रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में इस साल अब तक करीब 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 29 सितंबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कंपनी के शेयर का भाव साल की शुरुआत की तुलना में 24.98 प्रतिशत नीचे था। इसका असर उन म्यूचुअल फंड योजनाओं पर भी पड़ सकता है, जिनके पोर्टफोलियो में रिलायंस इंडस्ट्रीज का हिस्सा काफी ज्यादा है।
किन म्यूचुअल फंड योजनाओं में रिलायंस की हिस्सेदारी ज्यादा है?
कुछ सक्रिय म्यूचुअल फंड योजनाओं में रिलायंस इंडस्ट्रीज का निवेश 9 प्रतिशत से अधिक है। एसबीआई इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में इसकी हिस्सेदारी 11.55 प्रतिशत, एबीएसएल कॉन्ग्लोमरेट फंड में 10.85 प्रतिशत और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एनर्जी अपॉर्च्युनिटीज फंड में 9.26 प्रतिशत थी। क्वांट मल्टी एसेट एलोकेशन फंड में यह हिस्सा 9.25 प्रतिशत और एसबीआई एनर्जी अपॉर्च्युनिटीज फंड में 9.12 प्रतिशत था। ये आंकड़े 31 अगस्त 2026 की स्थिति पर आधारित हैं।
इनमें से ज्यादातर योजनाएं किसी खास सेक्टर या थीम पर केंद्रित हैं, जबकि क्वांट की योजना अलग-अलग तरह की संपत्तियों में निवेश करने वाली हाइब्रिड श्रेणी में आती है। नियमों के अनुसार सामान्य स्थिति में किसी एक कंपनी के शेयर में एक म्यूचुअल फंड योजना के कुल निवेश का 10 प्रतिशत से अधिक लगाने की सीमा होती है। हालांकि, सेक्टर आधारित, थीम आधारित और किसी सूचकांक को ट्रैक करने वाली कुछ योजनाओं पर अलग नियम लागू हो सकते हैं।
रिलायंस में ज्यादा हिस्सेदारी का क्या मतलब है?
किसी म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो में रिलायंस इंडस्ट्रीज का वजन अधिक होने पर कंपनी के शेयर में बड़े बदलाव का असर फंड के प्रदर्शन पर भी दिखाई दे सकता है। हालांकि, वास्तविक असर फंड के दूसरे निवेश और उसकी पूरी पोर्टफोलियो संरचना पर निर्भर करता है।
विविध इक्विटी फंड में रिलायंस की हिस्सेदारी कितनी है?
विविध इक्विटी योजनाओं में रिलायंस इंडस्ट्रीज की हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देती है। मोटिलाल ओसवाल लार्ज कैप फंड में इसका हिस्सा 6.49 प्रतिशत, बंधन वैल्यू फंड में 6.40 प्रतिशत और एचएसबीसी लार्ज कैप फंड में 6.37 प्रतिशत था। पराग पारिख लार्ज कैप फंड में यह 6.36 प्रतिशत और बैंक ऑफ इंडिया लार्ज एंड मिड कैप फंड में 6.29 प्रतिशत था। ये आंकड़े भी 31 अगस्त की स्थिति के हैं।
रिलायंस के शेयर में गिरावट के पीछे बाजार से जुड़े कई कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस साल कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भारतीय बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की सीमित रुचि जैसे बाहरी कारकों ने भी कंपनी के प्रदर्शन को प्रभावित किया है। ऐसे कारणों में बदलाव आने पर शेयर की कीमत पर उसका असर आगे दिखाई दे सकता है। वहीं, अगर किसी कंपनी के कारोबार से जुड़ी स्थायी समस्या के कारण शेयर में गिरावट आती है, तो निवेशकों के लिए स्थिति को अलग तरीके से समझना जरूरी हो सकता है।
इंडेक्स फंड और ETF में रिलायंस का बड़ा वजन
रिलायंस इंडस्ट्रीज का बड़ा हिस्सा कुछ इंडेक्स फंड और ईटीएफ में भी दिखाई देता है। मोटिलाल ओसवाल निफ्टी ऑयल एंड गैस ईटीएफ में कंपनी की हिस्सेदारी 32.46 प्रतिशत और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल निफ्टी ऑयल एंड गैस ईटीएफ में 32.43 प्रतिशत थी। टाटा बीएसई सेलेक्ट बिजनेस ग्रुप्स इंडेक्स फंड में यह 22.69 प्रतिशत, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल निफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर ईटीएफ में 20.05 प्रतिशत और निप्पॉन इंडिया ईटीएफ निफ्टी इंफ्रा बीईईएस में 20.03 प्रतिशत थी।
एक ही कंपनी में छिपा हुआ ज्यादा एक्सपोजर
अगर किसी निवेशक के पास कई म्यूचुअल फंड योजनाएं हैं, तो एक ही कंपनी अलग-अलग फंड के जरिए बार-बार पोर्टफोलियो में शामिल हो सकती है। इसलिए हर योजना को अलग-अलग देखने के साथ पूरे पोर्टफोलियो में रिलायंस इंडस्ट्रीज की कुल हिस्सेदारी देखना भी उपयोगी हो सकता है।
रिलायंस की गिरावट का फंड पर कितना असर हो सकता है?
