Mallakhamb World Record: अश्विन रावल ने बनाया रिकॉर्ड, जानें इस खेल का इतिहास

मल्लखंब भारत का एक पारंपरिक खेल है, जो ताकत, संतुलन, लचीलेपन और एकाग्रता को बेहतर बनाने के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र से शुरू होकर यह खेल अब स्कूलों, प्रशिक्षण केंद्रों और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंच चुका है। हाल के वर्षों में बच्चों और युवाओं के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ी है।

मल्लखंब भारत का एक पारंपरिक खेल है, जिसका इस्तेमाल पहले पहलवान अपनी ताकत, संतुलन और शरीर को मजबूत बनाने के लिए करते थे। समय के साथ यह खेल महाराष्ट्र के अखाड़ों से निकलकर स्कूलों और खेल प्रतियोगिताओं तक पहुंच गया है। अब इसमें बच्चों और युवाओं की दिलचस्पी भी बढ़ रही है। इस खेल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई है।

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मल्लखंब में अश्विन रावल ने बनाया विश्व रिकॉर्ड

Mallakhamb: लकड़ी के खंभे पर करतब दिखाते मल्लखंब खिलाड़ी
Mallakhamb: भारत के पारंपरिक खेल मल्लखंब में ताकत, संतुलन और लचीलेपन का महत्व।

 

मुंबई में 3 मई को मल्लखंब खिलाड़ी अश्विन रावल ने एक मिनट में लकड़ी के खंभे पर लगातार 13 बार घूमने का रिकॉर्ड बनाया। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। वह आठ साल की उम्र से मल्लखंब का अभ्यास कर रहे हैं। उन्होंने इस रिकॉर्ड के लिए लंबे समय तक तैयारी की थी। आखिरकार, उनके प्रयास को आधिकारिक मान्यता मिली।

मल्लखंब शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें ‘मल्ल’ का अर्थ पहलवान और ‘खंब’ का अर्थ खंभा होता है। पुराने समय में पहलवानों को अभ्यास के लिए हमेशा दूसरा व्यक्ति नहीं मिल पाता था। ऐसे में वे लकड़ी के खंभे या मानव शरीर जैसी आकृति वाले ढांचे पर पकड़ बनाने और शरीर को नियंत्रित करने का अभ्यास करते थे। धीरे-धीरे यह तरीका एक अलग खेल के रूप में विकसित हो गया।

मल्लखंब में ताकत और संतुलन का महत्व

इस खेल में खिलाड़ी लकड़ी के खंभे पर चढ़कर अलग-अलग तरह के करतब दिखाते हैं। इसके लिए शरीर की ताकत, लचीलापन, संतुलन और एकाग्रता की जरूरत होती है। प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के प्रदर्शन को कठिनाई, तकनीक और नए करतबों के आधार पर परखा जाता है। मल्लखंब का अभ्यास शरीर की कई मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करता है।

मल्लखंब का इतिहास और महाराष्ट्र से जुड़ाव

मल्लखंब का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। इसके शुरुआती उल्लेख 12वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ ‘मानसोल्लास’ में मिलते हैं। इसके अलावा, 17वीं शताब्दी की कुछ राजपूत और मुगल चित्रकलाओं में भी इससे मिलती-जुलती गतिविधियां दिखाई देती हैं। महाराष्ट्र में पेशवाओं के शासनकाल के दौरान इस खेल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई थी।

मल्लखंब के विकास से बालंभट्ट दादा देवधर का नाम भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि उन्होंने पहलवानों के अभ्यास के लिए इस तरीके को आगे बढ़ाया। एक प्रचलित कथा के अनुसार, उन्होंने विरोधियों की चुनौती का सामना करने के लिए लकड़ी के खंभे पर लगातार अभ्यास किया था। बाद में उन्होंने इस तकनीक का इस्तेमाल कुश्ती में किया। उनके प्रयासों से महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में इस खेल को बढ़ावा मिला और उज्जैन तथा वाराणसी जैसे शहरों में भी इसका प्रसार हुआ।

पुराने समय में मराठा योद्धा भी अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए मल्लखंब का अभ्यास करते थे। इससे उन्हें ताकत, फुर्ती और शरीर पर नियंत्रण हासिल करने में मदद मिलती थी। इस खेल में शरीर के अपने वजन का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए भारी वजन उठाने के बजाय मांसपेशियों की मजबूती और लचीलेपन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।

