दुर्गा पूजा बंगाली समुदाय के लिए केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि घर, परिवार और पसंदीदा पकवानों से जुड़ी यादों का भी समय है। पूजा पंडालों में फुचका खाने से लेकर घर पर लुची-मांस और अष्टमी के खिचुड़ी भोग तक, भोजन इस त्योहार की खास पहचान बना रहता है। अब कई शेफ इन पारंपरिक स्वादों को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं।
दुर्गा पूजा के पुराने स्वाद को नया रूप
कोलकाता से लेकर बेंगलुरु, गुरुग्राम, सैन फ्रांसिस्को और हांगकांग तक काम कर रहे बंगाली शेफ अपने बचपन और परिवार की यादों से प्रेरित व्यंजन तैयार कर रहे हैं। इन पकवानों में पारंपरिक सामग्री और आधुनिक पकाने की तकनीक का मेल दिखाई देता है। मकसद पुरानी यादों को बनाए रखते हुए खाने का नया अनुभव देना है।
इन नए प्रयोगों में कहीं आलू की साधारण सब्जी टैको के रूप में परोसी जा रही है, तो कहीं कोषा मांस को हुमस और चीनी शैली के बन के साथ जोड़ा गया है। ये व्यंजन दिखाते हैं कि पारंपरिक भोजन का स्वाद बदलती दुनिया में भी नए रूप में आगे बढ़ सकता है।
बंगाली शेफ दुर्गा पूजा की पारिवारिक यादों, स्थानीय सामग्री और आधुनिक पकाने के तरीकों को मिलाकर ऐसे व्यंजन बना रहे हैं जो परंपरा और नए स्वाद के बीच पुल बनाते हैं।
रितुपर्णा बनर्जी: कोषा मांस और पीली मटर का नया मेल
कोलकाता की शेफ रितुपर्णा बनर्जी के परिवार में दुर्गा पूजा के दिनों में मांस नहीं पकाया जाता था, हालांकि मछली भोजन का हिस्सा रहती थी। दशमी पर शांति जल की रस्म के बाद परिवार कोषा मांस, कीमा घुगनी और लुची के साथ बैठता था। यही याद उनके नए व्यंजन की प्रेरणा बनी।
उन्होंने पीली मटर से तैयार हुमस को मटन के शोरबे के साथ गाढ़ा और स्वादिष्ट बनाया है। इसके ऊपर मसालों और सुनहरे भुने प्याज के साथ पकाया गया कोषा मांस रखा जाता है। पारंपरिक लुची की जगह बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम मंटौ बन परोसे जाते हैं।
अनिरबान दासगुप्ता: सब्जियों के छिलकों से रचनात्मक पकवान
बेंगलुरु में काम करने वाले शेफ अनिरबान दासगुप्ता ने बंगाल की मूर्ति-निर्माण परंपरा और आभूषणों से प्रेरणा ली। उनका व्यंजन सब्जियों के छिलकों को मसालों के साथ पीसकर बनाए गए मिश्रण पर आधारित है। इसके साथ लाल मिर्च से तैयार मिट्टी जैसा चूरा और दाल के घोल से बने सजावटी गोयना बोरी परोसे जाते हैं।
इस व्यंजन में स्वाद के साथ कम बर्बादी की सोच भी शामिल है। सब्जियों के छिलकों का इस्तेमाल बताता है कि आमतौर पर फेंक दी जाने वाली सामग्री से भी स्वादिष्ट और आकर्षक भोजन बनाया जा सकता है। गोयना बोरी बंगाल की पारंपरिक खाद्य कला का उदाहरण है, जिसमें दाल के घोल को आभूषण जैसी आकृतियों में सुखाया जाता है।
तूनिका गुहा: आलू की सब्जी से बने टैको
गुरुग्राम की शेफ तूनिका गुहा के लिए पूजा की खास याद परिवार के साथ आराम से किया जाने वाला नाश्ता है। उनके घर में पंचफोरन की खुशबू वाली सफेद आलू की सब्जी पराठों के साथ खाई जाती थी। उन्होंने इसी घरेलू भोजन को आधुनिक रूप देने का प्रयोग किया।
इस नए रूप में पराठे को टैको के खोल की तरह इस्तेमाल किया जाता है और उसके अंदर पंचफोरन वाले आलू रखे जाते हैं। ऊपर से आम के अचार का तेल, हरे प्याज का तेल और सिरके में रखे प्याज के पतले टुकड़े डाले जाते हैं। इस तरह परिचित घरेलू स्वाद को अलग अंदाज में पेश किया गया है।
इन व्यंजनों की खासियत यह है कि नई प्रस्तुति के बावजूद उनकी जड़ें घर के भोजन, पारिवारिक रस्मों और बंगाल की पारंपरिक सामग्री में बनी रहती हैं।
पुजन सरकार: सरसों वाली भेटकी मछली
सैन फ्रांसिस्को में शेफ पुजन सरकार को सप्तमी के दिन मां के हाथ की सरसों वाली भेटकी मछली याद आती है। उनके नए व्यंजन में कोयले पर भुनी मछली को गोबिंदभोग चावल से बने केक और बंगाली अंदाज के आलू चोखा के साथ रखा जाता है।
