भारत में दही, इडली, डोसा, अचार और कांजी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ लंबे समय से रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा रहे हैं। लेकिन आज जब आंतों के स्वास्थ्य और प्रोबायोटिक उत्पादों की चर्चा बढ़ी है, तो इन्हीं चीजों को कई बार नए नाम और ऊंची कीमत के साथ पेश किया जा रहा है। लेखक और भोजन-विषयक किताब ‘मसाला बॉडी’ के लेखक कृष्ण अशोक इस चलन पर सवाल उठाते हैं। उनके अनुसार, हर बार महंगे पूरक या खास पेय खरीदना जरूरी नहीं; दाल, चना, राजमा और रेशे से भरपूर सामान्य भोजन भी आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए उपयोगी हो सकता है।
प्रोबायोटिक उत्पाद लोगों को किसी खास समस्या का सीधा समाधान लग सकते हैं, जबकि दाल या राजमा जैसी चीजें साधारण भोजन महसूस होती हैं। लेकिन दोनों की भूमिका एक जैसी नहीं होती। रेशे से भरपूर भोजन आंतों में पहले से मौजूद सूक्ष्मजीवों को पोषण देने में मदद कर सकता है। इसलिए भोजन की विविधता और नियमितता पर ध्यान देना, केवल किसी महंगे उत्पाद को स्वास्थ्य का आसान रास्ता मान लेने से अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
पारंपरिक भोजन की खासियत
दाल, चना, राजमा, दही और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ अलग-अलग तरह से भोजन में रेशा, पोषक तत्व और किण्वन से बने स्वाद जोड़ते हैं। इन्हें केवल पुराने जमाने का खाना समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
घर में जमाया गया दही और बाजार में मिलने वाला दही स्वाद और बनावट में एक जैसे नहीं होते। व्यावसायिक दही आम तौर पर चुने हुए शुरुआती जीवाणु-संवर्धन से बनाया जाता है, ताकि हर बार लगभग एक जैसा स्वाद और गाढ़ापन मिले। घर में पिछली जमावट से थोड़ा दही लेकर नया दही जमाने पर उसमें मौजूद लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया आगे बढ़ते हैं। दूध, तापमान, बर्तन और घर की परिस्थितियों के कारण इसका स्वाद और सूक्ष्मजीव समुदाय बदल सकता है। यही वजह है कि घरेलू दही में अलग-अलग घरों की अपनी पहचान होती है।
कृष्ण अशोक ने अपने परिवार की एक याद भी साझा की है। जब उनका परिवार 1992 में चेन्नई से दिल्ली आया, तो उनकी मां पुराने दही का जामन साथ लेकर चली थीं। लंबी रेल यात्रा के दौरान भोपाल में ताजा दूध खरीदकर उसमें जामन मिलाया गया, ताकि जीवाणुओं को नया दूध मिलता रहे। यह उदाहरण दिखाता है कि कई परिवारों के लिए दही का जामन केवल रसोई की चीज नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आदत और घरेलू विरासत का हिस्सा भी है।
इडली और डोसे के घोल में सामग्री और रसोई के बर्तनों पर मौजूद लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया तथा प्राकृतिक यीस्ट किण्वन में भूमिका निभाते हैं। इस प्रक्रिया से खट्टापन, गैस और बनावट में बदलाव आता है। नमक में रखकर किण्वित किए जाने वाले अचार भी इसी तरह के सूक्ष्मजीवी बदलावों से गुजर सकते हैं। काली गाजर से बनने वाली कांजी और रागी से तैयार होने वाला अंबली भी अलग-अलग क्षेत्रों की पारंपरिक मिसालें हैं।
इन खाद्य पदार्थों का महत्व केवल उनके किण्वित होने में नहीं, बल्कि स्थानीय मौसम, उपलब्ध सामग्री, कीमत और भोजन को सुरक्षित रखने की जरूरत से भी जुड़ा रहा है। गर्म मौसम में दूध जल्दी खराब हो सकता है, इसलिए उसे दही में बदला जाता है। सब्जियों को लंबे समय तक रखने के लिए अचार बनाया जाता है। आज कुछ शहरी कैफे इन्हीं पुराने खाद्य पदार्थों को आधुनिक रूप देकर काफी ऊंची कीमत पर बेचते हैं, जबकि कई समुदायों में वे लंबे समय से सस्ता और आसानी से उपलब्ध भोजन रहे हैं।
किण्वित भोजन और प्रोबायोटिक भोजन में अंतर
