ग्रामीण भारत में कमाई की रफ्तार कमजोर होती नजर आ रही है। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (Nabard) के ताजा सर्वे के अनुसार, पिछले एक साल में केवल 27.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ी है। यह आंकड़ा तब से सबसे कम है, जब से Nabard ने ग्रामीण आर्थिक स्थिति पर नजर रखने के लिए यह सर्वे शुरू किया था।
ग्रामीण परिवारों की आय में धीमी बढ़ोतरी के बीच महंगाई, कमजोर मानसून और रोजगार से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं।
ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ने की रफ्तार में आई गिरावट
Nabard सर्वे की मुख्य बातें
- आय बढ़ी: 27.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की
- आय में बदलाव नहीं: 52.6 प्रतिशत परिवार
- आय घटी: 19.8 प्रतिशत परिवार
- सर्वे: Rural Economic Conditions and Sentiments Survey
- स्थिति: ग्रामीण कमाई की रफ्तार कमजोर
Nabard के Rural Economic Conditions and Sentiments Survey के जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 52.6 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय में कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि 19.8 प्रतिशत परिवारों ने आय घटने की बात कही। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कमाई की बढ़त लगातार धीमी हो रही है।
ग्रामीण आय में कमजोरी ऐसे समय में आई है, जब महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। जून में देश की खुदरा महंगाई 4.38 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले 17 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इसके अलावा कमजोर मानसून और खेती से जुड़ी चिंताओं ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर डाला है।
कमजोर मानसून और खेती की चुनौतियों का असर
इस साल मानसून की बारिश सामान्य से काफी कम रही है। 1 जून से 15 जुलाई के बीच देश में सामान्य से 23 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसका असर खरीफ फसलों की बुवाई पर भी पड़ा है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 6 प्रतिशत पीछे चल रही है।
हालांकि, ग्रामीण इलाकों में खर्च की स्थिति अभी पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। सर्वे के अनुसार, 74.1 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनका खर्च बढ़ा है। यह आंकड़ा पिछले सर्वे के 77.2 प्रतिशत से कम है, लेकिन फिर भी ग्रामीण खपत में मजबूती बनी हुई है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रमुख चिंताएं
- महंगाई: खुदरा महंगाई 4.38 प्रतिशत
- मानसून: सामान्य से 23 प्रतिशत कम बारिश
- कर्ज: अनौपचारिक कर्ज पर बढ़ती निर्भरता
- रोजगार: बेहतर अवसरों की जरूरत
- चुनौती: आय बढ़ाने के नए साधन
सर्वे में एक और चिंता की बात सामने आई है कि ग्रामीण परिवारों की निर्भरता अनौपचारिक कर्ज पर बढ़ रही है। बैंक और अन्य औपचारिक संस्थानों से मिलने वाले कर्ज पर निर्भर परिवारों की हिस्सेदारी घटकर 51 प्रतिशत रह गई, जबकि केवल दोस्तों, रिश्तेदारों या साहूकारों से कर्ज लेने वाले परिवारों की संख्या बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति ग्रामीण अर्थव्यवस्था में शुरुआती दबाव का संकेत हो सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी आय वाले रोजगार के अवसर बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि केवल कृषि क्षेत्र सभी लोगों को रोजगार देने में सक्षम नहीं है।
रोजगार और आय के नए अवसर बनाना जरूरी
वहीं Emkay Global Financial Services की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने कहा कि Nabard का सर्वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोरी का शुरुआती संकेत देता है। उन्होंने कहा कि आय की रफ्तार कम होने के बावजूद खपत अभी बनी हुई है, लेकिन बढ़ते अनौपचारिक कर्ज पर नजर रखने की जरूरत है।
भारत में बड़ी संख्या में लोग कृषि पर निर्भर हैं, लेकिन कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों का देश की GDP में योगदान सीमित है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर बनाना आने वाले समय में महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी Nabard सर्वे और विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित है। आर्थिक स्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं।