मल्लखंब खेल की खास बातें

  • खेल का अर्थ: मल्ल यानी पहलवान और खंब यानी खंभा
  • मुख्य उद्देश्य: ताकत, संतुलन और शरीर पर नियंत्रण बढ़ाना
  • प्रमुख रूप: खंभे पर मल्लखंब और रस्सी वाला मल्लखंब
  • जरूरी कौशल: लचीलापन, एकाग्रता और फुर्ती
  • अभ्यास: शुरुआती व्यायाम से लेकर कठिन करतबों तक
  • प्रमुख केंद्र: महाराष्ट्र सहित भारत के कई राज्य

खंभे और रस्सी पर खेले जाने वाले मल्लखंब के रूप

मल्लखंब के कई रूप हैं। इनमें लकड़ी के खंभे पर अभ्यास करने के अलावा रस्सी पर करतब दिखाना भी शामिल है। समय के साथ इसमें लटककर किए जाने वाले अभ्यास और दूसरे तरीके भी विकसित हुए। रस्सी वाला मल्लखंब महिला खिलाड़ियों के बीच काफी लोकप्रिय है और प्रतियोगिताओं में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर मल्लखंब की पहचान

इस खेल को आधुनिक खेल जगत में पहचान दिलाने की कोशिशें भी लंबे समय से होती रही हैं। वर्ष 1936 में बर्लिन ओलंपिक के दौरान अमरावती के हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल के कलाकारों ने मल्लखंब का प्रदर्शन किया था। हालांकि यह ओलंपिक की प्रतिस्पर्धी स्पर्धा नहीं थी, लेकिन इस प्रदर्शन से भारतीय पारंपरिक खेल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाने का अवसर मिला।

वर्ष 1981 में मल्लखंब महासंघ की स्थापना के बाद इस खेल को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के प्रयास तेज हुए। इसके बाद वर्ष 2022 में आयोजित खेलो इंडिया युवा खेलों में इसे शामिल किए जाने और वर्ष 2025 के राष्ट्रीय खेलों में जगह मिलने से इसकी लोकप्रियता बढ़ाने में मदद मिली।

मल्लखंब विश्व कप और खिलाड़ियों को सम्मान

मुंबई का शिवाजी पार्क भी मल्लखंब के प्रमुख केंद्रों में से एक है। यहां स्थित श्री समर्थ व्यायाम मंदिर लंबे समय से भारतीय पारंपरिक खेलों को बढ़ावा दे रहा है। यहां छोटे बच्चों को शुरुआती स्तर पर अभ्यास कराया जाता है। खिलाड़ी पहले शरीर को संतुलित करना सीखते हैं और फिर धीरे-धीरे कठिन करतबों का अभ्यास करते हैं।

वर्ष 2019 में इसी संस्था में मल्लखंब विश्व कप का आयोजन किया गया था। इसमें स्पेन, जर्मनी और जापान समेत 15 देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। इस खेल से जुड़ी हिमानी परब को अर्जुन पुरस्कार मिला, जबकि उदय देशपांडे को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इन उपलब्धियों ने भी मल्लखंब को पहचान दिलाने में योगदान दिया।

भारत के अलग-अलग राज्यों में बढ़ रही लोकप्रियता

महाराष्ट्र आज भी इस खेल का प्रमुख केंद्र है, लेकिन मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। मध्य प्रदेश ने वर्ष 2013 में मल्लखंब को अपना राज्य खेल घोषित किया था। राज्य में इसके प्रशिक्षण केंद्र बढ़ाने और खिलाड़ियों को बेहतर अवसर देने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

मल्लखंब सीखने के लिए केवल शारीरिक ताकत ही नहीं, बल्कि डर पर काबू पाने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी जरूरी है। शुरुआती अभ्यास में बच्चों को जमीन पर किए जाने वाले व्यायामों के जरिए फुर्ती और संतुलन सिखाया जाता है। इसके बाद उन्हें खंभे या रस्सी पर अभ्यास कराया जाता है। इस खेल में अच्छे स्तर तक पहुंचने के लिए कई वर्षों तक नियमित अभ्यास करना पड़ता है।

