महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर के हालिया आदेश के बाद टाटा ट्रस्ट्स के भीतर मतभेद खुलकर सामने आते दिखाई दे रहे हैं। मामला टाटा संस के शेयरों से जुड़े 1989 के एक पुराने लेनदेन की जांच की मांग से जुड़ा है। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष विजय सिंह ने इस लेनदेन की स्वतंत्र जांच की मांग की थी, लेकिन 2 सितंबर को चैरिटी कमिश्नर ने उनकी याचिका खारिज कर दी। आदेश में सिंह के व्यवहार को ट्रस्टी के पद के अनुरूप नहीं बताया गया, जिससे टाटा ट्रस्ट्स में उनकी स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
टाटा ट्रस्ट्स में पुराने शेयर लेनदेन को लेकर विवाद
इस पूरे मामले में विवाद उस टिप्पणी को लेकर भी है, जिसमें विजय सिंह के आचरण पर सवाल उठाया गया। सिंह का कहना है कि यह टिप्पणी चैरिटी कमिश्नर की अपनी बात नहीं थी, बल्कि टाटा ट्रस्ट्स की ओर से भेजे गए जवाब में कही गई बात को आदेश में शामिल किया गया था। दूसरी ओर, टाटा ट्रस्ट्स ने इस दावे को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। ट्रस्ट के अनुसार, नवलजीबाई रतन टाटा ट्रस्ट ने अपने जवाब में सिंह के बारे में कोई ऐसी टिप्पणी नहीं की थी और उसका जवाब केवल कमिश्नर द्वारा पूछे गए पांच सवालों के तथ्यात्मक उत्तर तक सीमित था।
1989 के शेयर हस्तांतरण से शुरू हुआ मामला
विवाद की शुरुआत एक मुंबई निवासी की शिकायत से हुई थी। शिकायत में 1989 में टाटा ट्रस्ट से दिवंगत नवल टाटा को शेयर हस्तांतरित किए जाने पर सवाल उठाया गया था। बाद में ये शेयर उनके बेटों के पास पहुंचे, जिनमें टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा, दिवंगत रतन टाटा और उनके भाई जिमी टाटा शामिल थे। ट्रस्ट्स ने इस पुराने लेनदेन का बचाव करते हुए कहा कि इसे जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ नानी ए. पालखीवाला ने देखा था और उस समय टाटा संस के बोर्ड ने भी इसे मंजूरी दी थी।
विवाद की मुख्य बातें
- मामला 1989 के टाटा संस शेयर लेनदेन से जुड़ा है।
- विजय सिंह ने स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
- 2 सितंबर को चैरिटी कमिश्नर ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
- आदेश में सिंह के आचरण को लेकर सवाल उठाए गए।
विजय सिंह की भूमिका पर भी उठे सवाल
चैरिटी कमिश्नर के 16 पन्नों के आदेश में विजय सिंह की भूमिका को लेकर भी विस्तार से बात की गई। आदेश के अनुसार, सिंह ने 8 जून 2026 को ट्रस्ट की बैठक में उस प्रस्ताव को मंजूरी दी था, जिसमें शेयर लेनदेन को कानूनी और सही माना गया था। इसके केवल दो दिन बाद, 10 जून को उन्होंने इसी लेनदेन की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए प्राधिकरण को ईमेल भेजा। आदेश में इस बदलाव को लेकर हैरानी जताई गई और कहा गया कि उनके पहले के रुख और बाद की शिकायत के बीच अंतर दिखाई देता है।
10 जून के ईमेल को लेकर भी विवाद
टाटा ट्रस्ट्स के जवाब में यह भी कहा गया कि सिंह का 10 जून वाला ईमेल ट्रस्ट के पास उपलब्ध नहीं था। कमिश्नर के अनुसार, इससे ऐसा संकेत मिल सकता है कि यह जानकारी दूसरे ट्रस्टियों और पूरे ट्रस्ट से छिपाई गई थी। आदेश में कहा गया कि इस कार्रवाई से ट्रस्ट की प्रतिष्ठा और उसकी साख को नुकसान पहुंचा। इसी संदर्भ में सिंह के व्यवहार को ट्रस्टी के पद के अनुरूप नहीं बताया गया।
सिंह ने टिप्पणी पर ज्यादा बात करने से किया इनकार
विजय सिंह ने इस मामले पर ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को एक प्रमुख आर्थिक अखबार के सामने पहले ही उठाया था। उन्होंने उस अखबार द्वारा प्रकाशित सुधार का भी हवाला दिया। इस बीच टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में दोहराया कि सिंह से संबंधित टिप्पणी चैरिटी कमिश्नर के 2 सितंबर के आदेश में की गई थी, न कि ट्रस्ट के जवाब में। इस विवाद ने टाटा समूह के प्रमुख परोपकारी संस्थानों के बीच मौजूद मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया है और आने वाले समय में सिंह की भूमिका पर भी इसका असर पड़ सकता है।
टाटा ट्रस्ट्स विवाद में अहम बिंदु
- चैरिटी कमिश्नर ने 2 सितंबर को याचिका खारिज की।
- शेयर लेनदेन को लेकर स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी।
- विजय सिंह के पहले और बाद के रुख में अंतर का उल्लेख हुआ।
- टाटा ट्रस्ट्स ने सिंह से जुड़ी टिप्पणी के दावे को लेकर अलग पक्ष रखा।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी उपलब्ध रिपोर्ट और संबंधित पक्षों के बयानों पर आधारित है। मामले से जुड़े तथ्य और कानूनी स्थिति आगे की कार्रवाई या आधिकारिक निर्णयों के साथ बदल सकती है।
