मेडिकल डिवाइस लाइसेंस नियमों में बदलाव, मंजूरी मिलेगी तेजी से

केंद्र सरकार ने मेडिकल डिवाइस निर्माण क्षेत्र में लाइसेंसिंग प्रक्रिया को अधिक तेज़ और सरल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मेडिकल डिवाइसेज रूल्स, 2017 में संशोधन का मसौदा जारी किया है, जिसका उद्देश्य गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन से जुड़े मानकों को बरकरार रखते हुए विनिर्माण लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।

मेडिकल डिवाइस लाइसेंसिंग नियमों में बड़े बदलाव

रविवार को जारी मंत्रालय के बयान के अनुसार, प्रस्तावित संशोधनों का मकसद कारोबार करने में आसानी (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देना, नियामकीय प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और दक्ष बनाना तथा देश में उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल डिवाइस समय पर उपलब्ध कराना है। इसके तहत विभिन्न जोखिम श्रेणियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस जारी करने की वैधानिक समय-सीमा में कमी करने का प्रस्ताव रखा गया है।

सरकार का मानना है कि इन बदलावों से भारत के तेजी से बढ़ रहे मेडिकल डिवाइस उद्योग को गति मिलेगी। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) के अनुसार, करीब 13 अरब डॉलर के भारतीय मेडिकल डिवाइस सेक्टर ने लंबे समय से लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल बनाने और अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं को कम करने की मांग की है, ताकि घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन मिल सके।

🏥 मेडिकल डिवाइस नियमों में मुख्य बदलाव

  • उद्देश्य: लाइसेंसिंग प्रक्रिया को तेज़ और सरल बनाना
  • फोकस: गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन बनाए रखना
  • लाभ: Ease of Doing Business को बढ़ावा
  • प्रभाव: मेडिकल डिवाइस उद्योग को गति मिलने की उम्मीद
  • नतीजा: मरीजों तक उपकरणों की तेज़ उपलब्धता

मेडिकल डिवाइस की जोखिम श्रेणियां

वर्तमान नियमों के तहत मेडिकल डिवाइसेज को जोखिम के आधार पर क्लास A, क्लास B, क्लास C और क्लास D में वर्गीकृत किया गया है, जिसमें क्लास D को सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी माना जाता है।

प्रस्तावित संशोधन के तहत क्लास B मेडिकल डिवाइसेज—जिनमें ब्लड प्रेशर मॉनिटर, हाइपोडर्मिक सुई और पल्स ऑक्सीमीटर जैसे कम से मध्यम जोखिम वाले उपकरण शामिल हैं—के लिए विनिर्माण लाइसेंस जारी करने की समय-सीमा 140 दिनों से घटाकर 115 दिन करने का सुझाव दिया गया है।

वहीं, क्लास C और क्लास D श्रेणी के उच्च जोखिम वाले मेडिकल डिवाइसेज, जैसे कार्डियक स्टेंट, हिप और नी इम्प्लांट तथा अन्य ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट के लिए लाइसेंस जारी करने की समय-सीमा 105 दिनों से घटाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव है।

⏳ नई लाइसेंसिंग समय-सीमा

  • क्लास B: 140 दिन से घटाकर 115 दिन
  • क्लास C: 105 दिन से घटाकर 90 दिन
  • क्लास D: 105 दिन से घटाकर 90 दिन
  • उच्च जोखिम उपकरण: स्टेंट, इम्प्लांट आदि शामिल
  • उद्देश्य: समयबद्ध और पारदर्शी मंजूरी

लाइसेंस प्रक्रिया में क्या बदलाव होंगे?

मंत्रालय ने बताया कि संशोधित नियमों में आवेदन की प्रारंभिक जांच, नोटिफाइड बॉडी द्वारा ऑडिट, नियामकीय अनुपालन की समीक्षा और अंतिम लाइसेंस जारी करने तक प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की गई है। इससे पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और पूर्वानुमेय बनने की उम्मीद है।

सरकार का कहना है कि इन सुधारों से नियामकीय व्यवस्था की कार्यकुशलता बढ़ेगी और मरीजों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल उपकरणों की उपलब्धता तेज़ होगी। साथ ही, मेडिकल डिवाइस उद्योग को भी समयबद्ध मंजूरी मिलने से उत्पादन और निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित

स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मसौदा अधिसूचना को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी कर दिया है। इसे सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) की आधिकारिक वेबसाइट और राजपत्र (Official Gazette) पर प्रकाशित किया गया है। सभी संबंधित पक्षों को अपने सुझाव और आपत्तियां भेजने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया है।

Gourav Kumar Singh

About the Author

Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

Read More →

Leave a Comment