Global Debt Crisis: अमेरिका समेत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर कर्ज का दबाव

दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सरकारी कर्ज अब चिंता का कारण बनता जा रहा है। अमेरिका से लेकर जापान, फ्रांस और ब्रिटेन तक लंबे समय की सरकारी बॉन्ड दरों में तेजी देखने को मिल रही है। अमेरिका में 30 साल के सरकारी बॉन्ड की दर बढ़कर 5.25 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। इसके बावजूद इन देशों की सरकारें अपने बढ़ते सरकारी घाटे और कर्ज को नियंत्रित करने के लिए बड़े कदम उठाती नजर नहीं आ रही हैं।

बढ़ते सरकारी कर्ज से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी कर्ज बाजार है। पिछले एक साल में 10 साल के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की दर करीब 75 आधार अंक बढ़कर 4.65 प्रतिशत हो गई है। यह धीरे-धीरे 5 प्रतिशत के महत्वपूर्ण स्तर की ओर बढ़ रही है। सामान्य तौर पर भू-राजनीतिक तनाव के समय सरकारी बॉन्ड की मांग बढ़नी चाहिए, क्योंकि इन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है। लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की मांग पर दो बड़े कारणों का दबाव माना जा रहा है। पहला कारण सरकार का बहुत बड़ा बजट घाटा है और दूसरा महंगाई को नियंत्रित रखने को लेकर निवेशकों की चिंता है। अमेरिकी बजट घाटा लंबे समय तक सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत से ज्यादा रहने का अनुमान है। वर्ष 2029 तक सरकारी कर्ज और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात 107 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर होगा।

🇺🇸 अमेरिका के कर्ज पर बढ़ता दबाव

  • 30 साल की बॉन्ड दर: 5.25 प्रतिशत
  • 10 साल की बॉन्ड दर: 4.65 प्रतिशत
  • बजट घाटा: जीडीपी के 6 प्रतिशत से ज्यादा रहने का अनुमान
  • 2029 में कर्ज अनुपात: जीडीपी का 107 प्रतिशत
  • डॉलर की हिस्सेदारी: विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 56 प्रतिशत

अगर अमेरिका सरकार सैन्य खर्च में प्रस्तावित 500 अरब डॉलर की बड़ी बढ़ोतरी करती है, तो वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ सकता है। ब्याज दरों में कटौती की मांग और केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को लेकर राजनीतिक दबाव ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है। इससे बाजार में यह आशंका पैदा हो रही है कि सरकार बढ़ते कर्ज के बोझ को कम करने के लिए महंगाई का सहारा ले सकती है।

दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की हिस्सेदारी घटा रहे हैं। अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी दुनिया के केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में अब करीब 56 प्रतिशत रह गई है, जबकि 2001 में यह 72 प्रतिशत थी। अमेरिका को अपने बड़े कर्ज की जरूरत पूरी करने के लिए अब निवेश कोष और मुद्रा बाजार से जुड़े कोषों पर भी ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है।

जापान में भी सरकारी कर्ज बड़ी चुनौती

जापान में भी सरकारी कर्ज की स्थिति गंभीर बनी हुई है। देश का सरकारी कर्ज सकल घरेलू उत्पाद के करीब 230 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने की योजनाएं सामने आ रही हैं। जापानी मुद्रा भी डॉलर के मुकाबले करीब 40 साल के निचले स्तर के आसपास बनी हुई है। केंद्रीय बैंक की नीतियों में बदलाव के बाद लंबे समय वाले सरकारी बॉन्ड की दरों में भी काफी बढ़ोतरी हुई है।

🌍 जापान और यूरोप पर भी दबाव

  • जापान का सरकारी कर्ज: जीडीपी का करीब 230 प्रतिशत
  • फ्रांस का बजट घाटा: जीडीपी के करीब 5 प्रतिशत
  • ब्रिटेन का बजट घाटा: जीडीपी के करीब 5 प्रतिशत
  • फ्रांस का सरकारी खर्च: अर्थव्यवस्था का करीब 58 प्रतिशत
  • मुख्य चिंता: बढ़ती बॉन्ड दरें और सरकारी खर्च

यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन की वित्तीय स्थिति भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रही है। दोनों देशों में सरकारी बॉन्ड की दरें कई वर्षों के ऊंचे स्तर की ओर बढ़ रही हैं। दोनों देशों का बजट घाटा सकल घरेलू उत्पाद के करीब 5 प्रतिशत के आसपास है। इसके बावजूद खर्च कम करने के बजाय सामाजिक योजनाओं पर ज्यादा धन खर्च करने का दबाव बना हुआ है। फ्रांस में सरकारी खर्च पहले ही अर्थव्यवस्था के करीब 58 प्रतिशत के बराबर है।

अगर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं समय रहते अपने बजट घाटे और सरकारी कर्ज को नियंत्रित करने के कदम नहीं उठाती हैं, तो आगे चलकर बॉन्ड बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। किसी एक बड़े देश के बाजार में संकट आने पर उसका असर दूसरे देशों तक भी पहुंच सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ने का खतरा रहेगा। इसलिए सरकारों के सामने अब चुनौती यह है कि वे अभी कठिन वित्तीय फैसले लें या भविष्य में और बड़े संकट का सामना करें।

Gourav Kumar Singh

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Gourav Kumar Singh

Gourav Kumar Singh is the Founder and Editor of Wealth Scope News. He writes about finance, business, stock market, technology, government schemes and trending news. His mission is to provide readers with accurate, reliable and easy-to-understand information through well-researched articles.

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