लोकतंत्र को केवल संविधान के सहारे लंबे समय तक मजबूत नहीं रखा जा सकता। संविधान और संस्थाएं निश्चित रूप से जरूरी हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती तब आती है जब आम नागरिकों के भीतर स्वतंत्रता की भावना गहराई से मौजूद हो। एलेक्सिस डी टॉकविल, बी.आर. आंबेडकर और रवींद्रनाथ टैगोर ने अलग-अलग समय और परिस्थितियों में इसी बात पर जोर दिया था कि आजादी केवल कागज पर लिखे अधिकारों से सुरक्षित नहीं रहती, बल्कि समाज में उसकी मजबूत आदत बननी चाहिए।
लोकतंत्र की मजबूती में नागरिकों की भूमिका
दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्रों में आने वाले अमेरिका और भारत की मौजूदा चुनौतियां यह सवाल उठाती हैं कि क्या केवल संविधान में बदलाव करके लोकतंत्र को उन लोगों से बचाया जा सकता है जो लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आने के बाद उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगते हैं। प्लेटो ने भी बहुत पहले इस खतरे की ओर इशारा किया था कि लोकतंत्र कभी-कभी अपने ही खिलाफ इस्तेमाल होने वाली ताकतों को जनता के वोट से वैधता दे सकता है।
अमेरिका के संस्थापकों ने इस खतरे को समझते हुए सत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए कई व्यवस्थाएं बनाईं। लेकिन जेम्स मैडिसन यह भी जानते थे कि कोई भी व्यवस्था अंततः उसे चलाने वाले लोगों पर निर्भर करती है। अगर अधिकारी संस्थाओं को कमजोर करने पर उतर आएं या कार्यपालिका इतनी ताकतवर हो जाए कि दूसरी संस्थाओं पर दबाव डाल सके, तो केवल संवैधानिक व्यवस्था उसे हमेशा रोक नहीं सकती।
ब्रिटेन का उदाहरण इससे अलग है। वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी एक लिखित संविधान पर उतनी निर्भर नहीं है, बल्कि कई सदियों के राजनीतिक संघर्ष से बनी परंपराओं पर भी टिकी हुई है। मैग्ना कार्टा, चार्ल्स प्रथम की फांसी, संसद की सर्वोच्चता और राजशाही से जुड़ी कई परंपराओं ने सत्ता पर नियंत्रण की व्यवस्था को धीरे-धीरे मजबूत किया। समय के साथ ये बातें समाज की सामान्य आदतों का हिस्सा बन गईं।
आजादी की आदत क्यों जरूरी है
टॉकविल ने जिन मानसिक आदतों की बात की थी, वे ब्रिटिश समाज में नागरिक जीवन का हिस्सा बन गईं। संविधान में बदलाव किया जा सकता है, लेकिन कई पीढ़ियों के संघर्ष से बनी स्वतंत्रता की आदत को मिटाना आसान नहीं होता। इसलिए लोकतंत्र की सबसे गहरी सुरक्षा संविधान और संस्थाओं के साथ-साथ नागरिकों में मौजूद आजादी की साझा भावना में होती है।
लोकतंत्र को केवल आदेश देकर स्थापित नहीं किया जा सकता। अमेरिका की ओर से पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान में किए गए प्रयासों ने भी दिखाया कि किसी समाज में बाहर से लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करना आसान नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता तब टिकाऊ बनती है जब नागरिक खुद मनमानी सत्ता का विरोध करने की आदत विकसित करते हैं।
अमेरिका में भी लोकतंत्र शुरुआत से पूरी तरह उदार नहीं था। 1776 की क्रांति मुख्य रूप से ब्रिटिश शासन से मुक्ति का संघर्ष थी। उस समय आजादी की बात के साथ गुलामी और राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखने जैसी व्यवस्थाएं भी मौजूद थीं। बाद में गृहयुद्ध और नागरिक अधिकार आंदोलन के जरिए स्वतंत्रता का दायरा बढ़ा। इस कारण वहां की लोकतांत्रिक संस्थाएं केवल संविधान बनाने से नहीं, बल्कि आजादी के अर्थ को लेकर लंबे सामाजिक संघर्षों से भी मजबूत हुईं।
भारत में लोकतंत्र का सामाजिक आधार
भारत की स्थिति कुछ अलग रही। संविधान ने देश को बहुत महत्वाकांक्षी लोकतांत्रिक व्यवस्था दी, लेकिन उसके सामाजिक आधार उतने मजबूत नहीं थे। आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि भारत में लोकतंत्र अभी ऊपर-ऊपर तक ही मजबूत है। स्वतंत्रता आंदोलन ने करोड़ों लोगों को जोड़ा, लेकिन उसका मुख्य लक्ष्य विदेशी शासन से आजादी हासिल करना था। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और देश के भीतर मौजूद सामाजिक तथा राजनीतिक दबावों के खिलाफ लंबे संघर्ष को उतनी प्राथमिकता नहीं मिली।
