Asset Allocation Guide: सुरक्षित निवेश के साथ बेहतर रिटर्न कैसे पाएं

पिछले कुछ समय से बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने के कारण कई छोटे निवेशक अपने पैसों को सुरक्षित जगह लगाने के विकल्पों पर दोबारा विचार कर रहे हैं। महंगाई के असर को देखते हुए केवल सुरक्षित निवेश करना ही काफी नहीं है, बल्कि सही Asset Allocation यानी निवेश को अलग-अलग जगह बांटना भी जरूरी है। फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), डेट फंड, आर्बिट्राज फंड और हाइब्रिड फंड जैसे विकल्पों में जोखिम कम होता है, लेकिन इनमें से सही विकल्प चुनना निवेशक की जरूरत, टैक्स स्लैब और जोखिम सहने की क्षमता पर निर्भर करता है।

निवेश का फैसला करते समय तीन मुख्य सवालों पर ध्यान देना चाहिए कि पैसे की जरूरत कब पड़ेगी, निवेशक किस टैक्स श्रेणी में आता है और बाजार में गिरावट आने पर वह कितना नुकसान सहन कर सकता है। कई बार निवेशक टैक्स के प्रभाव को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह रिटर्न पर बड़ा असर डाल सकता है।

अप्रैल 2023 के बाद खरीदे गए डेट फंड पर टैक्स नियम फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह लागू होते हैं। यानी निवेशक को अपनी आयकर दर के अनुसार टैक्स देना पड़ता है। वहीं आर्बिट्राज फंड और कई बैलेंस्ड एडवांटेज फंड पर इक्विटी से जुड़े टैक्स नियम लागू होते हैं, जिसमें एक साल से ज्यादा समय रखने पर तय सीमा से अधिक लाभ पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है।

निवेश विकल्पों को जोखिम के आधार पर एक सीढ़ी की तरह समझा जा सकता है। सबसे कम जोखिम वाले विकल्पों में फिक्स्ड डिपॉजिट और लिक्विड फंड आते हैं। इसके बाद आर्बिट्राज फंड, शॉर्ट अवधि वाले डेट फंड, कॉरपोरेट बॉन्ड फंड, इक्विटी सेविंग फंड, बैलेंस्ड एडवांटेज फंड और मल्टी-एसेट फंड जैसे विकल्प आते हैं।

कई निवेशक बाजार के डर से पूरी तरह इक्विटी से दूरी बना लेते हैं, लेकिन लंबे समय में संपत्ति बनाने के लिए थोड़ी हिस्सेदारी इक्विटी में रखना जरूरी हो सकता है। हालांकि यह हिस्सा निवेशक के लक्ष्य और जोखिम क्षमता के अनुसार तय किया जाना चाहिए।

अगर किसी निवेशक का लक्ष्य तीन साल बाद पैसा निकालना है, तो इक्विटी में निवेश सीमित रखना बेहतर माना जाता है। ऐसे मामलों में कई निवेशक पूरी तरह सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दे सकते हैं, क्योंकि कम समय में बाजार गिरने पर रिकवरी का मौका कम मिलता है।

वहीं पांच साल जैसे लंबे लक्ष्य के लिए एक रूढ़िवादी निवेशक अपनी कुल राशि का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा इक्विटी में रख सकता है और बाकी राशि को बेहतर गुणवत्ता वाले डेट विकल्पों या आर्बिट्राज फंड में निवेश कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, निवेश शुरू करने के बाद समय-समय पर इक्विटी हिस्सेदारी को कम करना भी जरूरी है। उदाहरण के लिए, अगर लक्ष्य के करीब पहुंचने पर भी निवेशक के पास ज्यादा इक्विटी है, तो बाजार में अचानक गिरावट आने से नुकसान बढ़ सकता है। इसलिए सही Asset Allocation और समय के अनुसार बदलाव करना लंबी अवधि में बेहतर वित्तीय योजना बनाने में मदद करता है।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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