भारत में औपचारिक कर्ज लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और अब इसका दायरा केवल कुछ बड़े राज्यों तक सीमित नहीं रहा। उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में तेजी से बढ़ती भागीदारी यह संकेत दे रही है कि देश में वित्तीय समावेशन और संगठित बैंकिंग व्यवस्था का विस्तार लगातार हो रहा है।
औपचारिक कर्ज लेने वालों का बदलता नक्शा
भारत में औपचारिक कर्ज लेने वालों का नक्शा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदल रहा है। पहले जहां पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ राज्य इस मामले में सबसे आगे थे, वहीं अब उत्तर और मध्य भारत के कई राज्य तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। हाल ही में जारी TransUnion CIBIL की एक Report के अनुसार वर्ष 2017 से 2026 के बीच कई उभरते राज्यों में लोगों की औपचारिक कर्ज व्यवस्था तक पहुंच पहले के मुकाबले काफी बढ़ी है।
रिपोर्ट की प्रमुख बातें
- रिपोर्ट: TransUnion CIBIL Report
- अवधि: 2017 से 2026
- सबसे बड़ी बढ़त: उत्तर प्रदेश
- उभरते राज्य: मध्य प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल
- संकेत: औपचारिक कर्ज व्यवस्था का विस्तार
- फायदा: अधिक लोगों की बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच
रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र और तमिलनाडु अभी भी देश के सबसे बड़े कर्ज बाजारों में शामिल हैं, लेकिन कुल हिस्सेदारी के मामले में इनकी भागीदारी पहले की तुलना में कुछ कम हुई है। इसका मतलब यह नहीं है कि इन राज्यों में कर्ज लेने वालों की संख्या घटी है, बल्कि दूसरे राज्यों में इससे भी तेज रफ्तार से वृद्धि हुई है। इसी कारण कुल हिस्सेदारी का संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है।
सबसे अधिक बढ़त उत्तर प्रदेश में दर्ज की गई है। वर्ष 2017 में देश के कुल कर्ज लेने वाले लोगों में इस राज्य की हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में लोग अब औपचारिक बैंकिंग और कर्ज व्यवस्था से जुड़ रहे हैं।
उत्तर और मध्य भारत में तेज बढ़ोतरी
मध्य प्रदेश और बिहार ने भी इस दौरान अच्छा प्रदर्शन किया है। मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत से बढ़कर 6 प्रतिशत हो गई, जबकि बिहार की हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से बढ़कर 5 प्रतिशत तक पहुंच गई। पश्चिम बंगाल में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई और उसकी हिस्सेदारी 4 प्रतिशत से बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई। यह बदलाव दिखाता है कि अब देश के अधिक राज्यों में लोगों की बैंकिंग और उधार लेने की पहुंच लगातार मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। लोगों में वित्तीय जागरूकता बढ़ी है, बैंकिंग सेवाएं पहले से ज्यादा आसानी से उपलब्ध हुई हैं और औपचारिक कर्ज लेने की प्रक्रिया भी सरल बनी है। इसके कारण ऐसे लोग भी अब बैंक और अन्य संस्थानों से जुड़ रहे हैं जो पहले अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहते थे।
बदलाव के प्रमुख कारण
- वित्तीय जागरूकता: लोगों में बढ़ी
- बैंकिंग पहुंच: पहले से अधिक आसान
- Credit: औपचारिक कर्ज तक बेहतर पहुंच
- Finance: संगठित वित्तीय प्रणाली का विस्तार
- Market: राज्यों में संतुलित विकास
- भविष्य: वित्तीय समावेशन और मजबूत होने की उम्मीद
वित्तीय समावेशन को मिलेगा बढ़ावा
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का कर्ज तंत्र अब केवल कुछ चुनिंदा राज्यों तक सीमित नहीं रह गया है। धीरे-धीरे अधिक राज्यों की भागीदारी बढ़ रही है, जिससे पूरे देश में संतुलित विकास देखने को मिल रहा है। इससे भविष्य में अधिक लोगों को सुरक्षित और व्यवस्थित Credit सुविधा मिलने की संभावना बढ़ेगी।
TransUnion CIBIL के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी का कहना है कि पश्चिम और दक्षिण भारत के राज्यों की स्थिति अब भी मजबूत बनी हुई है, लेकिन उत्तर और मध्य भारत में जिस तरह लोगों की भागीदारी बढ़ी है, वह एक बड़ा बदलाव है। यह संकेत देता है कि देश में औपचारिक कर्ज व्यवस्था का दायरा लगातार फैल रहा है और अधिक लोग संगठित Finance प्रणाली का हिस्सा बन रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है तो देश में वित्तीय समावेशन और मजबूत होगा। इससे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को भी आसानी से कर्ज मिलने के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही अलग-अलग राज्यों में संतुलित Market विकास होने से देश की आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले आधिकारिक स्रोत और विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।