इसके ऊपर नारियल पानी से बनी पतली परत सजाई जाती है। सरसों के अचार में रखे दाने और लहसुन के फूल इसकी सजावट का हिस्सा हैं। यह व्यंजन उनके बचपन के त्योहार वाले भोजन को आधुनिक प्रस्तुति और अलग बनावट के साथ सामने लाता है।
पलाश मित्रा: कोषा मांस से प्रेरित चिली चिकन
हांगकांग के शेफ पलाश मित्रा की दुर्गा पूजा की यादें कोलकाता के टांगरा इलाके के भोजन और परिवार में बनने वाले कोषा मांस से जुड़ी हैं। उन्होंने इन्हीं स्वादों को मिलाकर कोषा मांस से प्रेरित चिली चिकन बनाया है। इसमें धीमी आंच पर मसालों के साथ पकाए गए मांस के स्वाद को तेज आंच पर कड़ाही में पकाने की तकनीक से नया रूप दिया जाता है।
इस व्यंजन में सूखी लाल मिर्च, लहसुन, सोया सॉस और थोड़ा काला सिरका डाला जाता है। अंत में कच्चे सरसों के तेल और हरी मिर्च से स्वाद को उभारा जाता है। इसे नरम चावल और आग पर भुने टमाटर के साथ परोसा जाता है। शेफ के लिए धुएं की महक पूजा के दौरान जलने वाली धुनुची की याद भी जगाती है।
पारंपरिक बंगाली भोजन में आधुनिकता का महत्व
इन शेफ के प्रयोग बताते हैं कि भोजन केवल रेसिपी का नाम नहीं, बल्कि संस्कृति, परिवार और जगह की यादों को सहेजने का तरीका भी है। नई सामग्री या प्रस्तुति जोड़ने के बावजूद व्यंजनों की प्रेरणा पुराने घरेलू स्वाद और त्योहार की रस्मों से आती है। इस तरह बंगाली भोजन नई पीढ़ी और अलग-अलग देशों के खाने के शौकीनों तक पहुंच सकता है।
इस विषय पर मूल फीचर मिंट लाउंज की इस रिपोर्ट में भी इन शेफ के व्यंजनों और उनकी पूजा से जुड़ी यादों का विवरण दिया गया है।
निष्कर्ष
दुर्गा पूजा के ये आधुनिक व्यंजन दिखाते हैं कि पारिवारिक यादें और पारंपरिक बंगाली स्वाद समय के साथ नए रूप ले सकते हैं। पांचों शेफ ने अपने अनुभवों को रचनात्मक भोजन में बदला है। इससे त्योहार की संस्कृति और बंगाली पाक-कला को नई पहचान मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. बंगाली दुर्गा पूजा में भोजन का क्या महत्व है?
दुर्गा पूजा में भोजन परिवार, समुदाय और त्योहार की यादों से जुड़ा रहता है। पंडालों में मिलने वाले नाश्ते, अष्टमी का भोग और दशमी के पारिवारिक भोजन अलग-अलग रस्मों का हिस्सा हैं। इसलिए कई लोगों के लिए खाने का अनुभव पूजा की यादों को खास बनाता है।
2. पंचफोरन क्या होता है और इसका उपयोग कैसे किया जाता है?
पंचफोरन बंगाली भोजन में इस्तेमाल होने वाला पांच मसालों का मिश्रण है। इसे अक्सर तेल में हल्का भूनकर सब्जियों और दालों में खुशबू लाने के लिए डाला जाता है। आलू की सब्जी जैसे साधारण पकवान में भी यह मिश्रण खास सुगंध और पारंपरिक स्वाद जोड़ता है।
3. गोयना बोरी किस चीज से बनाई जाती है?
गोयना बोरी आम तौर पर दाल के घोल से बनाई जाती है। घोल को सजावटी आकृतियों, जैसे आभूषणों, के रूप में डालकर सुखाया जाता है। बंगाल में यह भोजन की पारंपरिक कला का हिस्सा है और इसे पकवानों की सजावट या खाने के साथ परोसने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
4. भेटकी मछली को सरसों के साथ क्यों पकाया जाता है?
बंगाली रसोई में सरसों का पेस्ट मछली को तीखा, सुगंधित और विशिष्ट स्वाद देता है। भेटकी जैसी मछली के साथ इसका मेल कई पारंपरिक व्यंजनों में मिलता है। अलग-अलग रसोइये सरसों की मात्रा, पकाने की विधि और साथ परोसे जाने वाले चावल या सब्जियों से स्वाद में बदलाव लाते हैं।
5. पारंपरिक व्यंजनों को आधुनिक रूप देने से क्या फायदा होता है?
नई प्रस्तुति पारंपरिक स्वादों को उन लोगों तक पहुंचा सकती है जो अलग तरह के भोजन अनुभव पसंद करते हैं। इससे शेफ अपनी सांस्कृतिक विरासत को रचनात्मक ढंग से पेश कर सकते हैं। हालांकि, किसी व्यंजन का नया रूप बनाते समय उसकी मूल सामग्री, स्वाद और उससे जुड़ी सांस्कृतिक कहानी को समझना भी जरूरी है।
अस्वीकरण: यह लेख भोजन और संस्कृति से जुड़ी जानकारी के लिए है। व्यंजनों की सामग्री और प्रस्तुति शेफ तथा रेस्तरां के अनुसार बदल सकती है।