भारत की औद्योगिक और प्रौद्योगिकी नीति में तेजी से बदलाव हो रहा है। आइए जानते हैं कि कैसे सरकारी निवेश, अनुसंधान, नवाचार और मांग आधारित रणनीति भारत को विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।
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भारत आज अपनी औद्योगिक और प्रौद्योगिकी नीति के सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन हाइड्रोजन, क्वांटम टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश और राष्ट्रीय मिशन शुरू किए हैं। इन योजनाओं की कुल लागत 3.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि 1 लाख करोड़ रुपये की रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन (RDI) योजना निजी अनुसंधान एवं विकास को नई गति देने का प्रयास कर रही है।
भारत की औद्योगिक नीति का नया चरण
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि उद्योगों के लिए मजबूत घरेलू और सरकारी मांग तैयार नहीं की गई, तो नई उत्पादन क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए अब भारत की औद्योगिक रणनीति का अगला चरण मांग पक्ष (Demand Side) को मजबूत करने पर केंद्रित होना चाहिए।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने दिखाया कि जब सरकार नियामक, खरीदार और निर्यात सुविधा प्रदाता की भूमिका एक साथ निभाती है, तब उद्योग असाधारण परिणाम दे सकता है। भारत ने 220 करोड़ से अधिक वैक्सीन खुराक देश में लगाईं और 99 देशों के साथ दो संयुक्त राष्ट्र संगठनों को 30 करोड़ से अधिक वैक्सीन की आपूर्ति की।
🇮🇳 भारत के प्रमुख प्रौद्योगिकी मिशन
- कुल निवेश: 3.3 लाख करोड़ रुपये+
- RDI योजना: 1 लाख करोड़ रुपये
- मुख्य क्षेत्र: सेमीकंडक्टर, AI, ग्रीन हाइड्रोजन
- उद्देश्य: अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा
- फोकस: वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को मजबूत बनाना
- लक्ष्य: विकसित भारत 2047
वैक्सीन मॉडल से मिली सीख
सरकार ने वैक्सीन खरीद पर लगभग 36,000 करोड़ रुपये खर्च किए और पहले से खरीद की गारंटी देकर भारतीय दवा कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने का भरोसा दिया। यही मॉडल अब अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में भी अपनाने की आवश्यकता बताई जा रही है।
भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है। लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार मध्यम आय वाले देशों में से बहुत कम देश उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने में सफल हुए हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि उसे अगले दो दशकों में औद्योगिक उत्पादन, तकनीकी क्षमता और उत्पादकता में तेजी से वृद्धि करनी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि युद्धस्तर की गति से उन्हें लागू भी करना होगा।
अनुसंधान और निजी निवेश की भूमिका
सरकार ने राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन, RDI योजना और विभिन्न तकनीकी मिशनों के माध्यम से निजी क्षेत्र को अनुसंधान एवं विकास के लिए प्रोत्साहित किया है। परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी निजी निवेश का रास्ता खोला गया है।
इन पहलों का उद्देश्य केवल वित्तीय सहायता देना नहीं बल्कि सरकार और निजी उद्योग के बीच विश्वास बढ़ाना भी है, ताकि भारतीय कंपनियां लंबे समय के लिए अनुसंधान और नवाचार में निवेश कर सकें।
भारत ने हाल के वर्षों में कई मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं। संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA), ओमान और न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौते भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोल रहे हैं। इससे भारतीय कंपनियों को इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स और विशेष रसायनों जैसे क्षेत्रों में वैश्विक बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है।
घरेलू मांग और सरकारी खरीद का महत्व
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी मांग के साथ-साथ घरेलू मांग को भी समान महत्व देना आवश्यक होगा।
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) अभी भी स्टार्टअप और नई तकनीक विकसित करने वाली कंपनियों के लिए बड़े ग्राहक नहीं बन पाए हैं। पुरानी निविदा शर्तों, लंबे अनुभव और ऊंचे टर्नओवर जैसी आवश्यकताओं के कारण अधिकांश नवाचार आधारित कंपनियां सरकारी खरीद प्रक्रिया से बाहर रह जाती हैं।
📊 विकसित भारत 2047 की रणनीति
- सरकारी खरीद: घरेलू उद्योग को बढ़ावा
- स्टार्टअप: शुरुआती अवसर और बाजार
- निजी निवेश: अनुसंधान और नवाचार में तेजी
- FTA: वैश्विक निर्यात के नए अवसर
- प्राथमिकता: सप्लाई और डिमांड दोनों पर फोकस
- लक्ष्य: वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनना
यदि सरकार शुरुआती चरण में भारतीय स्टार्टअप और टेक कंपनियों से खरीद बढ़ाए, तो उन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूत आधार मिल सकता है।
हाल के वर्षों में रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। निजी कंपनियों को मिसाइल विकास, उपग्रह निर्माण और अंतरिक्ष परियोजनाओं में भागीदारी का अवसर दिया गया है। इसी प्रकार ऊर्जा क्षेत्र में भी परमाणु परियोजनाओं के लिए निजी निवेश और दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों की दिशा में काम हो रहा है।
2047 के लक्ष्य की ओर भारत
ये उदाहरण बताते हैं कि जब सरकार शुरुआती ग्राहक बनती है, तब निजी उद्योग तेजी से निवेश और नवाचार करने के लिए तैयार होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत को अब सप्लाई और डिमांड दोनों पक्षों को साथ लेकर चलने वाली औद्योगिक नीति अपनानी होगी। सेमीकंडक्टर, रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऊर्जा, रसायन, रेलवे, जहाज निर्माण और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में सरकारी खरीद को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
यदि अनुसंधान, सरकारी खरीद, निजी निवेश और वैश्विक निर्यात को एक ही रणनीति के तहत जोड़ा गया, तो भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की दिशा में तेज़ी से आ
गे बढ़ सकता है।
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