किण्वन से भोजन का स्वाद, बनावट या टिकाऊपन बदल सकता है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि खाते समय उसमें जीवित सूक्ष्मजीव मौजूद होंगे। पकाने, गर्म करने या पाश्चुरीकरण जैसी प्रक्रियाओं से उनमें से कई सूक्ष्मजीव नष्ट हो सकते हैं।
इसीलिए किण्वित भोजन और प्रोबायोटिक भोजन को एक ही अर्थ में इस्तेमाल करना सही नहीं है। इडली और डोसा पकाए जाते हैं, जबकि कुछ बाजारू अचार और पेय पदार्थों को पाश्चुरीकृत किया जाता है। ब्रेड और शराब बनाने की प्रक्रिया में भी सूक्ष्मजीवों की भूमिका हो सकती है, लेकिन बाद की प्रक्रिया में उनमें से कई जीवित नहीं बचते। यानी किण्वन भोजन को बदल सकता है, भले ही वही सूक्ष्मजीव खाने के समय उसमें मौजूद न हों।
दक्षिण भारत में दही-चावल एक जाना-पहचाना भोजन है। इसे कभी-कभी जल्दी में खाया जाने वाला साधारण खाना माना जाता है, लेकिन इसमें दही और चावल का मेल होता है। दही में जीवित संस्कृतियां हो सकती हैं, जबकि ठंडे किए गए चावल में प्रतिरोधी स्टार्च की मात्रा बन सकती है। इसका असर पकाने और रखने के तरीके पर निर्भर करता है। इस भोजन को किसी नए नाम की जरूरत नहीं है; कई परिवारों के लिए यह सहज, सस्ता और आराम देने वाला भोजन है।
इस चर्चा का व्यावहारिक संदेश यह है कि आंतों के स्वास्थ्य के लिए किसी एक खास उत्पाद को चमत्कारी समाधान मानने के बजाय विविध और संतुलित भोजन पर ध्यान देना बेहतर है। दही, दालें, फलियां, सब्जियां और अन्य रेशे वाले खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा हो सकते हैं। हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है, इसलिए किसी बीमारी या लगातार बनी पाचन समस्या के लिए भोजन को इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
इस विषय पर मूल लेख लाइवमिंट में प्रकाशित कृष्ण अशोक के लेख में पढ़ा जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. किण्वित भोजन क्या होता है?
किण्वित भोजन वह है जिसमें बैक्टीरिया या यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीवों की मदद से स्वाद, बनावट या अन्य गुण बदलते हैं। दही, इडली-डोसे का घोल और कुछ अचार इसके आम उदाहरण हैं।
2. क्या हर किण्वित भोजन में जीवित प्रोबायोटिक होते हैं?
नहीं। पकाने, गर्म करने या पाश्चुरीकरण के दौरान जीवित सूक्ष्मजीव नष्ट हो सकते हैं। इसलिए किण्वित होने का मतलब यह नहीं कि भोजन खाते समय उसमें उपयोगी जीवित सूक्ष्मजीव भी मौजूद होंगे।
3. घर का दही और बाजार का दही कैसे अलग हैं?
बाजार का दही अक्सर चुने हुए स्टार्टर से बनाया जाता है, जिससे स्वाद और बनावट में एकरूपता रहती है। घर के दही में दूध, तापमान और पुराने जामन के कारण स्वाद तथा बनावट बदल सकती है।
4. क्या दाल, चना और राजमा आंतों के स्वास्थ्य में मदद कर सकते हैं?
इनमें आहार रेशा और अन्य पोषक तत्व होते हैं, जो संतुलित भोजन का उपयोगी हिस्सा हैं। अलग-अलग तरह के पौधों से मिलने वाला रेशा आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीवों को पोषण देने में मदद कर सकता है।
5. क्या प्रोबायोटिक उत्पाद खरीदना जरूरी है?
हर व्यक्ति के लिए महंगे प्रोबायोटिक उत्पाद जरूरी नहीं होते। जरूरत उम्र, स्वास्थ्य और भोजन पर निर्भर करती है। किसी बीमारी या लगातार पाचन समस्या में डॉक्टर या योग्य आहार विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
निष्कर्ष
भारतीय पारंपरिक भोजन में दही, दालें, फलियां और किण्वित व्यंजन पहले से मौजूद हैं। इन्हें समझदारी से संतुलित आहार में शामिल करना उपयोगी हो सकता है। केवल नए नाम या ऊंची कीमत को बेहतर स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, चिकित्सा सलाह नहीं। किसी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