ऐसी योजनाओं में किसी एक बड़ी कंपनी का वजन अधिक होने पर उसके शेयर में तेज बदलाव का असर संबंधित फंड पर भी अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई दे सकता है। इसलिए निवेशक को केवल किसी योजना के हालिया रिटर्न को देखने के बजाय उसके पोर्टफोलियो में मौजूद प्रमुख कंपनियों और उनके वजन को भी समझना चाहिए।
अगर किसी निवेशक के पास कई म्यूचुअल फंड योजनाएं हैं, तो उन्हें अलग-अलग निवेश मानने के बजाय पूरे पोर्टफोलियो को एक साथ देखना उपयोगी हो सकता है। ऐसा करने से पता चल सकता है कि कहीं एक ही कंपनी कई योजनाओं में बड़ी हिस्सेदारी के साथ तो मौजूद नहीं है। इससे किसी एक शेयर में कुल निवेश का वास्तविक स्तर समझने में मदद मिल सकती है।
निवेश से पहले किन बातों पर ध्यान दें?
निवेश से जुड़ा फैसला लेते समय योजना की निवेश रणनीति, जोखिम, पोर्टफोलियो में कंपनियों की हिस्सेदारी और निवेश की अवधि को ध्यान में रखना चाहिए। किसी शेयर में गिरावट आने मात्र से पूरी म्यूचुअल फंड योजना के बारे में निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। निवेशकों को उपलब्ध जानकारी का अध्ययन करके और जरूरत पड़ने पर प्रमाणित वित्तीय विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अपने निवेश से जुड़ा निर्णय लेना चाहिए।
5 FAQs
1. रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में 2026 में कितनी गिरावट आई है?
29 सितंबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर साल की शुरुआत की तुलना में करीब 24.98 प्रतिशत नीचे था।
2. किन म्यूचुअल फंड योजनाओं में रिलायंस की हिस्सेदारी ज्यादा है?
31 अगस्त 2026 की स्थिति के अनुसार एसबीआई इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में 11.55 प्रतिशत, एबीएसएल कॉन्ग्लोमरेट फंड में 10.85 प्रतिशत और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एनर्जी अपॉर्च्युनिटीज फंड में 9.26 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
3. क्या रिलायंस के शेयर की गिरावट से म्यूचुअल फंड भी प्रभावित हो सकता है?
अगर किसी म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो में रिलायंस इंडस्ट्रीज का वजन अधिक है, तो कंपनी के शेयर में बड़े बदलाव का असर फंड के प्रदर्शन पर दिखाई दे सकता है। वास्तविक असर फंड की पूरी पोर्टफोलियो संरचना पर निर्भर करता है।
4. क्या एक निवेशक के कई फंड में रिलायंस का एक्सपोजर हो सकता है?
हां। एक ही कंपनी अलग-अलग म्यूचुअल फंड योजनाओं के पोर्टफोलियो में शामिल हो सकती है। इसलिए निवेशक को सभी योजनाओं को एक साथ देखकर किसी एक कंपनी में अपने कुल अप्रत्यक्ष निवेश को समझना चाहिए।
5. म्यूचुअल फंड चुनते समय केवल रिलायंस की हिस्सेदारी देखनी चाहिए?
नहीं। निवेश रणनीति, जोखिम स्तर, खर्च, निवेश अवधि, पोर्टफोलियो की संरचना और फंड के प्रदर्शन जैसे कई पहलुओं को साथ में देखना जरूरी है। केवल किसी एक कंपनी की हिस्सेदारी के आधार पर पूरी योजना का आकलन करना पर्याप्त नहीं है।
Conclusion
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में इस साल की गिरावट का असर उन म्यूचुअल फंड योजनाओं पर अलग-अलग स्तर पर दिखाई दे सकता है, जिनके पोर्टफोलियो में कंपनी का वजन अधिक है। खासकर सेक्टर, थीम और कुछ इंडेक्स आधारित योजनाओं में इसका एक्सपोजर अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। इसलिए निवेशकों के लिए केवल फंड के रिटर्न को देखने के बजाय पूरे पोर्टफोलियो में रिलायंस की कुल हिस्सेदारी और योजना की निवेश रणनीति को समझना महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिम के अधीन है। निवेश करने से पहले संबंधित योजना के दस्तावेजों और आधिकारिक जानकारी को ध्यान से पढ़ें तथा जरूरत होने पर प्रमाणित वित्तीय विशेषज्ञ से सलाह लें।
