अगर किसी व्यक्ति ने संपत्ति बेचते समय उससे जुड़े कुछ योग्य खर्चों को अपने मूल आयकर रिटर्न में शामिल नहीं किया है, तो बाद की कर प्रक्रिया में उन खर्चों का दावा करने का रास्ता कुछ मामलों में खुल सकता है। मुंबई आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण यानी ITAT के हालिया फैसले में करदाता को राहत मिली है। मामले में 37.16 लाख रुपये के संपत्ति से जुड़े खर्चों को लेकर विवाद था और न्यायाधिकरण ने कर विभाग को की गई अतिरिक्त गणना हटाने का निर्देश दिया।
संपत्ति बिक्री के खर्चों पर ITAT से करदाता को राहत
यह मामला महेंद्र प्रताप सिंह और वित्त वर्ष 2019-20 से जुड़े आकलन वर्ष 2020-21 का है। सिंह ने वासुदेव स्काई हाई में चार आवासीय फ्लैट बेचे थे। इन संपत्तियों की बिक्री से हुए पूंजीगत लाभ को कम करने के लिए उन्होंने दलाली, संपत्ति में सुधार और दूसरे संबंधित खर्चों को शामिल करने की मांग की थी।
सिंह ने चारों फ्लैट से जुड़े कुल 37.16 लाख रुपये के खर्च का दावा किया। इसमें खरीद और बिक्री के दौरान दी गई दलाली, सुधार से जुड़े खर्च और अन्य शुल्क शामिल थे। हालांकि, ये खर्च उनके मूल आयकर रिटर्न में शामिल नहीं थे। धारा 148 के तहत जारी नोटिस के जवाब में दाखिल रिटर्न में भी इनका दावा नहीं किया गया था।
आकलन अधिकारी ने खर्चों का दावा नहीं माना
मामले की दोबारा जांच शुरू होने के बाद सिंह ने कर निर्धारण की कार्यवाही के दौरान खर्चों की नई गणना पेश की। इसके साथ उन्होंने इन भुगतानों से जुड़े दस्तावेज भी जमा किए। नई गणना के अनुसार एक फ्लैट पर 1.25 लाख रुपये का अल्पकालिक पूंजीगत नुकसान हुआ, जबकि बाकी तीन फ्लैटों पर क्रमशः 2.11 लाख रुपये, 3.86 लाख रुपये और 11.01 लाख रुपये का पूंजीगत लाभ दिखाया गया।
आकलन अधिकारी ने इन खर्चों के दावों को स्वीकार नहीं किया और अधिक पूंजीगत लाभ निर्धारित किया। अधिकारी का कहना था कि खर्चों का दावा मूल या संशोधित रिटर्न में नहीं किया गया था। इसके अलावा कुछ दलाली का भुगतान संबंधित संपत्ति सौदों की तारीख के बाद किया गया था, जिसे भी दावे को खारिज करने का आधार बनाया गया।
इसके बाद राष्ट्रीय फेसलेस अपील केंद्र ने 13 दिसंबर 2025 को सिंह की अपील को उनकी अनुपस्थिति में खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने मुंबई ITAT का रुख किया।
37.16 लाख रुपये के खर्च का दावा
- संपत्तियां: चार आवासीय फ्लैट
- कुल खर्च: 37.16 लाख रुपये
- खर्च: खरीद और बिक्री के दौरान दी गई दलाली
- अन्य खर्च: सुधार से जुड़े खर्च और अन्य शुल्क
- दस्तावेज: इन भुगतानों से जुड़े दस्तावेज
- भुगतान: बैंक के माध्यम से किया गया
ITAT ने कर विभाग की दलील नहीं मानी
न्यायाधिकरण ने पाया कि 37.16 लाख रुपये का पूरा खर्च बैंक के माध्यम से किया गया था और इस तथ्य पर न तो आकलन अधिकारी और न ही अपीलीय अधिकारी ने कोई आपत्ति जताई थी। दलाली के भुगतान की तारीख को लेकर भी न्यायाधिकरण ने कर विभाग की दलील को स्वीकार नहीं किया। उसके अनुसार सौदा पूरा होने के बाद दलाली देय होना अपने आप में खर्च को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
न्यायाधिकरण ने यह भी देखा कि सिंह ने जांच के दौरान संबंधित दस्तावेज जमा किए थे। आकलन अधिकारी ने इन कागजात की जांच की और भुगतान की पुष्टि के लिए संबंधित पक्षों को धारा 133(6) के तहत नोटिस भी भेजे थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और बॉम्बे हाई कोर्ट का हवाला
कर विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के गोएत्जे इंडिया लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त मामले के फैसले का हवाला दिया था। इस फैसले के अनुसार आकलन अधिकारी के सामने संशोधित रिटर्न के अलावा नए दावे को स्वीकार करने की सीमा होती है। हालांकि, ITAT ने बॉम्बे हाई कोर्ट के पृथ्वी ब्रोकर्स एंड शेयरहोल्डर्स मामले के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें आकलन अधिकारी और अपीलीय अधिकारियों की शक्तियों के बीच अंतर स्पष्ट किया गया था।
न्यायाधिकरण ने माना कि सही और वैध कटौती का दावा पहली बार किए जाने पर भी उस पर विचार किया जा सकता है। इस मामले में सिंह ने आकलन प्रक्रिया के दौरान नई गणना के जरिये खर्चों का दावा किया था और संबंधित दस्तावेज भी जमा किए थे, जिनकी जांच कर विभाग ने भुगतान की पुष्टि करने की कोशिश की थी।
मुंबई ITAT ने अपील स्वीकार की
- न्यायाधिकरण: मुंबई ITAT
- दावा: सही और वैध कटौती का दावा पहली बार किए जाने पर भी उस पर विचार किया जा सकता है
- दस्तावेज: संबंधित दस्तावेज जमा किए गए थे
- भुगतान: भुगतान की पुष्टि करने की कोशिश की गई थी
- निर्देश: कर विभाग को की गई अतिरिक्त गणना हटाने का निर्देश
- फैसला: सिंह की अपील स्वीकार कर ली
- आदेश: 3 अगस्त 2026
इसके आधार पर मुंबई ITAT ने कर विभाग को की गई अतिरिक्त गणना हटाने का निर्देश दिया और सिंह की अपील स्वीकार कर ली। इस मामले में आदेश 3 अगस्त 2026 को सुनाया गया। हालांकि, कर कानून समय के साथ बदल सकते हैं, इसलिए किसी व्यक्तिगत मामले में कदम उठाने से पहले योग्य कर विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