नेहरू और 19वीं सदी के भारतीय बुद्धिजीवियों के कुछ वर्गों में उदार विचार मजबूत थे, लेकिन इन विचारों का प्रभाव पूरे समाज में समान रूप से नहीं फैल पाया। इस वजह से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था काफी हद तक ऊपर से तैयार की गई व्यवस्था भी रही।
गांधी और टैगोर के बीच हुए विचार-विमर्श से भी यह समस्या समझी जा सकती है। दोनों के लिए स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजों को देश से बाहर करना नहीं था। गांधी ने सामाजिक सुधारों पर भी काम किया, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य रही। दूसरी ओर टैगोर को डर था कि अगर केवल विदेशी शासकों की जगह भारतीय शासक आ गए, तो इससे लोगों की वास्तविक आंतरिक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होगी।
टैगोर और आंबेडकर की स्वतंत्रता की सोच
टैगोर के अनुसार स्वतंत्रता का संघर्ष मन के स्तर पर भी होना चाहिए। व्यक्ति में इतनी आंतरिक शक्ति होनी चाहिए कि वह किसी भी तरह के अनुचित दबाव और प्रभुत्व का विरोध कर सके, चाहे सत्ता किसी विदेशी के हाथ में हो या अपने ही देश के व्यक्ति के हाथ में।
आंबेडकर ने इसी समस्या को जातिगत असमानता के नजरिए से देखा। दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण और आत्मसम्मान जैसे आंदोलनों ने नीचे से सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। इन आंदोलनों ने चुनावी राजनीति के जरिए सत्ता में भागीदारी बढ़ाई, शिक्षा और आर्थिक अवसरों तक पहुंच को व्यापक बनाया और पुराने सामाजिक ढांचे में बदलाव लाया।
इन आंदोलनों ने वह काम किया जो केवल संविधान में समानता लिख देने से नहीं हो सकता था। उन्होंने उन लोगों को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने और पुरानी सामाजिक सत्ता को चुनौती देने का अभ्यास कराया, जिन्हें लंबे समय तक पीछे रखा गया था।
आपातकाल से मिली लोकतांत्रिक सीख
भारत में आपातकाल का दौर भी लोकतांत्रिक संस्कृति की कमजोरी और ताकत दोनों को दिखाता है। 1977 में जनता ने सत्ता परिवर्तन करके यह संकेत दिया कि उसके भीतर स्वतंत्रता के प्रति मजबूत भावना मौजूद है। हालांकि उस समय विपक्ष के साथ कई ऐसे राजनीतिक संगठन भी थे जिनकी उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। इसके अलावा बाद के समय में संस्थागत और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के कमजोर होने के खिलाफ लगातार और व्यापक विरोध हमेशा दिखाई नहीं दिया।
भारत में सत्ता पर नियंत्रण रखने वाली कुछ व्यवस्थाएं अमेरिका की तुलना में कमजोर भी हैं। कार्यपालिका और विधायिका के बीच करीबी संबंध, महत्वपूर्ण संस्थाओं में नियुक्तियों पर सरकार के प्रभाव की आशंका और केंद्र के मुकाबले राज्यों की सीमित ताकत जैसी बातें केंद्रीय सत्ता के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं।
संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका, सत्ता पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाएं, संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र मीडिया और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। लेकिन इन्हें लोकतंत्र की सुरक्षा दीवारों की तरह समझा जा सकता है। दीवारें तभी काम करती हैं जब समाज में उन्हें बचाने और उनकी रक्षा करने की इच्छा मौजूद हो।
स्वतंत्रता को सामाजिक आदत बनाने की जरूरत
भारत के लोकतांत्रिक सफर का अधूरा काम इसलिए केवल संवैधानिक सुधार तक सीमित नहीं है। विदेशी शासन से आजादी हासिल करना एक बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक ही चीज नहीं हैं। टैगोर की मन की स्वतंत्रता, आंबेडकर का सामाजिक समानता का संघर्ष और टॉकविल की लोकतांत्रिक आदतों की सोच एक ही दिशा की ओर इशारा करती है कि स्वतंत्रता को समाज के भीतर मजबूत जड़ें बनानी होंगी।
भारत को एक अर्थ में स्वतंत्रता के एक और संघर्ष की जरूरत हो सकती है, लेकिन इस बार लड़ाई विदेशी शासन के खिलाफ नहीं बल्कि मनमानी सत्ता को स्वीकार करने की प्रवृत्ति के खिलाफ होगी। इसका उद्देश्य ऐसा नागरिक समाज बनाना होगा जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के सामने समानता और पीछे लौटती लोकतांत्रिक सोच का विरोध नागरिक जीवन की सामान्य आदत बन जाए। लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा किसी सुरक्षित जगह रखे संविधान से ज्यादा उस समाज में होती है, जिसने स्वतंत्रता को अपनी गहरी आदत बना लिया हो।