मचारियों के काम को आसान बना सकती है, लेकिन उनकी पूरी जगह लेना हमेशा संभव नहीं होता।
कर्नाटक और तेलंगाना में स्थिति कुछ अलग है। यहां तकनीक से प्रभावित होने वाली नौकरियों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन ऐसे कामों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम है, जिनमें तकनीक कर्मचारियों की मदद करती है। इसकी एक वजह सूचना प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में रोजगार का अधिक होना है। इन क्षेत्रों में कुछ काम तकनीक की मदद से बेहतर हो सकते हैं, जबकि कुछ कार्यों को मशीनों से कराया जा सकता है। इसलिए कर्मचारियों को नई तकनीक का ज्ञान देना और काम करने के तरीकों में सुधार करना महत्वपूर्ण होगा।
तकनीक से कर्मचारियों को कैसे फायदा हो सकता है?
- स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा में काम की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
- विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन में विश्लेषण तथा निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।
- नई तकनीक का ज्ञान रखने वाले कर्मचारियों की उत्पादकता और कमाई की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
- प्रशिक्षण के माध्यम से कर्मचारी बदलते कार्यस्थल के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के सामने चुनौती
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश की स्थिति कुछ अलग है। इन राज्यों में कुल रोजगार का औसतन 19 प्रतिशत हिस्सा ऐसी नौकरियों में है, जो नई तकनीक से प्रभावित हो सकती हैं। इसके मुकाबले राष्ट्रीय औसत 24.6 प्रतिशत है। इन राज्यों में तकनीक से प्रभावित रोजगार में केवल 26.6 प्रतिशत काम ऐसे हैं, जिनमें तकनीक इंसानों की सहायता कर सकती है। देश के स्तर पर यह आंकड़ा 30.9 प्रतिशत है। बिहार में तकनीक से प्रभावित रोजगार का 61.5 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कामों में आता है, जहां कर्मचारियों की जगह तकनीक लेने का दबाव अधिक हो सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि इन राज्यों को ऐसे रोजगार बढ़ाने की जरूरत है, जिनमें नई तकनीक कर्मचारियों की कार्यक्षमता और कमाई की संभावनाओं को बेहतर बना सके।
सामान्य स्वचालन से किन राज्यों में अधिक जोखिम?
अध्ययन में सामान्य स्वचालन से जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान दिया गया है। पंजाब में ऐसे कामों की हिस्सेदारी सबसे अधिक 44.6 प्रतिशत है, जिनमें बार-बार एक जैसे कार्य किए जाते हैं और जिन्हें मशीनों से कराना आसान हो सकता है। हरियाणा में यह आंकड़ा 39.6 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 39.2 प्रतिशत और तमिलनाडु में 38.3 प्रतिशत है। निर्माण, विनिर्माण, बिक्री, खाद्य प्रसंस्करण और कपड़ा उद्योग से जुड़े कुछ काम इस श्रेणी में आते हैं। हालांकि, इन कामों में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि सभी कर्मचारियों की नौकरियां समाप्त हो जाएंगी। इसका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करेगा कि मशीनों का उपयोग कितना किफायती है और कंपनियां उन्हें कितनी तेजी से अपनाती हैं। देश में ऐसे रोजगार की हिस्सेदारी वर्ष 2012 में 27.6 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 32.4 प्रतिशत हो गई।
नए कौशल और प्रशिक्षण पर देना होगा ध्यान
अध्ययन में कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने, तकनीक की समझ बढ़ाने और प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। तकनीकी ज्ञान के साथ संवाद करने, समस्याओं का समाधान खोजने और सही निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और कुशल कारीगरी जैसे क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने की संभावनाएं हैं, क्योंकि यहां मानवीय संपर्क और व्यक्तिगत अनुभव की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहती है।
कम तकनीकी अवसर वाले राज्यों के लिए जरूरी है कि वे लोगों को बेहतर आय और अधिक उत्पादकता वाले रोजगार तक पहुंचने में मदद करें। इसके लिए प्रशिक्षण, शिक्षा और रोजगार से जुड़े कार्यक्रमों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार करना होगा। अध्ययन का मुख्य संदेश है कि नई तकनीक से होने वाले बदलावों की तैयारी पहले से शुरू करनी चाहिए। यदि सरकारें, शिक्षण संस्थान और कंपनियां समय रहते कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने पर ध्यान दें, तो तकनीक से मिलने वाले अवसरों का लाभ अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. भारत में किन राज्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रभावित रोजगार की हिस्सेदारी अधिक है?
अध्ययन के अनुसार, केरल में ऐसी नौकरियों की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत है। हरियाणा में यह 37.3 प्रतिशत है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी ऐसे रोजगार की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक है, जहां नई तकनीक काम करने के तरीकों को प्रभावित कर सकती है।
2. क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण सभी कर्मचारियों की नौकरियां खत्म हो जाएंगी?
नहीं। तकनीक से प्रभावित होने का अर्थ नौकरी खत्म होना नहीं है। कई क्षेत्रों में नई तकनीक कर्मचारियों को तेजी से और बेहतर तरीके से काम करने में सहायता दे सकती है। वास्तविक प्रभाव काम की प्रकृति, तकनीक के उपयोग और कर्मचारियों के कौशल पर निर्भर करेगा।
3. बिहार और अन्य राज्यों के सामने मुख्य चुनौती क्या है?
बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश में तकनीक से प्रभावित रोजगार का हिस्सा राष्ट्रीय औसत से कम है। इन राज्यों को ऐसे रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने होंगे, जिनसे लोगों की उत्पादकता, कौशल और बेहतर आय तक पहुंचने की संभावनाएं मजबूत हो सकें।
4. सामान्य स्वचालन से किन क्षेत्रों के काम प्रभावित हो सकते हैं?
निर्माण, विनिर्माण, बिक्री, खाद्य प्रसंस्करण और कपड़ा उद्योग के कुछ दोहराव वाले काम मशीनों से कराए जा सकते हैं। हालांकि, स्वचालन का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तकनीक अपनाना कितना किफायती है और कंपनियां उसे कितनी तेजी से अपने कामकाज में शामिल करती हैं।
5. भविष्य में रोजगार के लिए कौन से कौशल जरूरी होंगे?
तकनीकी ज्ञान के साथ संवाद, समस्या समाधान और निर्णय लेने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और कुशल कारीगरी जैसे क्षेत्रों में भी अवसर हो सकते हैं, जहां मानवीय संपर्क, अनुभव और व्यक्तिगत जरूरतों को समझना आवश्यक है।
निष्कर्ष
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन भारतीय रोजगार बाजार को अलग-अलग राज्यों में अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए कौशल विकास, व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्थानीय जरूरतों के अनुसार रोजगार के अवसर बढ़ाना जरूरी है। समय रहते तैयारी करने से कर्मचारी तकनीकी बदलावों के बीच नए अवसरों का लाभ उठा सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध अध्ययन में बताए गए आंकड़ों पर आधारित है। रोजगार और तकनीक से जुड़े वास्तविक परिणाम समय, क्षेत्र और नीतियों के अनुसार बदल सकते हैं।
