संसद की ओर से गठित जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम से नकदी मिलने के मामले में लगाए गए तीनों आरोपों को सही पाया है। समिति की रिपोर्ट बुधवार, 12 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। रिपोर्ट के अनुसार, स्टोररूम में 500 रुपये के नोटों की बड़ी मात्रा मिली थी और जस्टिस वर्मा नकदी के स्रोत, मालिकाना हक और वहां मौजूद होने को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में जांच समिति की रिपोर्ट
तीन सदस्यीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस श्री चंद्रशेखर तथा वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे। समिति ने नकदी मिलने के बाद स्टोररूम की स्थिति में हुए बदलाव की भी जांच की। रिपोर्ट में कहा गया कि कमरे को सही तरीके से सील और जांच करने से पहले ही वहां की स्थिति बदल गई, जिससे सबूतों को सुरक्षित रखने पर असर पड़ा।
रिपोर्ट में बताया गया कि जस्टिस वर्मा ने शुरुआत में आरोपों से इनकार किया था। बाद में उन्होंने अलग-अलग संभावनाएं सामने रखीं। इनमें यह भी कहा गया कि नकदी वहां रखी गई हो सकती है या किसी साजिश के तहत ऐसा किया गया हो सकता है। हालांकि, समिति के सामने इन दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।
समिति ने तीनों आरोपों को सही माना
समिति ने यह भी कहा कि संबंधित कर्मचारियों को बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया। इसके अलावा नकदी रखे जाने या सबूतों से छेड़छाड़ की शिकायत को लेकर कोई एफआईआर या औपचारिक शिकायत भी दर्ज नहीं की गई। समिति ने इन परिस्थितियों को जस्टिस वर्मा के बचाव के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए महत्वपूर्ण माना।
यह मामला 14 मार्च 2025 की रात उनके सरकारी आवास में लगी आग के बाद सामने आया था। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में बड़ी मात्रा में जली हुई मुद्रा मिलने की बात सामने आई थी। विवाद के बाद जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था। वह पहले दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश थे और बाद में उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा गया था।
इस मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा बनाई गई आंतरिक समिति ने भी कहा था कि जिस स्टोररूम में नकदी मिली, उस पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था। इसके बाद जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ संसद में महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे।
⚖️ जांच समिति के मुख्य निष्कर्ष
- आरोप: तीनों आरोप सही पाए गए
- नकदी: 500 रुपये के नोटों की बड़ी मात्रा मिली
- स्रोत: नकदी के स्रोत का संतोषजनक जवाब नहीं मिला
- सबूत: स्टोररूम की स्थिति बदलने से सबूत सुरक्षित रखने पर असर पड़ा
- बचाव: आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश नहीं किए गए
- जांच: दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की जांच हुई
तीन आरोपों में क्या-क्या शामिल था
संसदीय समिति ने जांच के दौरान आरोपों को तीन हिस्सों में बांटा। पहला आरोप सरकारी आवास में बिना स्पष्ट स्रोत वाली भारतीय मुद्रा मिलने और उसके कब्जे से जुड़ा था। दूसरा आरोप महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित रखने में विफलता और उनमें हस्तक्षेप से संबंधित था। तीसरा आरोप जांच के दौरान दिए गए जवाब को टालमटोल वाला और भ्रामक पाए जाने से जुड़ा था।
समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा द्वारा दिया गया जवाब उपलब्ध सबूतों के आधार पर संतोषजनक नहीं था। जांच के दौरान दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की जांच की गई तथा कई गवाहों के बयान दर्ज किए गए। समिति ने यह भी कहा कि जस्टिस वर्मा को आरोपों पर अपना पक्ष रखने और बचाव पेश करने का पूरा अवसर दिया गया था।
नकदी और सबूतों को लेकर समिति की टिप्पणी
रिपोर्ट के अनुसार, पहले आरोप में सरकारी आवास के स्टोररूम से 500 रुपये के बड़ी मात्रा में ऐसे नोट मिले जिनका कोई संतोषजनक स्रोत नहीं बताया गया। दूसरे आरोप में समिति ने कहा कि महत्वपूर्ण सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए और कमरे को कानूनी तरीके से सील करने से पहले उसकी स्थिति बदल गई। बाद में नकदी के उपलब्ध न होने की स्थिति का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
👨⚖️ जस्टिस यशवंत वर्मा का न्यायिक सफर
- जन्म: 6 जनवरी 1969, इलाहाबाद
- कानून की डिग्री: रीवा यूनिवर्सिटी
- अधिवक्ता पंजीकरण: 8 अगस्त 1992
- अतिरिक्त न्यायाधीश: 13 अक्टूबर 2014
- स्थायी न्यायाधीश: 1 फरवरी 2016
- दिल्ली हाई कोर्ट: 11 अक्टूबर 2021 को तबादला
- इस्तीफा: अप्रैल 2026
जस्टिस यशवंत वर्मा का जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से बीकॉम ऑनर्स की पढ़ाई की और इसके बाद मध्य प्रदेश की रीवा यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की। 8 अगस्त 1992 को उन्होंने अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया।
उन्हें 13 अक्टूबर 2014 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया गया था। 1 फरवरी 2016 को वह स्थायी न्यायाधीश बने और 11 अक्टूबर 2021 को उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट में हुआ। वकील के रूप में उन्होंने संवैधानिक मामलों, श्रम कानून, औद्योगिक कानून, कंपनी कानून और कर मामलों से जुड़े मामलों में काम किया था। 2006 से न्यायाधीश बनने तक वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के विशेष अधिवक्ता भी रहे थे। 2012 से अगस्त 2013 तक उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्य स्थायी अधिवक्ता के रूप में भी कार्य किया था।
