दिल्ली हाईकोर्ट ने 2012 में ट्रेन के अंदर हुई गैंगरेप घटना की पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने रेलवे की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मुआवजे के फैसले को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस अमित बंसल ने कहा कि रेलवे की जिम्मेदारी यात्रियों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना है। अदालत ने माना कि ट्रेन के अंदर हुई गैंगरेप जैसी हिंसक घटना रेलवे कानून के तहत “अनहोनी घटना” (Untoward Incident) की श्रेणी में आती है, जिसके लिए रेलवे मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार है।
अदालत ने कहा कि पीड़िता एक वैध यात्री थी और उसके पास यात्रा का टिकट था। घटना ट्रेन के डिब्बे के अंदर हुई, इसलिए रेलवे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में रेलवे अधिनियम की धारा 123(c) और 124A के तहत मुआवजे का प्रावधान लागू होता है।
मामले के अनुसार, अगस्त 2012 में बिहार के लखीसराय रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 5 पर खड़ी एक यात्री ट्रेन की बोगी में महिला के साथ गैंगरेप हुआ था। पीड़िता के पिता की शिकायत के बाद NHRC ने अप्रैल 2014 में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।
रेलवे ने इस आदेश का विरोध करते हुए कहा था कि मुआवजे का फैसला रेलवे दावा न्यायाधिकरण (Railway Claims Tribunal) के जरिए होना चाहिए। हालांकि, NHRC ने रेलवे की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया और मुआवजा देने का निर्देश जारी रखा।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे को मुआवजा देना होगा, भले ही घटना को अंजाम देने वाले लोग रेलवे कर्मचारी न हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे की जिम्मेदारी केवल अपने कर्मचारियों की गलती तक सीमित नहीं है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि NHRC की सिफारिशें केवल सामान्य राय नहीं होतीं, बल्कि मानवाधिकार संरक्षण के लिए बनाए गए वैधानिक संस्थान की जांच के बाद दिए गए महत्वपूर्ण निर्देश होते हैं। इसलिए इनका विशेष महत्व होता है।
अदालत ने रेलवे द्वारा जमा की गई 3 लाख रुपये की राशि को पीड़िता को जारी करने का आदेश दिया। इसके साथ ही जमा राशि पर मिलने वाला ब्याज भी पीड़िता को देने के निर्देश दिए गए।
