केंद्र सरकार देश में pharma क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए बल्क ड्रग्स से जुड़ी उत्पादन प्रोत्साहन (PLI) योजना में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। दवा विभाग के सचिव मनोज जोशी के अनुसार, नई नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होगा, बल्कि रिसर्च, नई तकनीक, बुनियादी ढांचे और वित्तीय सहायता के जरिए कंपनियों को लंबे समय तक मजबूत बनाना है। सरकार इस योजना को ऐसे रूप में लाना चाहती है, जिससे घरेलू कंपनियां नई तकनीक विकसित कर सकें और आयात पर निर्भरता कम हो।
बल्क ड्रग्स PLI योजना में क्या बदलाव होंगे
सरकार नई PLI योजना के जरिए केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि रिसर्च, technology, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को बढ़ावा देने पर भी जोर देना चाहती है। इसका लक्ष्य भारत को बल्क ड्रग्स और API के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाना है।
प्रस्तावित नई योजना के तहत तकनीक विकसित करने के लिए अनुदान, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बल्क ड्रग्स तथा एडवांस इंटरमीडिएट्स के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए जाएंगे। अनुमान है कि भारत का यह बाजार करीब 20 अरब डॉलर का है और इसमें आगे तेज वृद्धि की संभावना है।
हालांकि भारत का दवा उद्योग लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन कई जरूरी दवाओं के कच्चे माल के लिए देश अब भी विदेशों पर निर्भर है। इससे वैश्विक संकट, आपूर्ति में रुकावट या अंतरराष्ट्रीय तनाव की स्थिति में दवा उद्योग प्रभावित हो सकता है। सरकार इसी जोखिम को कम करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है।
नई PLI योजना की मुख्य बातें
- फोकस: बल्क ड्रग्स और API उत्पादन
- उद्देश्य: आयात पर निर्भरता कम करना
- सहायता: रिसर्च, technology और इंफ्रास्ट्रक्चर
- प्रोत्साहन: एडवांस इंटरमीडिएट्स का उत्पादन
- बाजार: करीब 20 अरब डॉलर
- लक्ष्य: घरेलू pharma उद्योग को मजबूत बनाना
पहली PLI योजना का असर
मनोज जोशी ने बताया कि पहली PLI योजना से पेनिसिलिन-जी, पोटैशियम क्लैवुलानेट और कुछ अन्य ऐसे बल्क ड्रग्स का घरेलू उत्पादन शुरू हुआ, जिनका लंबे समय से आयात किया जा रहा था। अब सरकार इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए API, प्रमुख शुरुआती कच्चे पदार्थ (KSM) और इंटरमीडिएट्स के उत्पादन को और मजबूत करना चाहती है।
भारत ने वर्ष 2021 में कोविड महामारी के दौरान बल्क ड्रग्स के लिए PLI योजना शुरू की थी। उस समय चीन में उत्पादन प्रभावित होने के कारण दवाओं की आपूर्ति पर असर पड़ा था। मार्च 2026 तक इस योजना के तहत 29 प्रकार के KSM और API के घरेलू उत्पादन की क्षमता तैयार हो चुकी है। इससे 3,270 करोड़ रुपये की कुल बिक्री हुई, जिसमें 521 करोड़ रुपये का निर्यात भी शामिल रहा। इसके अलावा करीब 2,749 करोड़ रुपये के आयात की जरूरत भी कम हुई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत अभी भी पेनिसिलिन-जी, एमोक्सिसिलिन, एजिथ्रोमाइसिन, रिफैम्पिसिन, एटोरवास्टेटिन और मेटफॉर्मिन जैसे कई महत्वपूर्ण बल्क ड्रग्स के लिए विदेशों पर निर्भर है। वित्त वर्ष 2024-25 में देश ने लगभग 4.35 अरब डॉलर मूल्य के 200 से अधिक प्रकार के API, बल्क ड्रग्स और इंटरमीडिएट्स का आयात किया। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन का रहा, जिसकी हिस्सेदारी करीब 73.7 प्रतिशत थी। इसके बाद यूरोपीय संघ दूसरे स्थान पर रहा।
सरकार की नई रणनीति
- रिसर्च: नई technology विकसित करने पर जोर
- साझेदारी: सार्वजनिक और निजी प्रयोगशालाओं के साथ सहयोग
- लागत: उत्पादन खर्च कम करने की तैयारी
- Investment: कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहन
- उद्देश्य: घरेलू API उत्पादन बढ़ाना
- लाभ: भारत को वैश्विक manufacturing केंद्र बनाना
आगे की तैयारी
सरकार का कहना है कि नई योजना में कंपनियों को केवल उत्पादन बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि नई तकनीक विकसित करने, आधुनिक technology अपनाने और सार्वजनिक व निजी प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर काम करने के लिए भी सहायता दी जाएगी। साथ ही राज्यों के साथ मिलकर फैक्ट्रियों की उपयोगिता लागत कम करने और रिसर्च गतिविधियों को बढ़ावा देने पर भी चर्चा चल रही है।
योजना को मंजूरी मिलने के बाद संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे और नई आवेदन प्रक्रिया शुरू होगी। सरकार का लक्ष्य ऐसा माहौल तैयार करना है, जिसमें कंपनियां आत्मविश्वास के साथ investment करें, आधुनिक उत्पादन क्षमता विकसित करें और भारत को बल्क ड्रग्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ाएं।
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने सरकार की इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि रिसर्च और नवाचार पर आधारित नई नीति से जटिल API और इंटरमीडिएट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, आयात पर निर्भरता घटेगी और भारत वैश्विक manufacturing केंद्र के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा।
अस्वीकरण: यह जानकारी सरकारी बयानों और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। अंतिम दिशा-निर्देश जारी होने पर नियमों में बदलाव संभव है।

