वजन घटाने की सस्ती दवा का क्रेज पड़ा धीमा, बिक्री थमी

भारत में वजन घटाने और टाइप-2 डायबिटीज की दवा सेमाग्लूटाइड के सस्ते जेनेरिक विकल्प आने के बाद शुरुआत में इसकी बिक्री तेजी से बढ़ी, लेकिन अब इस रफ्तार में कमी देखने को मिल रही है। बाजार के नए आंकड़े बताते हैं कि शुरुआती उत्साह के बाद जेनेरिक दवाओं की बिक्री लगभग स्थिर हो गई है। इससे उन दवा कंपनियों की उम्मीदों को झटका लगा है, जिन्होंने इस तेजी से बढ़ते बाजार में बड़ी संख्या में नए ब्रांड उतारे थे।

सेमाग्लूटाइड के जेनेरिक विकल्पों की बिक्री में आई सुस्ती

सेमाग्लूटाइड वही दवा है जिसे नोवो नॉर्डिस्क वेगोवी और ओजेम्पिक जैसे ब्रांड नामों से बेचती है। भारत में मार्च 2026 के आखिर में इसका पेटेंट खत्म होने के बाद कई भारतीय दवा कंपनियों ने इसके जेनेरिक संस्करण बाजार में उतार दिए। इन दवाओं की कीमत मूल ब्रांड की तुलना में करीब 50 से 90 प्रतिशत तक कम रखी गई। डॉ. रेड्डीज, सन फार्मा, टोरेंट फार्मा, ग्लेनमार्क, एरिस लाइफसाइंसेज और जायडस लाइफसाइंसेज समेत 30 से ज्यादा ब्रांड लॉन्च किए गए, जिससे कीमतों में भी कड़ी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।

दवा बाजार पर नजर रखने वाली संस्था फार्मारैक के अनुसार, अप्रैल से जून के बीच सेमाग्लूटाइड की बिक्री की मात्रा तो बढ़ी, लेकिन इसकी कुल बिक्री का मूल्य लगभग एक ही स्तर पर बना रहा। मई और जून में जेनेरिक दवाओं की बिक्री करीब 40 करोड़ रुपये पर स्थिर रही। शुरुआत में अधिक मांग की उम्मीद में कंपनियों और वितरकों ने बड़ी मात्रा में दवाएं जमा कर ली थीं, जिससे जून तक बाजार में करीब 100 करोड़ रुपये का अतिरिक्त स्टॉक होने की बात सामने आई।

💊 सेमाग्लूटाइड बाजार के प्रमुख आंकड़े

  • पेटेंट समाप्त: मार्च 2026
  • लॉन्च ब्रांड: 30 से अधिक
  • कीमत: मूल ब्रांड से 50–90% तक कम
  • मई-जून बिक्री: करीब 40 करोड़ रुपये
  • अतिरिक्त स्टॉक: करीब 100 करोड़ रुपये
  • जेनेरिक हिस्सेदारी: जून में 82 प्रतिशत

शुरुआती मांग के बाद बिक्री क्यों हुई स्थिर

विशेषज्ञों का कहना है कि जेनेरिक दवाओं ने अधिक मरीजों तक इलाज पहुंचाने में मदद की है और जून में कुल बिक्री की मात्रा में इनकी हिस्सेदारी 82 प्रतिशत रही। हालांकि अब नए मरीजों की संख्या पहले जैसी तेजी से नहीं बढ़ रही है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार जीएलपी-1 दवाएं लेने वाले 30 से 50 प्रतिशत मरीज एक साल के भीतर इलाज छोड़ देते हैं। इसके पीछे दवा के दुष्प्रभाव और इलाज का खर्च प्रमुख कारण माने जाते हैं।

इसके बावजूद मूल दवा बनाने वाली कंपनियां नोवो नॉर्डिस्क और एली लिली लगातार अपनी बाजार हिस्सेदारी बनाए हुए हैं। इन कंपनियों ने कीमतों में कटौती की, डॉक्टरों के बीच अपने ब्रांड की पहचान मजबूत रखी और मरीजों का भरोसा बनाए रखा। वहीं, दवाओं के प्रचार पर सख्ती होने के कारण अब इन दवाओं की बिक्री पहले की तुलना में अधिक संतुलित तरीके से बढ़ रही है।

📈 आगे बाजार की दिशा

  • नए मरीज: जुड़ने की रफ्तार धीमी
  • ब्रांड बढ़त: नोवो नॉर्डिस्क और एली लिली मजबूत
  • प्रतिस्पर्धा: कीमत और वितरण नेटवर्क अहम
  • मरीजों का भरोसा: लंबे समय की सफलता का प्रमुख आधार
  • बाजार अनुमान: मूल्य के हिसाब से आगे भी वृद्धि संभव
  • चुनौती: दुष्प्रभाव और इलाज का खर्च

लंबी अवधि में वितरण नेटवर्क और भरोसा होगा सबसे बड़ा आधार

फार्मारैक का अनुमान है कि आने वाले महीनों में जीएलपी-1 दवाओं का बाजार मूल्य के हिसाब से बढ़ता रहेगा, लेकिन नए मरीजों के जुड़ने की रफ्तार धीमी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में वही जेनेरिक कंपनियां बाजार में मजबूत रहेंगी, जिनका वितरण नेटवर्क अच्छा होगा और जो डॉक्टरों तथा मरीजों का भरोसा जीतने में सफल होंगी।

Disclaimer: यह जानकारी सार्वजनिक रिपोर्टों और बाजार के उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है। किसी भी दवा का उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह पर करें।

Gourav Kumar Singh

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