केंद्र सरकार देश में गैस पहुंचाने वाली पाइपलाइनों की क्षमता और मजबूती बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए स्टील की गैस पाइपलाइनों के अंदर इस्तेमाल होने वाली घर्षण कम करने वाली परतों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के नियम को अपनाने पर काम किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य गैस की आवाजाही को अधिक प्रभावी बनाना, ऊर्जा की खपत कम करना और पाइपलाइनों की उम्र बढ़ाना है।
गैस पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत करने की तैयारी
भारत में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक देश की कुल ऊर्जा जरूरत में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत तक पहुंचाने का है। अभी यह हिस्सेदारी लगभग 6.5 प्रतिशत है। इसके लिए पाइप से मिलने वाली गैस और लंबी दूरी के परिवहन में गैस के इस्तेमाल को बढ़ाने की योजना है।
देश में गैस को ऊंचे दबाव वाली स्टील पाइपलाइनों के जरिए एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जाता है। ये पाइपलाइन गैस क्षेत्रों, आयात टर्मिनल और दूसरे स्रोतों को शहरों में गैस वितरण व्यवस्था, उर्वरक कारखानों, तेल शोधन संयंत्रों, बिजलीघरों और उद्योगों से जोड़ती हैं।
⛽ भारत का गैस पाइपलाइन नेटवर्क
- चालू नेटवर्क: करीब 25,923 किलोमीटर
- निर्माणाधीन नेटवर्क: करीब 9,954 किलोमीटर
- कुल अधिकृत नेटवर्क: करीब 34,238 किलोमीटर
- मुख्य उपयोग: शहरों, उद्योगों, उर्वरक कारखानों और बिजलीघरों तक गैस पहुंचाना
- सरकारी लक्ष्य: 2030 तक ऊर्जा में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत करना
पाइपलाइन में घर्षण कम करने से क्या फायदा होगा
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड के अनुसार, देश में करीब 25,923 किलोमीटर लंबी गैस ट्रांसमिशन Pipeline अभी काम कर रही है। इसके अलावा करीब 9,954 किलोमीटर नेटवर्क का निर्माण चल रहा है। इससे देश का कुल अधिकृत गैस पाइपलाइन नेटवर्क करीब 34,238 किलोमीटर हो जाता है।
गैस को लंबी दूरी तक पहुंचाने के दौरान पाइपलाइन में दबाव बनाए रखने के लिए कंप्रेसर स्टेशन लगाए जाते हैं। पाइप के अंदर की सतह जितनी चिकनी होगी, गैस के बहने में उतना ही कम घर्षण होगा। इससे दबाव का नुकसान घटता है और गैस को पहुंचाने में कम ऊर्जा खर्च होती है।
पाइप के अंदर लगाई जाने वाली विशेष परत का काम घर्षण कम करना और गैस के प्रवाह को बेहतर बनाना है। इससे परिवहन के दौरान ऊर्जा की बचत हो सकती है। इसके अलावा यह परत पाइप की अंदरूनी सतह को कुछ समय के लिए जंग से बचाने में भी मदद करती है।
BIS ने तैयार किया नया मसौदा
भारतीय मानक ब्यूरो यानी BIS ने इस संबंध में एक मसौदा तैयार किया है। इसमें स्टील की गैस पाइपलाइनों के अंदर लगने वाली परतों की गुणवत्ता, उन्हें लगाने की प्रक्रिया और उनकी जांच के लिए एक समान नियम तय करने का प्रस्ताव है।
🛠️ पाइपलाइन परतों के लिए प्रस्तावित नियम
- प्रस्तावित आधार: ISO 15741:2016 को भारतीय Standard के रूप में अपनाने का प्रस्ताव
- गुणवत्ता: पाइप के अंदर लगने वाली परतों के लिए समान तकनीकी नियम
- प्रक्रिया: परत लगाने और उसकी जांच के लिए तय व्यवस्था
- मुख्य उद्देश्य: घर्षण कम करना और गैस प्रवाह बेहतर बनाना
- लागू होने की स्थिति: फिलहाल नियम लागू करना अनिवार्य नहीं होगा
मसौदे में ISO 15741:2016 को भारतीय Standard के रूप में अपनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य भारत में इस्तेमाल होने वाली ऐसी परतों के लिए एक समान तकनीकी आधार तैयार करना है। मसौदे पर संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे गए हैं और उनकी राय के आधार पर अंतिम नियम तैयार किया जाएगा।
फिलहाल इस नियम को लागू करना अनिवार्य नहीं होगा। अगर आगे सरकार इसे गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के तहत लागू करती है, तभी कंपनियों के लिए इसका पालन जरूरी हो सकता है। अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
भारत की परिस्थितियों के अनुसार नियम बनाने पर जोर
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों को भारत की परिस्थितियों के अनुसार ढालना जरूरी है। देश में अलग-अलग मौसम, पुराने पाइपलाइन नेटवर्क, घनी आबादी वाले क्षेत्र और ऐसी कई पाइपलाइन हैं जिनकी अंदर से नियमित जांच करना आसान नहीं है। इसलिए नियम बनाते समय इन परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार पाइपलाइन में जंग की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन खतरे के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करने, जिम्मेदारियों के बंटे होने और समय पर सुधार नहीं करने से समस्या गंभीर हो सकती है। नए नियमों से अगर कंपनियों को एक समान गुणवत्ता और जांच व्यवस्था मिलती है, तो देश के ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा और कार्यक्षमता बेहतर हो सकती है।