मल्लखंब: प्रशिक्षण और लोकप्रियता

  • प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र: श्री समर्थ व्यायाम मंदिर, मुंबई
  • स्कूलों में पहुंच: मुंबई के 130 से अधिक स्कूल
  • पुरानी प्रतियोगिताओं में भागीदारी: लगभग 100 से 150 खिलाड़ी
  • अब भागीदारी: अलग-अलग आयु वर्गों में लगभग 700 से 750 खिलाड़ी
  • शुरुआती अभ्यास: जमीन पर व्यायाम और संतुलन बनाना
  • जरूरी गुण: नियमित अभ्यास, आत्मविश्वास और एकाग्रता

स्कूलों में बढ़ रही बच्चों की भागीदारी

मुंबई में साने गुरुजी आरोग्य मंदिर और श्री समर्थ व्यायाम मंदिर जैसी संस्थाएं इस खेल को आगे बढ़ा रही हैं। शहर के 130 से अधिक स्कूलों में भी मल्लखंब का अभ्यास कराया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में इसे सीखने और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले बच्चों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है।

खिलाड़ी अश्विन रावल के अनुसार, पहले स्थानीय प्रतियोगिताओं में करीब 100 से 150 खिलाड़ी हिस्सा लेते थे, लेकिन अब अलग-अलग आयु वर्गों में यह संख्या बढ़कर लगभग 700 से 750 तक पहुंच गई है। इससे पता चलता है कि लोगों के बीच इस पारंपरिक खेल के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।

निष्कर्ष

मल्लखंब भारत की पारंपरिक खेल विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्कूलों, प्रशिक्षण केंद्रों और प्रतियोगिताओं में इसकी बढ़ती मौजूदगी नई पीढ़ी के बीच इसकी लोकप्रियता दिखाती है। बेहतर प्रशिक्षण, सुरक्षित अभ्यास और अधिक अवसर मिलने से यह खेल देशभर में अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. मल्लखंब क्या है और इसे कैसे खेला जाता है?

मल्लखंब भारत का पारंपरिक खेल है, जिसमें खिलाड़ी लकड़ी के खंभे या रस्सी पर चढ़कर विभिन्न करतब दिखाते हैं। इसमें शारीरिक ताकत, लचीलापन, संतुलन और एकाग्रता की जरूरत होती है। खिलाड़ियों को कठिनाई और तकनीक के आधार पर परखा जाता है।

2. मल्लखंब शब्द का क्या अर्थ है?

मल्लखंब शब्द दो शब्दों से बना है। मल्ल का अर्थ पहलवान और खंब का अर्थ खंभा होता है। पुराने समय में पहलवान इसका इस्तेमाल कुश्ती के अभ्यास और शरीर पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए करते थे। बाद में यह एक अलग खेल बन गया।

3. मल्लखंब की शुरुआत कहां हुई थी?

मल्लखंब का प्रमुख विकास महाराष्ट्र में हुआ, जहां इसे अखाड़ों और पहलवानों के अभ्यास से जोड़ा जाता है। इसके शुरुआती उल्लेख पुराने संस्कृत ग्रंथों में मिलते हैं। पेशवाओं के शासनकाल में भी इस खेल को बढ़ावा मिला और धीरे-धीरे इसका प्रसार दूसरे क्षेत्रों में हुआ।

4. क्या बच्चे मल्लखंब सीख सकते हैं?

बच्चे प्रशिक्षित शिक्षक की देखरेख में मल्लखंब सीख सकते हैं। शुरुआत जमीन पर किए जाने वाले व्यायामों, संतुलन और लचीलेपन के अभ्यास से होती है। इसके बाद धीरे-धीरे खंभे या रस्सी पर प्रशिक्षण दिया जाता है। सुरक्षा नियमों और नियमित अभ्यास का पालन जरूरी है।

5. मल्लखंब से शरीर को क्या फायदे मिलते हैं?

मल्लखंब का अभ्यास शरीर की ताकत, लचीलापन, संतुलन और समन्वय बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इसके लिए एकाग्रता और आत्मविश्वास भी जरूरी होते हैं। हालांकि, कठिन करतब सीखने के लिए उचित प्रशिक्षण, सुरक्षित उपकरण और अनुभवी प्रशिक्षक की देखरेख आवश्यक है।

अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। मल्लखंब का अभ्यास प्रशिक्षित शिक्षक की देखरेख में और उचित सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही करें।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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