सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे घर खरीदारों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा है कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत मिलने वाली सुरक्षा केवल उस कंपनी तक सीमित रहेगी, जो दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही है। इसका फायदा कंपनी के प्रमोटर या डायरेक्टर अपने ऊपर चल रही व्यक्तिगत कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए नहीं उठा सकते।
IBC सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी रियल एस्टेट कंपनी के प्रमोटर या डायरेक्टर की अपनी अलग कानूनी जिम्मेदारी बनती है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रह सकती है। वहीं कंपनी के खिलाफ चल रही प्रक्रिया पर IBC के तहत रोक बनी रहेगी।
कोर्ट ने कहा कि IBC की धारा 14 के तहत मिलने वाला मोरेटोरियम केवल कॉरपोरेट डेब्टर यानी उस कंपनी पर लागू होता है, जो दिवालिया प्रक्रिया में है। यह सुरक्षा प्रमोटर, डायरेक्टर, सब्सिडियरी कंपनियों, व्यक्तिगत गारंटर या अन्य गैर-कॉरपोरेट लोगों तक अपने आप नहीं पहुंचती।
घर खरीदारों को मिलेगा कानूनी राहत का रास्ता
इस फैसले से घर खरीदारों को राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि कई बार बिल्डर कंपनी के इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में जाने के बाद खरीदारों के पास कानूनी विकल्प सीमित हो जाते थे। अब प्रमोटर की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होने पर उनके खिलाफ अलग से कार्रवाई की जा सकेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से उपभोक्ता फोरम, RERA अथॉरिटी और अन्य ट्रिब्यूनल में चल रहे मामलों में स्पष्टता आएगी। घर खरीदारों को केवल इसलिए अपने अधिकारों से वंचित नहीं होना पड़ेगा क्योंकि डेवलपर कंपनी IBC प्रक्रिया में चली गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
- IBC सुरक्षा: केवल दिवालिया कंपनी तक सीमित
- प्रमोटर जिम्मेदारी: व्यक्तिगत कार्रवाई जारी रह सकती है
- लाभ: घर खरीदारों के कानूनी अधिकार मजबूत होंगे
- धारा 14: मोरेटोरियम सिर्फ कॉरपोरेट डेब्टर पर लागू
- प्रभाव: बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ेगी
IBC मामलों में घर खरीदार सबसे प्रभावित समूह
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के आंकड़ों के अनुसार, नियामक को मिली 5,785 शिकायतों में से करीब 43.9% शिकायतें घर खरीदारों की थीं। इससे पता चलता है कि IBC प्रक्रिया में घर खरीदार सबसे बड़े प्रभावित समूहों में शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले से प्रमोटरों की जवाबदेही बढ़ेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में उन्हें दोषी माना जाएगा। उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी को संबंधित कोर्ट या ट्रिब्यूनल में साबित करना होगा।
प्रमोटर और गारंटर पर बढ़ेगा कानूनी दबाव
इस फैसले के बाद कर्जदाता और खरीदार प्रमोटर, गारंटर और ग्रुप कंपनियों को शुरुआत से ही कानूनी प्रक्रिया में शामिल करने पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं। हालांकि, व्यक्तिगत संपत्ति या गारंटी के खिलाफ कार्रवाई के लिए अलग कानूनी आधार जरूरी होगा।
रियल एस्टेट सेक्टर में IBC प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती है, क्योंकि इसमें केवल बैंक और वित्तीय संस्थान ही नहीं बल्कि हजारों घर खरीदार भी जुड़े होते हैं। किसी प्रोजेक्ट के रुकने से लोगों की वर्षों की बचत और घर का सपना प्रभावित होता है।
रियल एस्टेट IBC प्रक्रिया की चुनौतियां
- समस्या: कई प्रोजेक्ट अलग-अलग वित्तीय व्यवस्था पर चलते हैं
- प्रभाव: हजारों घर खरीदार प्रभावित होते हैं
- चुनौती: कंपनी और प्रोजेक्ट स्तर की जटिल प्रक्रिया
- डेटा: सितंबर 2025 तक 553 CIRP मामले स्वीकार
- खरीदार: करीब 1.09 लाख घर खरीदार प्रभावित
रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद
रियल एस्टेट कंपनियों की एक बड़ी समस्या यह है कि IBC में अभी ज्यादातर मामलों में कंपनी स्तर पर प्रक्रिया चलती है, जबकि बिल्डरों के कई अलग-अलग प्रोजेक्ट होते हैं। हर प्रोजेक्ट की फाइनेंस व्यवस्था, मंजूरी और नकदी प्रवाह अलग हो सकता है।
IBBI की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 तक रियल एस्टेट क्षेत्र में 553 कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) मामले स्वीकार किए गए थे। इनमें 221 मामले अभी चल रहे थे, जिनसे करीब 1.09 लाख घर खरीदार प्रभावित थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा को मजबूत करेगा। साथ ही यह प्रमोटरों को अपनी जिम्मेदारी निभाने और इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए भी प्रेरित कर सकता है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी उपलब्ध रिपोर्टों और कानूनी विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित है।
