green energy उत्पादन में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ बिजली बाजार में नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। सौर और पवन ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण दिन के समय बिजली की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है, जिससे बिजली उत्पादक कंपनियों और निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
Renewable Energy बढ़ने से बिजली की कीमतों पर बढ़ा दबाव
भारत में Renewable Energy उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी सामने आ रही है। दिन के समय सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन मांग से अधिक होने के कारण बिजली की कीमतें कई बार बेहद नीचे चली जाती हैं। हालात ऐसे हैं कि हाल के महीनों में इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) के रियल-टाइम बाजार में बिजली की कीमत कुछ अवसरों पर 10 पैसे प्रति यूनिट तक पहुंच गई। इससे बिजली उत्पादक कंपनियों और निवेशकों की चिंता बढ़ने लगी है, क्योंकि कम कीमतों का सीधा असर उनकी आय पर पड़ सकता है।
⚡ Renewable Energy से जुड़ी प्रमुख बातें
- बिजली कीमत: IEX में 10 पैसे प्रति यूनिट तक पहुंची
- मुख्य कारण: दिन में मांग से अधिक सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन
- डिस्कॉम: अतिरिक्त बिजली कम कीमत पर बेचने को मजबूर
- खरीद लागत: सामान्यतः ₹2 प्रति यूनिट से अधिक
- Hybrid और FDRE परियोजनाएं: कई मामलों में ₹3 प्रति यूनिट से अधिक लागत
- चुनौती: निवेश और परियोजनाओं की आय पर दबाव
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में हरित ऊर्जा उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, जबकि दोपहर के समय बिजली की मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ती। ऐसे में वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के पास अतिरिक्त बिजली बच जाती है, जिसे वे बिजली एक्सचेंज पर बहुत कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर हो जाती हैं। जबकि इस बिजली की खरीद लागत आमतौर पर ₹2 प्रति यूनिट से अधिक होती है और कुछ Hybrid तथा एफडीआरई परियोजनाओं के लिए यह ₹3 प्रति यूनिट से भी ज्यादा रहती है।
हालांकि देश की कुल बिजली का केवल लगभग 13% हिस्सा ही बिजली एक्सचेंज के जरिए खरीदा और बेचा जाता है। बाकी बिजली लंबे समय के PPA यानी पावर परचेज एग्रीमेंट के तहत पहले से तय समझौतों के माध्यम से आपूर्ति की जाती है। इसके बावजूद एक्सचेंज में लगातार गिरती कीमतें भविष्य की नई परियोजनाओं और निवेशकों के लिए चिंता का कारण बन रही हैं।
बिजली बाजार में बढ़ता उतार-चढ़ाव
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं में शुरुआती निवेश काफी अधिक होता है, जबकि संचालन लागत अपेक्षाकृत कम रहती है। यदि बिजली को समय पर ग्रिड तक नहीं पहुंचाया जा सके या बाजार में कीमतें बहुत नीचे चली जाएं, तो ऐसी परियोजनाओं की कमाई और निवेश पर मिलने वाला लाभ प्रभावित हो सकता है। खासकर वे परियोजनाएं अधिक प्रभावित होती हैं जो खुले बाजार में बिजली बेचती हैं।
आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून 2026 के दौरान कई बार बिजली की कीमत 5 पैसे प्रति यूनिट से भी नीचे चली गई। एक मई को तो कुछ समय के लिए कीमत शून्य तक पहुंच गई। दूसरी ओर इसी दौरान दोपहर के समय सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन करीब 90 गीगावाट तक पहुंच गया, जो उस समय देश की कुल बिजली मांग का लगभग 39% था। इससे साफ है कि हरित ऊर्जा की उपलब्धता तेजी से बढ़ रही है।
दिलचस्प बात यह है कि बिजली की कुल मांग लगातार बढ़ने के बावजूद दिन और शाम के समय कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। दिन में जब सौर ऊर्जा का उत्पादन अधिक होता है, तब कीमतें काफी कम रहती हैं। लेकिन शाम को सूरज ढलने के बाद सौर उत्पादन घट जाता है और मांग बढ़ने पर बिजली की कीमत कई गुना तक पहुंच जाती है। इससे बिजली बाजार में उतार-चढ़ाव और अधिक बढ़ गया है।
🔋 समाधान और भविष्य की दिशा
- समाधान: Battery आधारित ऊर्जा भंडारण प्रणाली
- उद्देश्य: अतिरिक्त बिजली को स्टोर करना
- फायदा: जरूरत के समय ग्रिड में बिजली उपलब्ध कराना
- सरकारी पहल: Battery Energy Storage System को बढ़ावा
- नई योजनाएं: स्टोरेज परियोजनाओं के लिए टेंडर जारी
- लाभ: कीमतों में स्थिरता और Renewable Energy परियोजनाओं को मजबूती
Battery स्टोरेज से मिल सकता है समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान Battery आधारित ऊर्जा भंडारण प्रणाली है। जब बिजली की उपलब्धता अधिक हो, तब अतिरिक्त ऊर्जा को बैटरी में जमा किया जाए और जरूरत के समय उसे ग्रिड में वापस भेजा जाए। इसी दिशा में सरकार भी तेजी से काम कर रही है और देशभर में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाएं और टेंडर जारी किए जा रहे हैं। इससे भविष्य में बिजली की कीमतों में स्थिरता आने और हरित ऊर्जा परियोजनाओं को बेहतर आर्थिक आधार मिलने की उम्मीद है।
Frequently Asked Questions
1. बिजली की कीमतें 10 पैसे प्रति यूनिट तक क्यों पहुंच रही हैं?
दिन के समय सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन बहुत अधिक हो जाता है, जबकि उसी समय बिजली की मांग अपेक्षाकृत कम रहती है। इस वजह से बिजली की आपूर्ति मांग से ज्यादा हो जाती है और अतिरिक्त बिजली को बेचने के लिए वितरण कंपनियां कम कीमत स्वीकार करती हैं। इसी कारण बिजली एक्सचेंज में कई बार कीमतें 10 पैसे प्रति यूनिट या उससे भी कम स्तर पर पहुंच जाती हैं।
2. क्या कम बिजली कीमतों से Renewable Energy परियोजनाओं पर असर पड़ेगा?
हां, यदि बिजली लंबे समय तक बहुत कम कीमत पर बिकती है तो इसका असर परियोजनाओं की आय पर पड़ सकता है। सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं में शुरुआत में भारी निवेश किया जाता है। यदि उत्पादित बिजली उचित कीमत पर नहीं बिकेगी या ग्रिड में समय पर नहीं पहुंच पाएगी, तो निवेशकों का लाभ कम हो सकता है और नई परियोजनाओं की गति भी प्रभावित हो सकती है।
3. सरकार इस समस्या का समाधान कैसे कर रही है?
सरकार बिजली भंडारण क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसके लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि अतिरिक्त बिजली को कम मांग वाले समय में स्टोर किया जा सके और जरूरत पड़ने पर ग्रिड में वापस उपलब्ध कराया जा सके। इससे बिजली की बर्बादी कम होगी, कीमतों में स्थिरता आएगी और Renewable Energy परियोजनाओं को भी आर्थिक रूप से मजबूती मिलेगी।
Disclaimer: यह जानकारी सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है। ऊर्जा बाजार के आंकड़े समय-समय पर बदल सकते हैं, आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि अवश्य करें।

